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''कमेटी आ गई, भागो''...

- अशोक कुमार (छोला-भटूरा दुकानदार)

छोले भटूरे दुकानदार
BBC
मैं आपसे बात जरूर करूँगा, लेकिन इस शर्त पर कि आप न तो मेरा नाम, न मेरी दुकान का पता और न ही मेरी फोटो छापोगे।

आप देख ही रहे हो कि इस पेड़ के नीचे खाने के सामान की दुकान लगाता हूं। छोले-भटूरे, कढ़ी-चावल, ब्रेड-पकौड़े और समोसे बेचता हूं। पंद्रह साल हो गए इसी जगह, इसी पटरी पर रेहड़ी लगाते हुए। पहले बाप लगाते थे और अब मैं लगाता हूं।

अब क्या बताऊं आपको, रोजी पर बैठा हूं इसलिए गलत नही बोलूंगा।

दोतरफा मार : पुलिस को हर महीने पांच सौ से हजाररपए देता हूं और इतने ही करीब नगर निगम वाले ले जाते हैं। मतलब एक दुकान के लिए दो-दो जगह पैसे। तरीका ये होता है कि एरिया इंस्पेक्टर अपना एक बंदा हमारे पास भेजता है, उससे हम कहते हैं कि इतना पैसा देंगे और इसके बाद वो ओके करता है।

हर महीने की दस तारीख को उनका बंदा आता है और पैसा ले जाता है। दिक्कत तब होती है जब इलाके के पुराने अफसर की जगह नया आदमी आ जाता है। नया अफसर नया बंदा भेजता है, उसके रेट भी ज्यादा होते हैं।

कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि जो आदमी पैसे ले जाता है उसका ट्रांसफर हो जाता है तो नया बंदा भी आकर पैसे माँगता है, इससे एक महीने के भीतर दो-दो बार पैसे देने पड़ते हैं।

अगर बात इतनी ही होती भी ठीक था, पैसे देने के बाद भी कमेटी वाले कभी भी आ धमकते हैं। अचानक भगदड़ मचती है और हम सभी रेहड़ी पटरी वालों को सिर पर सामान ढोकर भागना पड़ता है।

हालाँकि ये जरूरी नहीं है कि सभी बच जाएँ। कुछ लोग अपना सामान अगल-बगल की दुकानों में छिपा देते हैं। जो नहीं छिपा पाते उनका सामान नगर-निगम की कमेटी वाले ले जाते हैं।

जुर्माना : कभी भटूरे का भगौना तो कभी चावल या कभी-कभी पूरी ही दुकान। इसके बाद वो जुर्माना लगाते हैं और जुर्माना भरने के बाद ही हम अपना सामान वापस ले पाते हैं।

कभी-कभी जुर्माने की रकम माल की कीमत से ज्यादा होती है तो हम अपना सामान लेने भी नहीं जाते। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इन्हें भी अपनी फाइलों में ये दिखाना होता है कि कितनी बार छापे डाले और क्या-क्या बरामद हुआ। लेकिन ये कमेटी वाले हमें भगा जरूर सकते हैं पर हाथ नहीं लगा सकते।

ये तो वही बात हुई कि दुकान लगाने के पैसे भी दो और उसके बावजूद भागते फिरो, लेकिन दिन बीत जाते हैं। अगले दिन हम फिर से इसी जगह पर अपनी दुकान लगा लेते हैं। 26 जनवरी, 15 अगस्त या फिर ऐसे किसी दिन जब पुलिस की गश्त ज्यादा होती है तो हम दुकान नहीं लगाते, हमें बता दिया जाता है कि कल दुकान नहीं लगाना।

हालांकि कुछ सोसाइटी वाले हैं जो हम लोगों की मदद के लिए काम कर रहे हैं ताकि हमें एक ठिकाना मिल जाए अपनी दुकान लगाने के लिए और हमें रोज-रोज इधर-उधर भागना न पड़े और घूस न देनी पड़े। हमने किया ही क्या है? जबसे होश संभाला है, जबसे दुकान लगाई है, लोगों की जेबें ही भरते आ रहे हैं।