- धर्म-संसार
» - ज्योतिष
» - नवग्रह
शनि
शनि मकर और कुम्भ राशि के स्वामी हैं तथा इनकी महादशा 19 वर्ष की होती है। शनि के अधिदेवता प्रजापिता ब्रह्मा और प्रत्यधिदेवता यम हैं। इनका वर्ण कृष्ण, वाहन गिद्ध तथा रथ लोहे का बना हुआ है। ये एक-एक राशि में तीस-तीस महीने रहते हैं। शनि भगवान सूर्य तथा छाया (संवर्णा) के पुत्र हैं। ये क्रूर ग्रह माने जाते हैं।शनि ग्रह का स्वरूप* शनैश्चर की शरीर-कान्ति इंद्रनीलमणि के समान है।* इनके सिर पर स्वर्णमुकुट, गले में माला तथा शरीर पर नीले रंग के वस्त्र सुशोभित हैं।* शनि गिद्ध पर सवार रहते हैं।* ये हाथों में धनुष, बाण, त्रिशूल और वरमुद्रा धारण करते हैं।शनि के क्रूर होने के कारणशनि की दृष्टि में जो क्रूरता है, वह इनकी पत्नी के शाप के कारण है। ब्रह्मपुराण के अनुसार बचपन से ही शनि देवता भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त थे। वे श्रीकृष्ण के अनुराग में निमग्न रहा करते थे।वयस्क होने पर इनके पिता ने चित्ररथ की कन्या से इनका विवाह कर दिया। इनकी पत्नी सती-साध्वी और परम तेजस्विनी थी। एक रात वे ऋतु-स्नान करके पुत्र-प्राप्ति की इच्छा से इनके पास पहुँचीं, पर ये श्रीकृष्ण के ध्यान में निमग्न थे। इन्हें बाह्य संसार की सुधि ही नहीं थी।पत्नी प्रतीक्षा करके थक गई। उसका ऋतुकाल निष्फल हो गया। इसलिए उसने क्रुद्ध होकर शनिदेव को शाप दे दिया कि आज से जिसे तुम देख लोगे, वह नष्ट हो जाएगा।ध्यान टूटने पर शनिदेव ने अपनी पत्नी को मनाया। पत्नी को भी अपनी भूल पर पश्चाताप हुआ, किंतु शाप के प्रतीकार की शक्ति उसमें न थी, तभी से शनि देवता अपना सिर नीचा करके रहने लगे। क्योंकि ये नहीं चाहते थे कि इनके द्वारा किसी का अनिष्ट हो।शनि ग्रह की विशेषताज्योतिषशास्त्र के अनुसार शनि ग्रह यदि कहीं रोहिणी-शकट भेदन कर दे तो पृथ्वी पर बारह वर्ष घोर दुर्भिक्ष पड़ जाए और प्राणियों का बचना ही कठिन हो जाए। शनि ग्रह जब रोहिणी का भेदन कर बढ़ जाता है, तब यह योग आता है।ऐसा ही योग महाराज दशरथ के समय में आने वाला था। जब ज्योतिषियों ने महाराज दशरथ से बताया कि यदि शनि का योग आ जाएगा तो प्रजा अन्न-जल के बिना तड़प-तड़प कर मर जाएगी। प्रजा को इस कष्ट से बचाने के लिए महाराज दशरथ अपने रथ पर सवार होकर नक्षत्र मंडल में पहुँचे।
सर्वप्रथम महाराज दशरथ ने शनि देवता को प्रणाम किया और बाद में क्षत्रिय-धर्म के अनुसार उनसे युद्ध करते हुए उन पर संहारास्त्र का संधान किया। शनि देवता महाराज की कर्तव्यनिष्ठा से परम प्रसन्न हुए और उनसे वर माँगने के लिए कहा। महाराज दशरथ ने वर माँगा कि जब तक सूर्य, नक्षत्र आदि विद्यमान हैं, तब तक आप शकट-भेदन न करें। शनिदेव ने उन्हें वर देकर संतुष्ट कर दिया।शनि ग्रह शांति उपाय* शनि की शांति के लिए महामृत्युंजय-जप करना चाहिए।* नीलम धारण करने से भी शनि का प्रकोप शांत होता है।* ब्राह्मण को तिल, उड़द, भैंस, लोहा, तेल, काला वस्त्र, नीलम, काली गौ, जूता, कस्तूरी और सुवर्ण का दान देना चाहिए।शनि की उपासनाशनि की उपासना के लिए निम्न में से किसी एक मंत्र अथवा सभी का श्रद्धानुसार नियमित एक निश्चित संख्या में जप करना चाहिए। जप का समय संध्याकाल तथा कुल जप संख्या 23000 होनी चाहिए।वैदिक मंत्र-ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।शं योरभि स्रवन्तु नः॥पौराणिक मंत्र-नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामी शनैश्चरम्॥बीज मंत्र-ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः।सामान्य मंत्र-ॐ शं शनैश्चराय नमः।