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जिंदगी का हर पड़ाव खूबसूरत-शेखर

बीबीसी ‘एक मुलाकात’ में अभिनेता शेखर सुमन

शेखर सुमन फिल्म बॉलीवुड
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छोटे परदे के सुपरस्टार शेखर सुमन का मानना है कि मैजातीय जिंदगी में त्रासदी से भी जूझा, लेकिन आज जब पीछे पलटकर देखता हूँ तो खुद को इस मुकाम पर देखकर खुश हूँ। इसमें ईश्वर की असीम अनुकंपा और लोगों का बहुत सारा प्यार रहा है कि आज भी मेरा वजूद है। शेखर कपूर ने ‘बीबीसी एक मुलाकात’ कार्यक्रम में अपने जीवन से जुड़े सभी पहलुओं पर खुलकर बात की। प्रस्तुत हैं उसी बातचीत के मुख्य अंश-

आपकी अभिनय यात्रा का मजेदार पड़ाव कौन-सा था?
हर पड़ाव खूबसूरत होता है। ज़िंदगी उतार-चढ़ाव से गुजरती जाती है, खुशी भी मिलती है और दु:ख भी, लेकिन दु:खों को ऊर्जा में तब्दील करना पड़ता है, ताकि खुशी मिल सके। हर व्यवसाय में उतार-चढ़ाव लगा रहता है। ये सही है कि फिल्म ‘उत्सव’ से मेरे कॅरियर की शानदार शुरुआत हुई थी और उसके बाद मैंने उतार देखा। मैं जिस सपने को लेकर मुंबई आया था, उसे पूरा कर सका, इसलिए इसे एक खूबसूरत सफर मानता हूँ।

‘उत्सव’ फिल्म आपको कैसे मिली?
मैंने कहा न आपको कि मेरा शुक्र काफी तेज है और इस मामले में सौभाग्यशाली हूँ। जैसा कि कहा जाता है कि फिल्मों में काम पाने के लिए बहुत खाक छाननी पड़ती है, लेकिन मुझे मुंबई आने के दो हफ्ते बाद ही यह फिल्म मिल गई और वो भी बिना किसी गॉडफादर के।

ये सब अचानक हो गया। मैं शशि कपूर साहब की एक फिल्म की शूटिंग के दौरान उनसे मिलने गया था और वे शॉट के बीच में मुझसे बात कर रहे थे। मैंने उन्हें बताया कि मैं थियेटर कर चुका हूँ और काम की तलाश में हूँ। अचानक एक शॉट खत्म होने के बाद जब वो मेरे पास आए तो मुझसे पूछा- तुम मेरी फिल्म में काम करोगे। काफी बड़ी फिल्म है, उत्सव इसका नाम है। रेखा इसकी हीरोइन हैं और हम हीरो की तलाश कर रहे हैं।

मुझे लगा कि वो मुझे इस फिल्म में कोई छोटा-मोटा रोल देने की बात कर रहे हैं। मैंने उनसे पूछा कि मैं तैयार हूँ, बताइए क्या रोल है, तो उन्होंने कहा कि मैं हीरो के रोल की बात कर रहा हूँ। जिस दिन मैं उनसे मिलने पहुँचा उसी दिन देवानंद का इंटरव्यू सुना था, जिसमें उन्होंने कहा था कि मुंबई आने के दो साल बाद उन्हें पहला काम मिला था। इसे याद करते हुए मैंने शशि कपूरजी से कहा मैं अभी-अभी मुंबई आया हूँ और आप मेरे साथ इतना बड़ा मजाक मत कीजिए, हार्टअटैक से मर जाऊँगा।

इस पर शशिजी ने कहा कि देखिए मैं चाहता हूँ कि यह रोल आप करें, पर यह इतना आसान नहीं है। आपको स्क्रीन टेस्ट देना पड़ेगा। जब मैं स्क्रीन टेस्ट के लिए आरके स्टूडियो पहुँचा तो वहाँ बहुत सारे लड़के थे। एक से मैंने कहा कि मैं चारुदत्त के रोल के लिए स्क्रीन टेस्ट देने आया हूँ, तुम किस रोल के लिए आए हो तो उसने बताया कि वह भी चारुदत्त के रोल के लिए आया है। तो मुझे लगा कि शशि कपूरजी ने सिर्फ मुझे ही सपना नहीं दिखाया, बल्कि इन सब लोगों के पास भी शगूफा छोड़ दिया था।

ऑडिशन के बाद गिरीश कर्नाड ने कहा कि सब लोग जा सकते हैं सिवाय शेखर सुमन के। मुझे लगा कि या तो मैंने बहुत खराब किया है या फिर बहुत अच्छा। खैर दूसरी बात सही निकली और उन्होंने कहा कि आपका ऑडिशन सबको बहुत पसंद आया है। हम स्क्रीन टेस्ट लेंगे फिर आपको बताएँगे। जब स्क्रीन टेस्ट का नतीजा आया तो मैं पृथ्वी थियेटर में था और शशि कपूरजी ने मुझे कहा कि आप हीरो के लिए चुन लिए गए हैं, जाइए गिरीश कर्नाड से मिल लीजिए।

मैं इससे उत्साहित हो गया कि मेरी दीदी अंधेरी ईस्ट में रहा करती थीं और मेरे पास ऑटो पकड़ने के लिए भी टाइम नहीं था। मैं सात किलोमीटर तक दौड़ता ही चला गया, दीदी और हम लोग तीसरी मंजिल पर रहते थे और मैं दौड़ते-दौड़ते पाँचवीं मंजिल पर चला गया।

आप अच्छा गाते भी हैं, क्या गाने की भी कहीं से शिक्षा ली थी?
थियेटर सब कुछ सिखा देता है, वहाँ आपको अभिनय, गाने, कॉस्ट्यूम, मेकअप सबके बारे में पता चल जाता है। इन सबके अलावा गाना मेरा जुनून बन गया था और मुझे लगा कि संगीत सीखना चाहिए। ये अलग बात है कि समय मुझे अब मिला तो मेरा म्यूजिक एलबम अब आ रहा है। वैसे भी वक्त से पहले और किस्मत से ज्यादा कभी किसी को कुछ नहीं मिलता है।

आप जिस तरह की पारिवारिक पृष्ठभूमि से आते हैं उसमें फिल्म अभिनेता बनने की बात पर तो कोहराम मच गया होगा?
मेरे नाना बिहार के पहले एडवोकेट जनरल थे और पिताजी स्वास्थ्य सेवा के महानिदेशक थे। घर आईएएस और आईएफएस से भरा था। घर में पढ़े-लिखे लोग होने से यह होता है कि किसी भी चीज को सिरे से खारिज नहीं किया जाता है। मुझे भी प्रताड़ित नहीं किया गया कि आप डॉक्टर या आईएएस ही बनिए। हो सकता है कि पिताजी के मन में ऐसी इच्छा रही होगी। हालाँकि घर में यह सवाल उठता रहा कि मेरे दिमाग में यह खयाल आया कहाँ से। बहरहाल, जब सबको पता चला तो सबने यही कहा कि पहले पढ़ाई-लिखाई पूरी कर लीजिए। इसके बाद कोशिश कीजिए। इससे मुझे बहुत प्रेरणा मिली।

लगता है कि यह पढ़े-लिखे लोगों से घिरे होने की वजह से आप हरफनमौला के रूप में विकसित हुए?
पढ़ाई-लिखाई का बड़ा असर पड़ता है, क्योंकि शिक्षित आदमी का मन स्वस्थ होता है। शिक्षित होने की वजह से आज मैं टेलीविजन पर होस्ट के रूप में सफल हो पाया, क्योंकि यहाँ उतना ग्लैमर नहीं होता और आप जो बोलते हैं लोग उसे सुनते हैं। मुझे बड़ा अच्छा लगता है कि मैं पढ़े-लिखे परिवार से आता हूँ और खुद भी पढ़ा-लिखा हूँ। मैं लोगों को नसीहत भी देता हूँ कि कुछ भी करें पर पढ़ाई जरूर करें।

आप बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं, लड़कियाँ तो मरती होंगी आप पर?
ये तो मुझे नहीं पता, लेकिन जितने भी अभिनेता हैं सबकी ख्वाहिश होती है कि उनके प्रशंसक हों, इसीलिए वो अभिनय की दुनिया में आते हैं तो थोड़ी-बहुत मेरी भी हैं।

ज्यादातर लोगों का मानना है कि आप राजनेताओं पर गजब की चुटकी करते हैं। कैसे करते हैं यह सब, इतने संतुलन के साथ?
देखिए, यहीं पर पढ़ाई-लिखाई काम आती है, जिससे पता चलता है कि यह सीमा है और इसके पार अश्लीलता है, अभद्रता है। यह अंदरूनी बात है। ‘मूवर्स एंड शेकर्स’ करते वक्त जब वाजपेयीजी, लालूजी, मायावतीजी, राबड़ीजी के बारे में मैंने बोलना शुरू किया तो मेरे अंदर का अभिनेता सजग हो गया। मुझे लगा कि इन सबको अगर मैं किरदार के रूप में लूँ तो बहुत मजा आएगा, क्योंकि इन सबकी आदतें लोगों से बहुत जुड़ी हुई हैं।

वाजपेयीजी के अंदर भी एक अभिनेता है। उनके अंदर एक कवि है, बहुत ही संवेदनशील इनसान हैं वे। जिस तरह से वे बोलते हैं लगता है कोई अभिनय कर रहा है। एक दिन बोलते-बोलते मैंने उनकी नकल कर दी। जब मैंने वाजपेयीजी के बारे में बोलना शुरू किया तो लोगों ने मुझसे कहा आज तक प्रधानमंत्री के बारे में किसी ने नहीं बोला, कार्यक्रम पर रोक लग जाएगी, लेकिन कभी भी ऐसा नहीं हुआ। वैसे ही हमारे हर नेता की अपनी-अपनी अदा है और मैं इसे भुनाता गया, लेकिन मैंने कभी भी सीमा नहीं लाँघी।
आजकल आप जिन कॉमेडी शो में जज होते हैं उनमें कई यह सीमा लाँघ दी जाती है?
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काफी दफा लोग यह सीमा पार कर देते हैं। आप तो जो देखते हैं वो तो संपादित होता है। इनको देखकर मुझे लगता है कि कॉमेडी के नाम पर लोग कहाँ तक जा सकते हैं और इससे मैं हँसने के बजाय आहत हो जाता हूँ। मुझे मेरे निर्देशक आकर कहते हैं कि आप हँस नहीं रहे हैं। देखिए आपके बगल वाले कितना हँस रहे हैं।

मुझे ऐसा लगा कि यहीं पर पढ़ाई-लिखाई की बात आती है। जब एक परिवेश नहीं मिलता है तो लोगों को इस सीमा के बार में नहीं पता होता है और कुछ भी बोल जाते हैं।

मैं आपको एक वाकया बताता हूँ। मैं एक बार किसी उद्योगपति के बेटे की शादी में गया हुआ था तो पता चला कि वहाँ तब प्रधानमंत्री वाजपेयीजी भी आए हुए हैं और मुझे ये पता था कि वो मेरा कार्यक्रम काफी पसंद करते हैं। मुझे उनसे मिलने की बड़ी इच्छा थी, लेकिन जब मैं उनसे मिलने के लिए गया तो पता चला कि प्रधानमंत्रीजी गाड़ी मैं बैठ चुके हैं। छगन भुजबलजी उस समय महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री थे और वो वाजपेयीजी को विदा करने के लिए खड़े थे। मुझे लगा कि जब उनका काफिला वहाँ से गुजरेगा तो वो भुजबलजी की ओर जरूर देखेंगे और मैं उन्हें नमस्कार कर लूँगा।

जैसी क‍ि उम्मीद थी वाजपेयीजी ने भुजबलजी की ओर देखा तो मैंने उन्हें नमस्कार कर लिया। उन्होंने तुरंत गाड़ी रुकवाई और उतरकर मेरे पास आए और कहा- हमें आप पर गर्व है, आप देश के बेहतरीन अभिनेता हैं। क्या अब भी मेरी नकल कर रहे हैं। यकीन मानिए जब आप मेरी नकल करते हैं तो सबसे ज्यादा मैं हँसता हूँ।

हमने सुना है कि लालूजी भी आपको बड़ा पसंद करते हैं?
लालूजी को तो पसंद करना ही था। बिहार से हूँ, पटना से हूँ, उस तरह की बोली बोलता हूँ। जब मैंने लालूजी के बारे में बोलना शुरू किया तो लोग पूछने लगे कि किसके बारे में बात करते हो। उस समय लालूजी बिहार में तो लोकप्रिय हो चुके थे, लेकिन बाहर कम ही लोग उनकी शैली से परिचित थे। उस समय ‘मूवर्स और शेकर्स’ भी लोकप्रिय हो रहा था और लालूजी भी राजनीति में तेजी से ऊपर बढ़ रहे थे।

वैसे लालूजी मेरे बारे में कहा करते थे कि शेखर मेरे बारे में बात करके पैसा कमा रहा है, उसको कहो आधा हिस्सा देगा और मैं कहा करता था कि मैं आपके बारे में सप्ताह में पाँच दिन बात करता हूँ, आप आधा पैसा दीजिए। वैसे भी लालूजी की शख्सियत ऐसी है कि मैं उनके मामले में थोड़ी स्वतंत्रता ले सकता हूँ, पर यहाँ भी कभी मर्यादा नहीं लाँघी।

लोगों को लगता था कि वे मुझसे बहुत नाराज होंगे और मिलेंगे तो न जाने क्या होगा। आखिर वो समय भी आया और एक शादी में हमारी मुलाकात हुई। मीडिया के लोग बेसब्री से इस घड़ी का इंतजार कर रहे थे और लालूजी ने मुझे कसकर गले लगाया और कहा- सब बुड़बक है, इन लोगों को पता ही नहीं है कि ‘एनी पब्लिसिटी इज गुड पब्लिसिटी। तुम हमरे बारे में जो बोलता है हमको बहुत अच्छा लगता है।

आपकी बात से तो पता चल गया कि आपके पसंदीदा नेता कौन हैं, शायद वाजपेयीजी हैं?
बिलकुल, मैं उनका बहुत सम्मान करता हूँ। वे एक महान नेता हैं, कवि हैं, वक्ता हैं और बहुत अच्छे इनसान हैं, इसलिए उनका किरदार निभाना बहुत पसंद है।

आपके पसंदीदा अभिनेता कौन हैं?
दिलीप कुमार साहब। वो अभिनय का स्कूल हैं, संवाद बोलते थे तो लगता ही नहीं था कि संवाद बोल रहे हैं, लगता था कि बात कर रहे हैं। ये बात उनसे बहुत लोगों ने सीखी चाहे वे संजीव कुमार हों या फिर अमिताभ बच्चन हों। दिलीप कुमार अभिनय के ब्रह्मा हैं और सब उनकी ही नाभि से निकले हैं।

उनके द्वारा निभाया गया सबसे पसंदीदा किरदार कौन-सा है?
निश्चित रूप से मुगले आजम में निभाया गया सलीम का किरदार। देवदास का कैरेक्टर भी गजब का निभाया था।

आपको अपना कौन-सा किरदार सबसे ज्यादा पसंद है?
मुझे ‘मैं’ का आपका किरदार बहुत पसंद आया था पर यह उतना हिट नहीं हुआ।

क्या आपने कभी सोचा था कि देश में ‘कॉमेडी किंग’ के रूप में जाने जाएँगे?
मैं हास्य की तरफ मुड़ा तो इसलिए कि जो कर रहा था यह उसके यह एकदम विपरीत था। ट्रैजेडी किंग रहते हुए भी दिलीप साहब की कोशिश रही क‍ि वे कॉमेडी करें, अमिताभ बच्चन कॉमेडी के जरिये ज्यादा जाने गए। लोग गंभीरता के बजाय हास्य से खुद को ज्यादा जोड़ते हैं, लेकिन इसके लिए दूसरी तरह की प्रतिभा चाहिए। इसमें टाइमिंग का बहुत महत्व होता है।

आपका पसंदीदा कॉमेडियन कौन है?
कॉमेडियन एक गलत शब्द होगा, लेकिन अमिताभ बच्चन की कॉमेडी की टाइमिंग गजब की थी। आप चुपके-चुपके देखिए, शोले में मौसी से शादी की बात करने के लिए जब जाते हैं उस समय अमिताभ की टाइमिंग देखिए। दिलीप साहब को देखिए, संजीव कुमार को देखिए। जो अभिनेता आँधी और शोले का ठाकुर जैसा गंभीर किरदार कर सकता है वो अंगूर भी करते थे। मैं समझता हूँ कि जो गंभीर रोल काफी अच्छा करते हैं वो कॉमेडी भी अच्छी कर सकते हैं। इस लिहाज से अमिताभ बच्चन और संजीव कुमार काफी अच्छे रहे।

ये फिटनेस का नया फंडा क्या है?
लोगों को ये गलतफहमी है कि बॉलीवुड के लोगों को ही अच्छा दिखने की जरूरत है, जबकि सच्चाई ये है कि हर किसी को स्वस्थ और अच्छा दिखने की जरूरत है। मैंने महसूस किया है कि हम लोग शरीर के प्रति काफी लापरवाही बरतते हैं। अच्छा खाते हैं, अच्छा पहनते हैं और अभिनय पर भी ध्यान देते हैं, लेकिन शरीर पर ध्यान नहीं देते। अच्छा दिखना भी एक कला है और हमारी इंडस्ट्री में तो खासकर जरूरी है।

फिट रहने के लिए आजकल क्या-क्या कर रहे हैं?
ये पूछिए कि क्या नहीं कर रहा हूँ। वैसे लोगों में गलत धारणा है कि डायटिंग से पतला हुआ जा सकता है। जरूरी ये है कि आप अच्छा और सही खाना खाएँ। मैं तो छह वक्त थोड़ा-थोड़ा खाता हूँ और शाम सात बजे के बाद नहीं खाता हूँ।

सुबह जूस, फल, चना और सलाद खाता हूँ। ज्यादा फल भी नहीं खाना चाहिए, क्योंकि उसमें शुगर ज्यादा होती है। फिर दो घंटे बाद भीगा बादाम, पनीर और अंडे का सफेद हिस्सा खाता हूँ। बाद में बाजरे की रोटी खाता हूँ। अंतिम बार खाना शाम सात बजे खा लेता हूँ। शाम को ध्यान करता हूँ। यह एक मानसिक कसरत है।

आने वाले समय में शेखर सुमन क्या सरप्राइज देने वाले हैं?
जीवन आश्चर्यों से भरा है। कभी भी लोगों को अपने बारे में भविष्यवाणी मत करने दीजिए, हमेशा अंचभित करते रहिए।

जीवन का सबसे बेहतरीन दिन कौन-सा है?
जिस दिन मेरी शादी हुई थी।

आपके बेटे का नाम अध्ययन है, क्या वो भी फिल्म कर रहे हैं?
अभी उनकी लंदन में स्कूलिंग खत्म हुई है और वो आगे न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में पढ़ना चाहते हैं। वो फिल्मों में काम भी करना चाहते हैं लेकिन उनका कहना है कि इससे पहले वो प्रोफेशनल ट्रेनिंग चाहते हैं, इसलिए अभी एक फिल्म कर रहे हैं जिसका नाम है हाल-ए-दिल। ओंकारा बना चुके कुमार मंगत साहब की ये एक टीनएजर लव स्टोरी है। उम्मीद है कि अध्ययन इस फिल्म से बहुत कुछ सीखेंगे और आगे हम लोगों का नाम रोशन करेंगे।

एक किरदार जो निभाने का बहुत मन हो?
स्कारफेस का अल-पचीनो वाला किरदार निभाना चाहता हूँ।

स्टारडम से मिलने वाले पैसे और प्रसिद्धि के अलावा कोई एक ऐसी चीज जो सबसे अधिक संतुष्टि देती है?
मुझे लगता है काम की सही प्रशंसा सबसे ज्यादा संतुष्टि देती है। जब कोई साधारण आदमी आकर आपके पास आपके काम की प्रशंसा करता है तो लगता है कि चलो जिसके लिए आया था और जिनसे जुड़ने आया था वो काम हो गया। जब कोई आम आदमी पास आकर हाथ पकड़कर कहता है कि हमने आपको छू लिया और हमारा जीवन सफल हो गया तो ये सबसे ज्यादा संतुष्टि देती है।

वैसी कोई इच्छा कि ये मेरा हो जाता?
इच्छाएँ अनंत होती हैं और वो कभी खत्म नहीं होतीं। मेरी सबसे बड़ी इच्छा है कि जैसा हूँ वैसा बना रहूँ और बहकूँ नहीं। भगवान मुझे इतनी शक्ति दे कि जो अधूरे ख्वाब हैं उनको पूरा कर सकूँ।

पसंदीदा गाने?
झोंका हवा का आज भी जुल्फें उड़ाता होगा न...
मेरे मन ये बता दे तू, किस ओर चला है तू...
लग जा गले कि फिर ये हँसी रात हो न हो...
तूझे देख-देख सोना, तुझे देखकर है जगना...
तुमको देखा तो ये खयाल आया...