बर्गमैन का सिनेमा
शब्द जहाँ नाकाफी हो जाते हैं
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सिनेमा की यह अद्भुत भाषा गढ़ने वाले कोई और नहीं, बर्गमैन थे। गत सदी के सबसे महान फिल्मकार इंगमार बर्गमैन, जो हालाँकि स्वीडन के रहने वाले थे, लेकिन जिनके सृजन को किन्हीं भौगोलिक सीमाओं में कैद नहीं किया जा सकता।
उन्नीसवीं शताब्दी आधी बीतते-न-बीतते पूरी दुनिया में कला के स्तर पर बहुत सारे बड़े परिवर्तनों की नींव पड़ने लगी थी। इसके पहले तक सिनेमा को एक गंभीर कला माध्यम के रूप में पहचान नहीं मिली थी। और यही वह दौर था, जब फ्राँस में ज्याँ लुक गोदार, इटली में फेलिनी, जापान में कुरोसावा, रूस में आंद्रेई तारकोवस्की, भारत में सत्यजीत रे और स्वीडन में इंगमार बर्गमैन एक नई सिनेमाई भाषा का सृजन कर रहे थे। इन लोगों ने मिलकर सिनेमा को नई पहचान दी। सिनेमा की भाषा इतनी जटिल और गंभीर भी हो सकती है, और पर्दे पर मनुष्य जीवन की छवियों को इस तरह रचा जा सकता है, ऐसा पहले कभी महसूस नहीं हुआ था।
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बर्गमैन ने विविधताओं और विचित्रताओं से भरा जीवन जिया। लीक से हटकर अपनी खुद की जिंदगी के साथ ढेर सारे प्रयोग किए और इन्हीं अनुभवों और प्रयोगों को सिनेमा की भाषा में रूपांतरित किया।
हमारे देश में पॉपुलर सिनेमा का अर्थ है, कुछ फॉर्मूले, फैंटेसी और एक ऐसी काल्पनिक दुनिया, जो यथार्थ से कोसों दूर है। ऐसे में बर्गमैन की फिल्में हमारे आसपास के सच को पर्दे पर दिखाती हैं, और उससे कहीं ज्यादा, जितना हम अपनी आँखों से देख सकते हैं। यथार्थ की गहरी पर्तों को भेदकर भीतर से उस सच को ढूँढ निकालना, जिससे साक्षात्कार खुद हमें बहुत बार आतंकित कर देता है।
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बर्गमैन के भीतर एक जबर्दस्त किस्म का ज्वालामुखी रचानाकार था। उन्होंने 35 वर्ष की अवधि में तकरीबन 50 फिल्में बनाईं और 60 के करीब नाटकों का भी सृजन किया। बर्गमैन अपनी सारी फिल्में खुद ही लिखते थे। बर्गमैन ने एक रेपर्टरी बनाई थी। कुछ लोगों का एक समूह था, जो साथ मिलकर काम करते थे, और बर्गमैन की लगभग सभी फिल्मों में वही कलाकार होते थे।
बहुत थोड़े बजट की उनकी फिल्मों में कोई तामझाम और नाटकीयता नहीं होती और कभी-कभी तो पूरी फिल्म सिर्फ दो-तीन पात्रों और दो-तीन दृश्यों के भीतर ही बुनी गई होती है। लेकिन फिर भी यूँ बाँधकर रखती है, और यूँ नि:शब्द कर देती है कि कोई शब्द, कोई उपमा ढूँढे से न मिले।
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बर्गमैन और उनके सिनेमा पर बात करते हुए हमेशा शब्दों की कमी महसूस होती है। उस अनुभूति के लिए हमारी भाषा के शब्द बहुत बार नाकाफी हो जाते हैं, जो उस फिल्म से गुजरते हुए भीतर चल रही होती है। एक छोटे से आलेख में सदियों के अंतराल में फैले बर्गमैन के सिनेमाई सृजन को समेटा भी नहीं जा सकता।
बर्गमैन की फिल्में ऐसी हैं, जैसे पर्दे पर चल रही कोई कविता हो। अपनी गति, लय और प्रवाह में वह हमारे मन में उतरती चली जाती है। पानी में शक्कर की तरह दिल-दिमाग के अंतरालों में कविता घुलती जाती है। एक कविता, जिसकी मिठास और जिसकी कड़वाहट को भी सिर्फ महसूस किया जा सकता है।
