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Written By ND

'शुक्कर है...'

रिश्तेदार इंसान
- नीता श्रीवास्तव

वे जब भी आमंत्रित करते हैं, खूब स्वागत करते हैं। हर बार कोई नई नफीस कीमती चीज दिखाते हैं। हर बार अपनी उच्चकोटि की पसंद की... बेजोड़ साजो-सामान की तारीफों के पुल बाँधते-बाँधते अपने बड़े-बड़े रिश्तेदारों, मित्रों का बखान करने लगते हैं। कोई अमेरिका में है तो कोई देश में ही 'बहोऽत' बड़ा आदमी है।

इंसान और सामान में कोई फर्क नहीं। बस... पैसेवाला हो या कीमती हो तो दोनों बड़े और बेजोड़! जब भी मैं उनसे मिली, चूहे को चिंदी मिलने वाली कहानी हर बार याद आई।

कल भी हम आमंत्रित थे कि अचानक ही उनकी माताजी गाँव से आ गईं। न चिट्ठी-न फोन! हड़कंप मच गया घर में। माताजी अपने झोले-झंडे के संग बड़ी प्रसन्न...। हम पहले भी मिल चुके थे, आते ही मुझे भी गले लगाया मगर उनके सुपुत्रजी की हालत देखने लायक थी। वे कभी अपने ड्राइंग रूम को और कभी अपनी माताजी के लाए सामान को देख रहे थे। बाबा आदम के जमाने की पेटी, पानी की छागल और एक बड़ा कनस्तर... वह भी ताला जड़ा हुआ... देख-देख वे पानी-पानी हुए जा रहे थे।

सब्र का बाँध टूट गया, 'ये पीपा क्यों उठा लाईं दो कौड़ी का... चाबी दो... इसमें है क्या?' वे शर्म से बेजार, डिब्बा खाली करने लगे। घर के कुटे मसाले... बड़ी-बिजोरे... सूखी सेंगरी-काचरी.. गुड़पट्टी-शकरपारे... छोटी-छोटी पुड़ियाएँ...। माँ का खजाना दो कौड़ी का। गुस्से से भन्नाए जा रहे थे वे, 'कम से कम सोचा तो होता किसके घर जा रही हो?' बड़बड़ाते हुए उसी वक्त पीछे के दरवाजे से खाली डिब्बा बाहर फेंक दिया। माताजी लरज उठीं, 'क्यों फेंक दिया.. आठ रुपए की डिबिया मँगाकर पेंट किया था मैंने।'

ढनढनाते कनस्तर का शोर पलभर में थम चुका था, पर उस माँ की आँखों में सैकड़ों नादों के शोर से भी ज्यादा शोर मचाता मूक आर्तनाद मैंने सुना। संभवतः वह सिर्फ मैंने ही सुना था, तभी तो बाकी सभी लोग चुप थे और मेरे मुँह से अनायास ही निकल गया- 'शुक्कर है... सिर्फ पीपा ही फेंका।'