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पहचान खोजते मुसलमान

आजमगढ़ बीबीसी
पाणिनी आनंद (आजमगढ़ से बीबीसी संवाददाता)

मेरा भाई निर्दोष है। जो किसी की चोट को देखकर डर जाता था, वह किसी आतंकवादी गतिविधि में कैसे शामिल हो सकता है। उसे बेवजह ही....कहते-कहते आरिफ की बहन की आँखों में आँसू छलक आते हैं। गला बंद हो जाता है। आरिफ आजमगढ़ के संजरपुर गाँव का रहने वाला है और इन दिनों लखनऊ में पुलिस हिरासत में है। आरोप है कि वह लखनऊ की कचहरी में वर्ष 2007 में हुए धमाकों में शामिल था।

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आरिफ के दोस्त उसे अच्छा क्रिकेट खेलने वाले संवेदनशील दोस्त के रूप में जानते हैं। घरवालों की नजर में वह परिवार, गाँव समाज के लोगों का इलाज कर रहा भविष्य का एक डॉक्टर है। पुलिस प्रशासन और दुनिया की नजरों में अब उसकी पहचान एक चरमपंथी की है।

उसकी यह पहचान बनी दिल्ली के बटला हाउस एनकाउंटर के सिलसिले में गिरफ्तार किए गए आजमगढ़ के इसी गाँव के एक लड़के सैफ के मोबाइल के जरिए। घरवाले कहते हैं कि आरिफ और सैफ जब कभी एक साथ गाँव में होते थे तो साथ-साथ क्रिकेट खेलते थे। मिलते-जुलते थे।

पुलिस से घरवाले पूछते हैं कि आरिफ का जुर्म क्या है तो पुलिस कहती है कि आरिफ भी सैफ की तरह चरमपंथी गतिविधियों में शामिल था। सबूत सैफ के फोन में उसका नंबर है।

आरिफ की माँ की आँखें सूनी हैं। वो हमसे बात करने के लिए बरामदे में आईं। सामने बैठीं पर एक शब्द भी न कह सकीं। घर में छोटा भाई है तारिक। तारिक ने अभी हाईस्कूल की परीक्षा दी है। वो आगे की पढ़ाई के लिए बाहर किसी अच्छे स्कूल में जाना चाहता है। आगे चलकर इंजीनियर बनना चाहता है। घरवाले एक बेटे के साथ घटे हादसे से उबर नहीं पा रहे हैं। दूसरे के पैरों में अब परिवार और परिस्थितियों की बेड़ियाँ हैं।

आरिफ कौन है...यह सवाल पुलिस से करें तो जवाब मिलता है कि वो एक चरमपंथी है। राजनीतिज्ञों से करें तो वो कहते हैं कि एक मुसलमान है, पर परिवार के लिए वो बुढ़ापे में एक उम्मीद का दरवाजा है, लखनऊ में सीपीएमटी मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहा युवा है। देश के करोड़ों युवाओं की तरह ही विकास और तरक्की देखने को आतुर आँखें हैं।

पर आज के आरिफ की कहानी आजमगढ़ में जन्मे ऐसे लगभग 17 युवाओं की कहानी है, जिन्हें वर्ष 2007 से अब तक के समय में चरमपंथी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में हिरासत में लिया गया है।

केवल इस संजरपुर गाँव में ही नौ युवा अब तक ऐसे अभियोगों के अंजाम चढ़ चुके हैं। बटला हाउस एनकाउंटर में इस गाँव के दो युवा मारे गए। दो, सैफ और आरिफ गिरफ्तार हैं। पाँच वांछित हैं, घरों और पुलिस की पहुँच से दूर हैं।

इनमें से कुछ मुंबई में पकड़े गए हैं। कुछ को दिल्ली और कुछ को उनके पैतृक निवासों से उठाया गया है। कुछ पर आरोप तय हैं। कुछ की सुनवाई चल रही है। सभी जयपुर धमाकों, अहमदाबाद में चरमपंथी कार्रवाइयों, दिल्ली में विस्फोट, बटला हाउस एनकाउंटर जैसे किसी न किसी मामले में संदिग्ध पाए गए हैं। आरिफ का मुकदमा अभी तक शुरू भी नहीं हो सका है और उसे पुलिस की क़ैद में तीन महीने से भी ज़्यादा वक़्त बीत चुका है।

आरिफ के गाँव और आसपास के युवाओं की आखों में देखें तो आरिफ की कहानी की तकलीफ और एक भय तैरता नजर आता है। इस इलाके में कई घरों के बच्चे अब इसलिए बाहर नहीं जा सकते क्योंकि उनके घरवाले उन्हें किसी ऐसे मामले में शामिल बताए जाने जैसा कुछ नहीं देखना चाहते।

नेता तुम्हीं हो कल के....

ऐसे ही कुछ युवाओं से मैंने पूछा कि आज की परिस्थितियों में वो खुद को कैसा पाते हैं। इनके चेहरों पर जवाब देना आसान नहीं दिखता, शायद जवाब देने से भी डर है।

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जब कुरेदने पर मुँह खुलता है तो ये कहते हैं, 'हम लोगों के साथ बहुत बुरा हो रहा है। पुलिस और नेता अपने को बचाने के लिए हम लोगों के साथ ऐसा कर रहे हैं। राजनेताओं के पास कोई काम नहीं है पर कुछ तो करना है इसलिए हम लोगों को फँसाया जा रहा है ताकि दूरियाँ पैदा हों। ये देश को तोड़ने की राजनीति कर रहे हैं।'

एक और युवा कहते हैं, 'आजमगढ़ के युवाओं को, खासकर एक समुदाय के लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। उन्हें आतंकवाद के नाम पर फँसाया जा रहा है। हमें नहीं लगता कि जिन युवाओं को पुलिस ने चरमपंथी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में उठाया है, वो इनमें शामिल थे।'

पर क्या इन परिस्थितियों में नेता संजरपुर के लोगों के पास नहीं आए? क्या उन्होंने इन युवाओं के दर्द को समझने, हल करने की कोशिश नहीं की? जवाब मिलता है, 'कई नेता आश्वासन की बातें लेकर हमारे पास आए पर आज पाँच-छह महीने बाद भी कोई कुछ करता नजर नहीं आ रहा है। सब बातें करके जाते हैं।'

मानवाधिकार कार्यकर्ता तारिक कहते हैं, 'पिछले दिनों यहाँ समाजवादी पार्टी से शिवपाल सिंह यादव आए। उन्होंने कहा कि मुसलमानों की लड़ाई लड़ेंगे पर अगर कुछ वाकई करना है तो संसद में सवाल उठाना चाहिए था, आज तक सपा ने संसद में यह सवाल क्यों नहीं उठाया? बसपा के टिकट पर लड़ रहे अकबर अहमद डंपी भी संसद में सवाल क्यों नहीं उठाते हैं?'

पर हल क्या है इस स्थिति का, इस पर निराशा दिखाई देती है इन युवाओं को। एक कहता है, 'कोई हल नहीं है क्योंकि सरकारें हल निकालना नहीं चाहतीं। ऐसे ही रहा तो हम चुनावों का बहिष्कार कर देंगे।'

आतंक का गढ़ कहाँ है...

जहाँ आजमगढ़ का चुनाव इस बार आतंकवाद के मुद्दे के इर्द-गिर्द ही लड़ा जाता नजर आ रहा है, वहीं इस गाँव में चुनाव का मौसम सूना है। लोगों में हर ओर से निराशा है। नेताओं के पास आतंकवाद से मुक्ति के नारे हैं। मुसलमानों को सम्मान से जीने देने का वादा है, वहीं इन भाषणों के जवाब में यहाँ के युवाओं के चेहरे पर खोखली हँसी है।

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एक युवा हमें बताते हैं, 'यहाँ आए तो कई नेता। अपने अपने झंडे लगे काफिलों के साथ। हमारी स्थिति के साथ सहानुभूति जताई पर अबतक कुछ न कर पाने की वजह से लोगों की आँख में आँख नहीं डाल पा रहे। उनके लबों पर वोट माँगने के लिए शब्द नहीं आ पा रहे। वो वोट माँगने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं।'

एक और युवा जोर देकर कहते हैं, 'दरअसल, ये नेता जब दूसरे इलाकों में मुसलमानों से वोट माँगने जाते हैं तो लोग पूछते हैं कि क्या संजरपुर गए थे। ये उन लोगों से हाँ कह सकें इसलिए यहाँ आए हैं वरना इनकी यहाँ आने की हिम्मत नहीं है।'

आरिफ की बहन से हमने पूछा कि उन्हें क्यों लगता है कि आरिफ बेकसूर है। जवाब मिलता है, 'ऐसा मान लेना हम लोगों के लिए इसीलिए मुश्किल नहीं है कि वो हमारे घर का है बल्कि उसका स्वभाव ऐसा था ही नहीं। वो अपने करियर को लेकर चिंतित था। उसे डॉक्टर बनना था और इसी के लिए वो मेहनत कर रहा था।'

घर वाले बातें करते करते कुछ बिखरते, कुछ हिम्मत जुटाते नजर आते हैं। बहन कहती है, 'आरिफ के साथ न्याय होगा तो हमें भी न्याय मिलेगा। पर न्याय मिलेगा, इसे लेकर भी शक होता है क्योंकि कितने ही लोग बेगुनाह हैं पर सीखचों के पीछे हैं....'

आरिफ निर्दोष है या नहीं, यह जाँच का विषय है। इसकी जाँच होगी और शायद सच सामने आ जाएगा। पर आजमगढ़ के इस गाँव को देखकर, यहाँ के लोगों से मिलकर इतना ज़रूर दिखता है कि जिस आजमगढ़ को कुछ लोगों ने आतंक का गढ़ तक कह डाला, वहाँ के इस गाँव के लोगों के लिए अब घर की दहलीज के बाहर की पूरी दुनिया आंतक का गढ़ बन गई है। उन्हें खौफ है कि कहीं ये आतंक की दुनिया उनके बच्चों को निगल न ले।