Jagjit Singh Biography | जगजीत सिंह : गजल ने खोया अपना सम्राट
‘झुकी झुकी सी नजर’, ‘कागज की कश्ती’ और न जाने अपने कितने गीतों से श्रोताओं के दिल में बसने वाले गजल सम्राट जगजीत सिंह ने सत्तर के दशक में संगीत की इस फीकी पड़ती विधा में नई जान फूंकी और बॉलीवुड में अपनी अलग पहचान बनाई।
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उन कालातीत गजलों के पीछे की आवाज की प्रेरणा केएल सहगल, तलत महमूद, अब्दुल करीम खान, बड़े गुलाम अली खान और उस्ताद आमिर खान थे। अपने समय के सबसे सफल और चहेते गायकों में से एक जगजीत ने अपने पांच दशक के करियर में ढेरों गीत और गजलें गाईं । उनके 80 एल्बम भी आए।
अपने प्रशंसकों में ‘गजल सम्राट’ के तौर पर मशहूर जगजीत का जन्म राजस्थान के श्रीगंगानगर में आठ फरवरी 1941 को सरकारी कर्मचारी अमर सिंह धीमन और बचन कौर के यहां हुआ। उनकी चार बहनें और दो भाई थे। परिवार में उनका नाम जीत था। उनके जन्म के समय उनका नाम जगमोहन रखा गया था लेकिन उनके सिख पिता ने अपने गुरू की सलाह पर इसे बदलकर जगजीत कर दिया।
बाद में सैनिया घराने के उस्ताद जमाल खान से उन्होंने छह साल संगीत की तालीम ली और खयाल, ठुमरी और ध्रुपद का ज्ञान पाया। जगजीत का मानना था कि संगीत प्रेरणा की वस्तु है प्रतियोगिता की नहीं। उनका कहना था, ‘‘जैसे ही आप संगीत में प्रतियोगिता लाते हैं, उसकी आत्मा मर जाती है।’’ हालिया एक साक्षात्कार में उन्होंने संगीत में रियाज और समर्पण के कम होते जाने पर अफसोस जताया था।
उन्होंने कहा था, ‘‘संगीत एक व्यापक विषय है। संगीत में गणित और व्याकरण होता है। जब तक एक व्यक्ति सबकुछ जान नहीं लेता वह अच्छा गायक नहीं बन सकता। गजल गाने से पहले व्यक्ति को 15 वर्षों तक संगीत सीखना चाहिए।’’
उन्होंने गुरुद्वारों में भजन गाकर अपने संगीत के सफर की शुरुआत की। उनके गले के जादू ने जालंधर के डीएवी कॉलेज में उनकी फीस माफ करा दी। आकाशवाणी ,जालंधर में उन्हें व्यावसायिक तौर पर गाने का मौका मिला, जहां उन्हें कम पैसों पर साल में छह सीधे प्रसारण का प्रस्ताव दिया गया।
लेकिन, सफलता सपने की तरह थी। पाश्र्वगायकी में अपने सपने को तलाशने वह 1961 में मायानगरी मुंबई पहुंचे लेकिन असफल प्रयासों ने उन्हें वापस जालंधर पहुंचा दिया। गजल सम्राट 1965 में फिर सपनों की नगरी में पहुंचे और इस बार एचएमवी ने उनकी दो गजलों को रिकॉर्ड किया। इसी वक्त उन्होंने अपने केश कटवाने और पगड़ी को हटाने का फैसला किया।
बॉलीवुड में गजल गायिकी का फीका पड़ना जगजीत के सुनहरे करियर का कारण बना। 1975 में एचएमवी ने जगजीत को उनके पहले एल्बम ‘द अनफॉरगेटेबल्स’ का प्रस्ताव दिया जिसमें जगजीत-चित्रा की गजलें थीं।
पारंपरिक सारंगी और तबले के साथ आधुनिक वाद्य यंत्रों को गजल गायिकी में लाने का श्रेय भी जगजीत को जाता है। उनका अगला एल्बम पंजाबी में ‘बिरहा दा सुल्तान’ था। यह शिव कुकार बतालवी की लोकप्रिय कविताओं पर गाया गया था। इसके बाद चित्रा और जगजीत की जोड़ी का पहला एल्बम ‘कम एलाइव’ आया। इसके बाद दो और एल्बम आए और दोनों के कंसर्ट होने शुरू हो गए।
जगजीत ने 1987 में ‘बियोंड टाइम’ रिकॉर्ड किया। यह किसी भी भारतीय संगीतकार की पहली डिजिटल सीडी थी। गुलजार के टीवी सीरियल ‘मिर्जा’ में उनका गाना एक और मील का पत्थर साबित हुआ। अपने पेशेवर जीवन में वह बुलंदियों को छू रहे थे लेकिन तभी उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी त्रासदी हो गई जब 1990 में एक कार दुर्घटना में 18 साल का उनका इकलौता बेटा विवेक मारा गया।
दर्द ने मानो जिदंगी को घेरकर विराम लगा दिया। चित्रा ने अपनी आवाज खो दी और कभी स्टेज पर दोबारा नहीं लौटीं लेकिन जगजीत अपने अवसाद से लड़े। पुत्र की मौत के बाद सिख गुरूवाणी पर आधारित ‘मन जीते जगजीत’ उनका पहला एल्बम था।
‘मिर्जा गालिब’ की सफलता को दोहराने के लिए वह एक बार फिर गुलजार के साथ एल्बम लाने की योजना बना रहे थे। (भाषा)

