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हाइब्रिड वर्किंग: कुछ दिन दफ्तर, कुछ दिन घर से काम करने में क्या हैं दिक्कतें
कोरोना महामारी के दौरान जब संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए कड़े लॉकडाउन लगाए गए थे, तब दुनिया भर के दफ्तरों में काम करने के लिए रिमोट या वर्क फ्रॉम होम व्यवस्था लागू की गई थी।
ऑफिस न आकर घर या कहीं और से काम करने की यह व्यवस्था नई नहीं थी, लेकिन पहली बार इतने बड़े पैमाने पर इसे इस्तेमाल किया गया। फिर जब हालात सुधरे तो कई कंपनियों ने रिमोट वर्किंग खत्म करके कर्मचारियों को फिर से ऑफिस में बुला लिया। लेकिन कुछ कंपनियां ऐसी हैं, जिन्होंने या तो रिमोट वर्किंग को जारी रखा या फिर हाइब्रिड वर्किंग अपनाई।
हाइब्रिड वर्किंग का मतलब है- कुछ दिन दफ्तर आकर काम करना और कुछ दिन घर से काम करना। कितने दिन ऑफिस आना है और कितने दिन कहीं और से काम किया जा सकता है, इसके लिए अलग-अलग कंपनियों ने अपने हिसाब से नियम बनाए हैं।
घर से काम करने की सुविधा
नोएडा में एक टेक कॉन्टेंट कंपनी में काम करने वालीं स्वाति बताती हैं कि उनके दफ्तर में हाइब्रिड वर्किंग लागू है और यह उनके सहकर्मियों को भी पसंद है।
उन्होंने बीबीसी के सहयोगी आदर्श राठौर से कहा, “कोविड के बाद हालात सुधरे तो कहा गया कि जिनका काम घर से किया जा सकता है, उनके लिए ऑफिस आना ज़रूरी नहीं है। ऐसे में मैं ज़्यादातर समय अपने होमटाउन से ही काम करती हूं। जब कभी ज़रूरी होती है तो हम ऑफिस आ जाते हैं। हालांकि, ऐसा तभी होता है जब टीम के सदस्यों को मिलकर कुछ तैयार करना होता है।"
हाइब्रिड सेटअप का यही फ़ायदा है। एक ओर तो कर्मचारियों को घर से काम करने की सुविधा मिलती है, वहीं ऑफिस आकर वे मिलजुलकर भी काम कर सकते हैं।
देखने में तो काम करने के तरीक़े में यह लचीलापन सुविधाजनक लगता है, लेकिन कई बार यह सही से लागू नहीं हो पाता। लीसमैन के सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि कम उम्र के, और किसी दफ्तर में नए आए कर्मचारियों को ज़्यादा बार ऑफिस आना पड़ता है।
बीबीसी वर्कलाइफ़ के लेख के अनुसार, लंदन स्थित लीसमैन के संस्थापक और सीईओ टिम ओल्डमैन कहते हैं, "कर्मचारी जितनी कम उम्र का होगा और कंपनी में उसका कार्यकाल जितना कम होगा, उतनी ही ज़्यादा संभावना है कि उसे अपने वरिष्ठ और पुराने सहयोगियों की तुलना में ज़्यादा दिन ऑफिस आकर काम करना होगा।”
ऐसा कुछ उदाहरण भारत में भी मिल जाएंगे। दिल्ली के एक मीडिया संस्थान में कार्यरत अनुज (बदला हुआ नाम) बताते हैं कि उनके ऑफिस में हाइब्रिड सिस्टम अपनाया गया है, लेकिन टीम में नए, कम उम्र के और ख़ासकर अविवाहित कर्मचारियों को पुराने सहकर्मियों की तुलना में ज़्यादा बार ऑफिस आकर काम करना पड़ता है।
वह कहते हैं, “कुछ काम ऐसे हैं, जिन्हें घर से नहीं किया जा सकता। उसके लिए ऑफिस आना ही पड़ता है। ऐसे में कुछ टीमें घर से काम करती हैं, जबकि कुछ को दफ्तर आना होता है। इससे भी असंतोष पैदा होता है।”
सही से लागू न करने के नुकसान
हाइब्रिड सिस्टम में युवा कर्मचारियों को अक्सर दफ्तर बुलाए जाने और वरिष्ठ कर्मचारियों के घर से ज़्यादा काम करने के और भी कई नुक़सान हैं
लीसमैन के सीईओ ओल्डमैन कहते हैं कि भले ही जूनियर कर्मचारियों के मुक़ाबले, सीनियर कर्मचारियों को ज़्यादा लचीलापन देना स्वाभाविक लगता हो, लेकिन ऐसा करना हाइब्रिड वर्किंग की सफलता की राह में बाधा है।
वह कहते हैं, “अगर वरिष्ठ सहयोगी घर से ज़्यादा काम करेंगे तो दफ्तर आने वाले कम अनुभव वाले सहयोगियों को दिक्कत होगी। वहीं अगर वरिष्ठ सहयोगी भी बराबर ऑफिस आएंगे तो कम अनुभवी कर्मचारियों को सीखने को मिलेगा।”
कैलिफोर्निया में डिजिटल कम्युनिकेशन टेक कंपनी सिस्को के चीफ़ वाइस प्रेसिडेंट और एमडी जीतू पटेल ने बीबीसी वर्कलाइफ़ की एलेक्स क्रिस्चन को बताया कि जब तक इस समस्या को हल नहीं किया जाता, तब तक युवा कर्मचारियों की ग्रोथ रुकने का खतरा बना रहेगा।
वह कहते हैं कि इस मसले को इन पर्सन डेज़ तय करके हल किया जा सकता है। यानी वे दिन, जब सभी को दफ्तर आना होगा। लेकिन वह चिंता जताते हैं कि अगर इस संबंध में कोई सख़्त नियम बनाया जाएगा तो कर्मचारियों को लग सकता है कि कंपनी उनपर भरोसा नहीं करती।
वह कहते हैं, “सभी के लिए दफ्तर आने का नियम बनाने के बजाय हमने एक मॉडल अपनाया है। इसके तहत टीमों को छूट दी जाती है कि वह ख़ुद तय करे कि उन्हें कैसे काम करना है।”
हाइब्रिड सेटअप की और भी दिक्कतें
डॉ। आशीष शर्मा एक अंतरराष्ट्रीय औद्योगिक संगठन में कंसल्टेंट हैं। उन्हें लगता है कि कुछ विषय ऐसे होते हैं, जिन पर होने वाली मीटिंगों में इसलिए स्पष्टता नहीं बन पाती, क्योंकि ये वर्चुअली हो रही होती हैं।
बीबीसी सहयोगी आदर्श राठौर से आशीष कहते हैं, “वैसे तो वर्चुअल मीटिंग बहुत ही सुविधाजनक और असरदार होती है क्योंकि इसमें आप कहीं से भी जुड़ सकते हैं। लेकिन कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं, जिनमें आमने-सामने बैठकर बेहतर ढंग से बात हो सकती है।”
वो कहते हैं, “मगर हाइब्रिड सिस्टम में होता यह है कि कुछ सहकर्मी भले ऑफिस में हैं, लेकिन बाकी सहकर्मी अगर कहीं और हैं तो यह पूरी की पूरी बैठक वर्चुअल हो जाती है। इससे मीटिंग अनावश्यक ढंग से लंबी खिंच जाती है और कई बार तो किसी नतीजे पर पहुंचना मुश्किल हो जाता है।”
आशीष ऐसे अकेले नहीं हैं, लीसमैन के सर्वेक्षण के अनुसार, लगभग 40 फीसदी कर्मचारियों को हाइब्रिड बैठकों में हिस्सा लेना मुश्किल लगता है। चाहे वे वर्चुअली घर से भाग ले रहे हों, या फिर दफ्तर से।
ओल्डमैन कहते हैं कि आने वाले काफ़ी समय तक ये समस्या बनी रह सकती है। वह कहते हैं, “ये सॉफ्टवेयर की दिक्कत नहीं है। कई दफ्तर हाइब्रिड बैठकों के लिए तैयार नहीं है। पिछले पांच साल में हमारा काम बहुत बदल गया है, लेकिन हमारे दफ्तर महामारी से पहले वाले दौर के हिसाब से ही डिजाइन्ड हैं।”
भले ही कर्मचारियों को ये सुविधा पसंद हो, लेकिन इसका एक और नुक़सान है। लीसमैन का डेटा कहता है कि जो लोग कम दिन दफ्तर गए, उन्होंने बताया कि उनका वर्क लाइफ बैलेंस बहुत अच्छा हो गया है।
लेकिन, 42 फीसदी का कहना था कि जब वे दफ्तर की बजाय रिमोट वर्क कर रहे थे, तब उन्हें लगा कि उनका अपने सहकर्मियों के साथ सोशल कनेक्ट नहीं हो पा रहा।
ओल्डमैन कहते हैं, “ऐसा लगता है कि दफ्तर में आकर काम करना अभी भी किसी संस्थान या कंपनी के सामाजिक ताने-बाने को मज़बूत करता है। इस दिक्कत से कंपनियों और कर्मचारियों, दोनों को पार पाना होगा।”
हाइब्रिड वर्किंग से नाख़ुश बॉस
वॉशिंगटन में सोसाइटी फॉर ह्यूमन रीसोर्स मैनेजमेंट के अध्यक्ष और सीईओ जॉनी सी टेलर जूनियर कहते हैं कि कंपनियों में उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों का एक वर्ग ऐसा है, जो हाइब्रिड वर्किंग को उतना पसंद नहीं करता।
उन्होंने बीबीसी वर्कलाइफ़ को बताया कि कुछ मामलों में बॉस चाहते हैं कि हाइब्रिड सिस्टम दिक्कतों को दूर करने की बजाय कर्मचारियों को फिर से पूरी तरह ऑफिस में आकर काम करना चाहिए। वह कहते हैं कि कुछ सीईओ ने उन्हें बताया कि वे इस सिस्टम से परेशान हो गए हैं।
डिज़नी और इन्वेस्टमेंट कंपनी ब्लैकरॉक ने अमेरिका ने कर्मचारियों को अब चार दिन दफ्तर बुलाना शुरू किया है और नाइकी भी अगले साल से ऐसा करने वाली है।
लेकिन सोसाइटी फॉर ह्यूमन रीसोर्स मैनेजमेंट के अध्यक्ष टेलर का कहना है कि हाइब्रिड व्यवस्था कई जगहों पर बनी रहेगी, क्योंकि बहुत से कर्मचारी ऐसे होंगे, जिन्हें पूरी तरह ऑफिस काम करने के लिए बुलाया जाएगा तो वे इनकार कर देंगे या फिर नौकरी ही छोड़ देंगे।
ऐसा भारत में भी हो रहा है। बंगलुरु की एक कंसल्टिंग कंपनी में काम कर रहे रोहित पराशर ने बीबीसी सहयोगी आदर्श राठौर को बताया कि उनकी पिछली कंपनी ने हाइब्रिड सिस्टम ख़त्म कर दिया था, जिसके बाद उन्होंने नई नौकरी तलाश करना शुरू कर दिया था। अब वह ऐसी कंपनी में काम कर रहे हैं, जहां उन्हें स्थायी तौर पर रिमोट वर्किंग की सुविधा दी गई है।
क्या है समाधान?
लंदन में स्टैंडर्ड चार्टड बैंक में मुख्य मानव संसाधन अधिकारी तनुज कपिलाश्रमी का मानना है कि हाइब्रिड वर्किंग की चुनौतियों को सुलझाया जा सकता है।
उनकी फ़ील्ड ऐसी है, जिसमें ज्यादातर काम रीमोट वर्किंग से नहीं हो सकता। लेकिन उनका कहना है कि यह देखा गया कि कौन से काम रिमोट वर्किंग से हो सकते हैं, उसके आधार पर ऑफिस आने या रिमोट करने की नीति बनाई गई है।
उन्होंने बीबीसी वर्कलाइफ़ से कहा, “यह व्यवस्था आगे भी बनी रहेगी। इसलिए, इससे वर्क कल्चर ख़राब होने की चिंता करने के बजाय इसमें आने वाली समस्याओं के समाधान के तरीक़े ढूंढने चाहिए।”
वहीं, लीसमैन के संस्थापक और सीईओ टिम ओल्डमैन कहते हैं कि काम करने की जो व्यवस्था कई दशकों में बनी है, उसमें बदलाव आने में समय लगेगा।
वह कहते हैं, “अभी महामारी के बाद एक ही साल बीता है। हाइब्रिड वर्किंग का किसी संस्थान के माहौल, वर्क कल्चर, कर्मचारियों के सीखने और उनके करियर पर क्या असर हुआ है, इसका अध्ययन तभी किया जा सकेगा, जब यह व्यवस्था कई दशकों तक चले।”
