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नींद में.........
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अरुंधती अमड़ेकरकितनी अच्छी होती है ये नींद,इसकी गिरफ्त में,न हम, हम रहते हैं, न आप, आप,भूल जाते हैं, हम कौन हैं, क्या हैं,और क्यों हैं?इसकी गिरफ्त में,न डर मौत कान फिक्र जिंदगी की,न उलझने रास्तों कीऔर न अफसोसमंजिल तक न पहुँच पाने का,भूल जाते हैं सब कुछ,इसकी गिरफ्त में,दुश्मनी किसी दोस्त की,दोस्ती किसी दुश्मन कीभूल जाते हैं,दर्द, खुश, गम, जज्बात, रिश्तेऔर इनके जैसे कई शब्दजो जिंदगी को जोड़ते हैं, तोड़ते हैं,सँवारते हैं, बिखेरते हैं,भूल जाते हैं,इसकी गिरफ्त में,जागती आँखों से देखे सपनों को,भूल जाते हैं उन्हें पूरा करने के बोझ को,और खो जाते हैं उन अजनबी सपनों में,जिनका बरसों से कोई नाता ही नहीं रहा हमसेफिर भी मजबूर हैं हम,इन्हें देखने और इनमें खोने के लिएइतना ही नहीं,मजबूर हैं हम जागने और फिर से हकीकत में आने के लिए भी,क्योंकि,सपने जहाँ खत्म होते हैं, हकीकत वहाँ से शुरू होती है,और नींद जहाँ पर खत्म होती है, सुबह वहीं से शुरू होती है.....