चक दे इंडिया
निर्माता : आदित्य चोपड़ा
निर्देशक : शिमीत अमीन
संगीत : सलीम मर्चेंट-सुलेमान मर्चेंट
कलाकार : शाहरुख खान
भारत के राष्ट्रीय खेल हॉकी की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। कभी इस खेल में हमारा देश सरताज हुआ करता था। बरसों मिली लगातार असफलताओं के कारण आम आदमी का मोह हॉकी से भंग हो गया।
यशराज फिल्म्स ने अपनी खेल पर आधारित फिल्म ‘चक दे इंडिया’ में हॉकी को चुना है। शाहरुख खान जैसे सुपरस्टार के जुड़ने से इस फिल्म का वजन बढ़ गया है।
कबीर खान (शाहरुख खान) कभी भारतीय हॉकी टीम का कप्तान हुआ करता था। उसे दुनिया के श्रेष्ठ सेंटर फॉरवर्ड में से एक माना जाता था। आज उसकी कोई पहचान नहीं है, लेकिन अभी भी ‘जो नहीं हो सकता है, वहीं करना है’ जैसी भावनाएँ उसके अंदर मौजूद हैं।
चुनौती को स्वीकारना हर किसी के बस की बात नहीं है। कबीर एक ऐसी ही कठिन चुनौती स्वीकारता है। वह भारतीय महिला हॉकी टीम का कोच बनने के प्रस्ताव को स्वीकारता है।
इस टीम का कोच बनना काँटों के ताज पहनने के बराबर है। लड़कियों की टीम इस खेल में बेहद कमजोर है। अलग-अलग प्रदेशों से आई इन लड़कियों में जोश और जुनून का अभाव है। अपने देश के लिए खेलना एक गौरव की बात होती है, लेकिन इस गौरव को इन खिलाडि़यों ने शायद ही कभी महसूस किया हो। वे तो सिर्फ इसलिए खेल रही थीं कि रिटायरमेंट के बाद उन्हें पेंशन मिलना शुरू हो जाएगी।
वे हॉकी को पकड़ना, गेंद पर नजर रखना, विरोधियों को छकाना जैसे इस खेल के मूलभूत सिद्धांत भूल चुकी हैं। वे सिर्फ इतना खेलना जानती हैं कि टीम में उनका स्थान बरकरार रहे।
उन्होंने शायद ही कभी उस उत्साह और ऊर्जा को महसूस किया हो जो भारत की तरफ से खेलते समय महसूस होता है। किसी ट्रॉफी को जीतना क्या होता है यह ट्रॉफी जीतकर ही महसूस किया जा सकता है।
‘चक दे इंडिया’ उस कोच की कहानी है जिसे गर्त में डूबी हुई टीम को फिर से सँवारना है। जीतना क्या होता है उन्हें सिखाना है। यह कहानी है एकता, ईमानदारी, समर्पण और अनुशासन की।
निर्देशक : शिमीत अमीन
संगीत : सलीम मर्चेंट-सुलेमान मर्चेंट
कलाकार : शाहरुख खान
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यशराज फिल्म्स ने अपनी खेल पर आधारित फिल्म ‘चक दे इंडिया’ में हॉकी को चुना है। शाहरुख खान जैसे सुपरस्टार के जुड़ने से इस फिल्म का वजन बढ़ गया है।
कबीर खान (शाहरुख खान) कभी भारतीय हॉकी टीम का कप्तान हुआ करता था। उसे दुनिया के श्रेष्ठ सेंटर फॉरवर्ड में से एक माना जाता था। आज उसकी कोई पहचान नहीं है, लेकिन अभी भी ‘जो नहीं हो सकता है, वहीं करना है’ जैसी भावनाएँ उसके अंदर मौजूद हैं।
चुनौती को स्वीकारना हर किसी के बस की बात नहीं है। कबीर एक ऐसी ही कठिन चुनौती स्वीकारता है। वह भारतीय महिला हॉकी टीम का कोच बनने के प्रस्ताव को स्वीकारता है।
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वे हॉकी को पकड़ना, गेंद पर नजर रखना, विरोधियों को छकाना जैसे इस खेल के मूलभूत सिद्धांत भूल चुकी हैं। वे सिर्फ इतना खेलना जानती हैं कि टीम में उनका स्थान बरकरार रहे।
उन्होंने शायद ही कभी उस उत्साह और ऊर्जा को महसूस किया हो जो भारत की तरफ से खेलते समय महसूस होता है। किसी ट्रॉफी को जीतना क्या होता है यह ट्रॉफी जीतकर ही महसूस किया जा सकता है।
‘चक दे इंडिया’ उस कोच की कहानी है जिसे गर्त में डूबी हुई टीम को फिर से सँवारना है। जीतना क्या होता है उन्हें सिखाना है। यह कहानी है एकता, ईमानदारी, समर्पण और अनुशासन की।
