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एक कंपनी ऐसी भी!

- पारुल अग्रवाल (दिल्ली)

विकलांग
BBC
रोजमर्रा की तेज रफ्तार जिंदगी में जितनी जद्दोजहद आगे निकलने की है उतना ही डर इस बात का भी है कि कहीं हम पीछे न छूट जाएं। लेकिन आगे से आगे बढ़ने की होड़ में शायद ही कभी उन लोगों का ख्याल हमारे जेहन में आता है जो शारीरिक रुप से विकलांग हैं और शायद इस दौड़ का हिस्सा भी नहीं।

सिटीजन रिपोर्ट की इस कड़ी में मुलाकात गुजरात के निशीथ मेहता से जिन्होंने अपनी कंपनी के जरिए विकलांगों को मुख्यधारा से जोड़ने का एक नायाब तरीका इजाद किया है।

'मेरा नाम निशीथ मेहता है और मैं गुजरात के भावनगर िले में रहता हूं। साल 1978 में मैंने ‘माइक्रो साइन’ नामक कंपनी की शुरुआत की जिसमें ऑटो और इलेक्ट्रॉनिक क्षेत्र के लिए प्लास्टिक और फाइबर के कल-पुर्जे बनाए जाते थे।

कुछ ही सालों में मेरी कंपनी ने बीएचईएल, पवन हंस हेलिकॉप्टर्स और लारसेन एंड टुब्रो जैसी नामी कंपनियों के साथ काम करना शुरू कर दिया। लेकिन लगातार मिल रही ये सफलता भी मुझे अधूरी लग रही थी। मेरा मानना है कि पैसा कमाना एक बात है लेकिन समाज के साथ उसे बांटकर ही हम अपने इंसान होने का परिचय दे सकते हैं।

मैं अपनी कामयाबी को उन लोगों के साथ बांटना चाहता था जिन्हें जिंदगी ने इस तरह आगे बढ़ने का मौका नहीं दिया।

मैंने देखा कि भावनगर में कई ऐसे स्कूल हैं जहां मानसिक और शारीरिक रूप से विकलांग लोगों को पढ़ाया-सिखाया जाता है, लेकिन इन स्कूलों से निकलने के बाद उनके लिए मुख्यधारा से जुड़ने का कोई जरिया नहीं।

सरकार ने भले ही विकलांगों को नौकरियों में तीन फीसदी आरक्षण दिया हो, लेकिन सच ये है कि विकलांगों को शायद ही कभी नौकरियां मिल पाती हैं।

नायाब तरीका : मैंने इन लोगों को अपनी कंपनी में नौकरी देने का फैसला किया और उनके लिए काम आसान बनाने के लिए एक नायाब तरीका अपनाया।

हमने व्यक्ति में विकलांगता के आधार पर उसकी ताकत को तलाशना शुरू किया और उन्हें ऐसी जगहों पर काम के लिए रखा जहां वो आसानी से काम कर सकें।

मसलन ऐसी जगह जहां मशीनों का जबर्दस्त शोर हो और सामान्य व्यक्ति के लिए ध्यान केंद्रित करना मुश्किल हो वहां हमने मूक-बधिर लोगों को काम दिया। इन लोगों के लिए यहां काम करना आसान था और इस तरह की इकाई में उन्हें बोलने या सुनने की जरूरत नहीं पड़ती।

एक प्रयोग के तौर पर शुरू की गई मेरी इन कोशिशों ने बेहतरीन परिणाम दिए।

कुछ साल पहले हमारे साथ जुड़े धर्मेंद्र शाह कहते हैं, 'बचपन में ही मुझे पोलियो हो गया था और मेरे दोनों पैर बेकार हो गए। मैं जब निशीथ जी के पास आया तो मेरी हालत बहुत खराब थी। मैं चल फिर नहीं सकता था इसलिए उन्होंने मुझे अकाउंट्स विभाग में काम दिया जहां चलना-फिरना नहीं होता। अब काफ़ी कुछ सीख गया हूं और बढ़िया काम कर रहा हूं।'

मेरी कंपनी में हर किसी के लिए कोई न कोई काम मौजूद है।

बराबरी का हक : भावनगर की ही रहने वाली मीना शाह जब ‘हाईपर एक्टिविटी’ नामक मानसिक विकार से पीड़ित अपने बेटे को लेकर मुझसे मिलीं तो मैं समझ गया कि उसकी जरूरत हमारी कंपनी के प्रोडक्शन विभाग को है। ये वो विभाग है जहां बहुत तेजी से काम करना होता है और बहुत ऊर्जा की जरूरत पड़ती है।

मीना कहती हैं, 'मेरा बेटा अब कंपनी के काम में इतना रम गया है कि उसका घर में मन नहीं लगता। पहले लोग उस पर हंसते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं होता। उसमें आत्मविश्वास भी आ गया है। सबसे बड़ी खुशी है कि अब वो खुद अपनी जरूरतों के लिए पैसे कमा रहा है।'

मैं इन लोगों को किसी भी रूप में अपनी कंपनी के लिए बोझ नहीं मानता क्योंकि जितना मैंने इनके लिए किया है उससे कहीं ज्यादा फायदा इन लोगों ने मुझे पहुंचाया है।

इन लोगों की कोई मांग नहीं होती और थोड़े से प्रोत्साहन के बदले ये लोग दिल लगाकर काम करते हैं। इन लोगों के आने से मेरी कंपनी का मुनाफा और उत्पादन क्षमता दोनों बढ़ी हैं। यहां तक की अब जब भी मेरी कंपनी में लोगों की जरूरत होती है मैं ये सोचता हूं कि किस तरह की विकलांगता के व्यक्ति को नौकरी पर रखा जाए।

मैं चाहता हूं कि इस तरह के प्रयोग देशभर में हों क्योंकि किसी भी कंपनी के लिए ये घाटे का सौदा नहीं। यही इस प्रयोग की सबसे बड़ी सफलता भी है कि ये कोशिश दया और भीख पर नहीं बल्कि बराबरी के हक़ पर टिकी है।'