सिंहासन बत्तीसी : बीसवीं पुतली ज्ञानवती की कहानी

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अब उसका विश्वास अपने ज्योतिष ज्ञान से उठने लगा। उसका दोस्त उसका उपहास करने लगा तो वह चिढ़कर बोला, 'चलो चलकर राजा विक्रमादित्य के पांव देखते हैं। अगर उनके पांवों पर कमल चिन्ह नहीं हुआ तो मैं समूचे ज्योतिष शास्‍त्र को झूठा समझूंगा और मान लूंगा कि मेरा ज्योतिष अध्ययन बेकार चला गया।'

वे लकड़हारे को छोड़ उज्जैन नगरी को चल पड़े। काफी चलने के बाद राजमहल पहुंचे। राजमहल पहुंचकर उन्होंने विक्रमादित्य से मिलने की इच्छा जताई। जब विक्रम सामने आए तो उन्होंने उनसे अपना पैर दिखाने की प्रार्थना की।

विक्रम का पैर देखकर ज्योतिषी सन्न रह गया। उनके पांव भी साधारण मनुष्यों के पांव जैसे थे। उन पर वैसी ही आड़ी-तिरछी रेखाएं थीं। कोई कमल चिन्ह नहीं था। ज्योतिषी को अपने ज्योतिष ज्ञान पर नहीं, बल्कि पूरे ज्योतिष शास्‍त्र पर संदेह होने लगा।



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