लेखन केवल कागज़ पर ही नहीं होता-तेजेन्द्र शर्मा

ND|
मधु : आप अपनी रचना प्रक्रिया के दौरान किस मानसिकता से गुज़रते हैं?

तेजेन्द्र : मेरे लिए रचना प्रक्रिया कोई नियमबद्ध कार्यक्रम नहीं है। यह एक निरंतर प्रक्रिया है। आसपास कुछ न कुछ घटित होता है जो कि मन को उद्वेलित करता है। दिल और दिमाग़ दोनों ही उस के बारे में जुगाली करते रहते हैं। और फिर एकाएक रचना पहले दिमाग़ में और फिर पन्नों पर जन्म लेती है। कहानी के मुकाबले मैं पाता हूँ कि कविता के लिए उतना सोचना नहीं पड़ता। गज़ल या कविता जैसे स्वयं उतरती चली आती है। कई बार ऐसा भी हुआ है कि रेलगाड़ी चलाते हुए एक शेर दिमाग़ में आ गया, तो पाया कि बीच में ब्रेक होते-होते पूरी ग़ज़ल उतर आती है।

यदि मैं चाहूँ भी तो सायास ग़ज़ल या कविता नहीं लिख पाता जबकि कहानी के लिए रोज़ाना कुछ पन्ने काले किए जाते हैं चाहे उन्हें खारिज ही क्यों न करना पड़े। मेरे पहले ड्राफ़्ट में खासी काटा पीटी होती है क्योंकि मैं लिखते-लिखते ही सुधार भी करता जाता हूँ। कहानी लिखने की प्रक्रिया में कंसंट्रेशन अधिक समय तक बनाए रखनी पड़ती है। मेरी एक कोशिश ज़रूर रहती है कि मैं अपने चरित्रों की मानसिकता, सामाजिक स्थिति एवं भाषा स्वयं अवश्य समझ लूँ, तभी अपने पाठकों से अपने चरित्रों का परिचय करवाऊँ।
मधु : अभी हाल ही में, यानी कि वर्ष 2006 में आपके दो अनुवादित कहानी संग्रह 'पासपोर्ट का रङहरू' नेपाली में और 'ईंटों का जंगल' उर्दू में प्रकाशित हुए हैं। उर्दू के कहानी संग्रह का लंदन में भव्य विमोचन हुआ और उसकी खासी चर्चा भी हो रही है जबकि नेपाली संग्रह का विमोचन भी लंदन की नेपाली येती संस्था ने करवाया। इतनी चर्चा के बाद आपको कैसा लग रहा है?
तेजेन्द्र : वैसे तो पहले भी मेरा एक कहानी संग्रह पंजाबी (गुरमुखी) में अनुवादित हो चुका है। किन्तु उसकी इतनी चर्चा नहीं हो पाई थी। इंटरनेट आजकल बात को देश विदेश में फैलाने में खासा सहायक होता है। दरअसल मैं अनुवाद को एक बहुत अहम प्रक्रिया मानता हूँ। दूसरी भाषाओं में क्या लिखा जा रहा है, यह जानने के लिये अनुवाद सबसे बेहतरीन तरीका है। एक सामान्य व्यक्ति अपने जीवन में दो या तीन ज़बानें ही सीख सकता है। यदि उसे किसी अन्य भाषा के साहित्य की जानकारी हासिल करनी है तो अनुवाद से बेहतर तरीका क्या हो सकता है?
एशियन कम्यूनिटी आर्ट्‌स नें मेरे कहानी संग्रह के विमोचन को भारत-पाकिस्तान की एकता से जोड़ कर मेरे कहानी संग्रह पर बहुत अधिक ज़िम्मेदारी का बोझ डाल दिया है। मुझे उम्मीद है कि उर्दू के पाठकों को मेरी कहानियाँ निराश नहीं करेंगी। मुझे पूरी उम्मीद है कि उर्दू में हिन्दी की तरह गुटबाज़ियाँ नहीं होंगी और साहित्य को साहित्य की तरह लिया जाता होगा। इसी तरह सही प्रतिक्रियाएँ मिल पायेंगी। वैसे यह सच है कि जब पुस्तक की चर्चा होती है तो लेखक को तो अच्छा लगता ही है।
मधु : लंदन में आने के बाद निश्चित ही आपके नज़रिए में परिवर्तन आया होगा। इससे पहले भी आप कई बार पूरी दुनिया घूम चुके हैं। आप इस सारे परिदृश्य में हिंदी लेखन को कहाँ पाते हैं?

तेजेन्द्र : देखिए पहले मैं एक एअरलाइन के क्रू मेंबर की हैसियत से विदेश जाया करता था। विदेश के जीवन को एक तयशुदा दूरी से देखता था, उसे उतनी गहराई से महसूस नहीं कर पाता था जितना कि आज। मेरा आज का संघर्ष मुझे अप्रवासी भारतीय की सभी दिक्कतों और सुविधाओं से परिचय करवाता है। मुझे लगता है कि भारत के बाहर यदि कहीं हिंदी साहित्य की रचना बड़े पैमाने पर हो रही है तो वो है यूनाइटेड किंगडम। यू.के. ने मॉरीशस से यह स्थान हथिया लिया है।
यहाँ कविता में सत्येन्द्र श्रीवास्तव, गौतम सचदेव, रूपर्ट, सोहन राही, मोहन राणा, उषा राजे सक्सेना, पदमेश गुप्त, प्राण शर्मा, तितिक्षा शाह, डा. कृष्ण कुमार और उषा वर्मा सक्रिय हैं तो कहानी विधा में उषा राजे सक्सेना, दिव्या माथुर, शैल अग्रवाल, गौतम सचदेव, कादंबरी मेहरा, महेन्द्र दवेसर निरंतर लिख रहे हैं। साथ ही अचला शर्मा रेडियो नाटक के जरिए, नरेश भारतीय लेखों और निबंधों के जरिए एवं भारतेंदु विमल एवं प्रतिभा डावर उपन्यास के क्षेत्र में अपनी उपस्थिति का आभास करवाते रहते हैं। वैसे अमरीका में सुषम बेदी और उषा प्रियंवदा व नार्वे में सुरेश चंद्र शुक्ल भी निरंतर लिख रहे हैं। आज हिंदी साहित्य का सबसे महत्वपूर्ण काम लंदन में हो रहा है और यहाँ यू.के. हिंदी समिति, कथा (यू.के.), वातायन, कृति यू.के., गीतांजलि बहुभाषीय सोसाइटी, भारतीय भाषा संगम जैसी संस्थाएँ खासतौर पर बहुत सक्रिय हैं। वैसे यह सच है कि ब्रिटेन से हिंदी की पहली कालजयी रचना के लिए अभी भी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।



और भी पढ़ें :