जो लोग खानाबदोश है या जो बहुत ज्यादा भ्रमण कर्ता है सचमुच ही उनके जीवन में ढेर सारे अनुभवों के साथ ही ढेर सारी शांति होती है। यह अनुभव और शांति ही उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का आधार बनती है।
ND
आपने जाना होगा ही हमारे साधु-संत कभी भी एक जगह नहीं ठहरते हैं। भ्रमण करते ही रहते हैं। जैन और बौद्ध भिक्षुओं के जीवन में तो पैदल चलना ही लिखा होता है। सचमुच ही विहार करने या टहलने का मजा ही कुछ और है। यह एक ऐसी क्रिया है जिससे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के अलावा आध्यात्मिक लाभ भी प्राप्त किया जा सकता है।
सुहानी सुबह : टहलने या पैदल चलने जैसा सर्वोपयोगी योग व्यायाम कोई दूसरा नहीं। चिकित्साविद् भी इसके समर्थन में एकमत है। प्रभात काल में ही टहलना उचित माना गया है क्योंकि उस दौरान सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणों का, वायु की दृष्टि से ऑक्सिजन की अधिकता रहती है, जिसके अनेक लाभ हैं।
टहलने का आनंद : देखें आस-पास खड़े हरे-भरे वृक्षों को जो तुम से कहीं ज्यादा जिंदा और होशपूर्ण है। प्यारी-सी निर्धूप सुबह को अपनी साँसों में भर लें। यदि धुँध हो तो मजा दौगुना समझे। आँखों को प्यार से दो-तीन बार झपकाएँ और फेंफड़े में भरी हवा को पूरी तरह से बाहर निकालते हुए ताजी हवा का मजा लें। दिल से एक बार गाना गुनगुनाएँ वह जो आपको बहुत ही पसंद है।
जब कदम लड़खड़ाएँ : जब लड़खड़ा जाएँ कदम तो संभलकर चलने में जान आ जाती है, इसका अपना ही मजा है। इस मजे को चूके नहीं। टहलते वक्त लड़खड़ा जाएँ तो यह घटना तुम्हारे शरीर को कुछ देर के लिए सजग कर देगी, जिससे शरीर में जाग्रती और अंगों में संचार होगा। आप इसे सकारात्मक लें। स्वयं की चेतना को जाग्रत करने की इसे एक विधि मानें। इससे सजगता बढ़ेगी।
ND
पैरों का सम्मान करें : जाने कि आपके पैर कितने मेहनती और सुंदर है जिन पर आपको भरोसा न भी हो तो भी वह नि:स्वार्थ आपके हर काम में आगे रहते हैं। क्या आपने कभी इन्हें धन्यवाद कहा? क्या कभी पैरों की अँगुलियों को कहा की तुम कितनी सुंदर हो। अपने पैरों में भरोसा जगाओं। पैर जब भूमि पर रखें तो होशपूर्वक रखें। उन्हें हर कहीं न रखें। आखिर आपके पैर है।
टहलने के नियम : टहलना एक कला है। टहलते वक्त मुँह बंद रखें। गहरी साँस लें। अधूरी साँस से फेंफड़ों को भी आपके टहलने का मजा नहीं मिलता। कंधे सीधे और पीछे हों। सीना उभरा हुआ और सिर थोड़ा पीछे की ओर तथा निगाहें सतर्क तथा होशपूर्ण हों।
टहलने की जगह : कच्ची या पक्की सुनसान सड़क हो जिसके किनारे वृक्ष हो। जंगल का रास्ता हो या गॉर्डन की हरी घास हो। सबमें सुंदर समुद्र का किनारा हो तो फिर बात ही क्या। टहलो शहर के कोलाहल से दूर और पैरों को टहलने का मजा लेने दो।
टहलते वक्त कपड़े कुछ इस तरह के हो जो न ज्यादा ढीले और न चुस्त हो। कपड़े उतने ही पहने जितने से लज्जा ढकने या अधिक सर्दी-गर्मी के दुष्प्रभाव से बचा जा सके। जूते या चप्पल एड़ी वाले न हो।
कैसे टहलें : क्रमबद्ध, गतिबद्ध और व्यवस्थित क्रम से देर तक चलें। भिक्षुओं जैसा धीरे-धीरे चलते हुए गाँधी जी जैसा तेज चलने लगें, फिर धीर-धीरे चले। चलने में लय लाएँ। ध्यान रहे की पैरों को समानान्तर रखते हुए चलें। सपाट या समतल भूमि पर ही पैर रखें। जाने कि टहलना भी एक कला है।
ND
टहलने के लाभ : बिना किसी अतिरिक्त आसन या प्राणायम के हृदय या अन्य अंगों को पोषण देने वाली बंद हो चुकी धमनियों में नई कोलेट्रल्स बनने लगती हैं..और जो मौजूद हैं वे खुल जाती हैं तथा उनको प्राणवायु और पौष्टिक आहार कुछ मात्रा में मिलने लगता है, इससे अंगों के जीवन की रक्षा संभव हो पाती है। यही कारण है कि चिकित्सक तेज चलने (ब्रिस्क वॉक) की सलाह देते हैं।
टहलने से उर्जा का संचार होता है। रक्त वाहिनियों में रक्त का संचार सुचारू रूप से चलता है। साँसों में संयम और लय आने से मानसिक संतुलन और शांति मिलती है।
आध्यात्मिक लाभ : इसका आध्यात्मिक लाभ यह है कि टहलने की क्रिया को ही यदि आप ध्यान विधि समझे और होशपूर्वक आनंद लेते हुए टहले तो इसके अनेक आध्यात्मिक लाभ भी मिलना शुरू होंगे। बौद्ध भिक्षु इसका खूब उपयोग करते थे।