आदमी चिंताओं का पुतला
योग अपनाएं चिंताओं से मुक्त हो जाएं
आधुनिक जीवन में व्यक्ति अनेक चिंताओं से ग्रसित है, जैसे परिवार की चिंता, आपसी स्त्री-पुरुषों के संबंध, आत्मसम्मान को बनाए रखना, लोग क्या कहेंगे, बच्चों का भविष्य, महँगाई में जीवन जीना, आतंकवाद, आपसी परिवार में संबंध, वजन बढ़ने या घटाने की चिंता, काम-धंधे के उतार-चढ़ाव को लेकर चिंता, बुढ़ा होने की चिंता, स्वास्थ्य व भविष्य के प्रति चिंता और सो गए तो उठने की चिंता उठ गए तो हजारों तरह की आदि अनेक बातों से व्यक्ति घिरा हुआ हैं।सभी तरह की चिंताओं से चिंतित रहने से क्या कोई लाभ मिला? चिंता करने से भी जीवन में कोई बदलाव नहीं हुआ और नहीं करने से भी। जबकि चिंतित रहने से हमने अपनी चिंतन शक्ति को खोया, आत्म विश्वास को खोया और दोनों के खो जाने से सबकुछ खोया। तो क्यों न सभी तरह की समस्याओं को ताक में रखकर हम खुश रहते हुए योग करें जो हमें चिंताओं से दूर करें।1.
नाड़ीशोधन प्राणायाम : कमर-गर्दन सीधी रखकर एक नाक से धीरे-धीरे लंबी गहरी श्वास लेकर दूसरे स्वर से निकालें, फिर उसी स्वर से श्वास लेकर दूसरी नाक से छोड़ें। 10 बार यह प्रक्रिया करें।इसका लाभ : चिंता से घिरे व्यक्ति की श्वासें उखड़ी-उखड़ी रहती है जिसके कारण मस्तिष्क में पर्याप्त मात्रा में ऑक्सिजन संचार नहीं हो पाता और व्यक्ति अशांत रहता है। तो नाड़ी शोधन प्राणायाम से सर्वप्रथम तो हमें अपनी श्वासों को ही सही गति और दिशा देना होगी। इससे हृदय और मस्तिष्क में शांति मिलती है।2 .
ध्यान : आँखें बंद कर मन को सामान्य श्वास-प्रश्वास पर लगाते हुए श्वास भीतर आने और श्वास बाहर निकालते समय नासाग्र पर ध्यान दें। ऐसा लगभग 5 से 10 मिनट करें। यह ध्यान की सामान्य प्रक्रिया है। आप चाहें तो आँखें बंद कर सिर्फ श्वांसों के आवागमन पर ही ध्यान देते रहे।इसका लाभ : ध्यान करते रहने से हमारे मस्तिष्क में ऑक्सिजन का भरपूर संचार होता है और मन-मस्तिष्क पूर्णत: शांत रहता है। यदि मस्तिष्क शांत है तो व्यक्ति निश्चिंत जीवन शैली को अपनाता है। ध्यान करते रहने से शक्ति और आत्मविश्वास का अहसास होने लगता है।3.
ब्रह्ममुद्रा : वज्रासन में या कमर सीधी रखकर बैठें और गर्दन को 10 बार ऊपर-नीचे चलाएँ। दाएँ-बाएँ 10 बार चलाएँ और 10 बार सीधे-उल्टे घुमाएँ।इसका लाभ : ब्रह्ममुद्रा से हमारे चेहरे पर जवानी बनी रहती है। जिन लोगों को सर्वाइकल स्पोंडलाइटिस, थाइराइड ग्लांट्स की शिकायत है उनके लिए यह आसन लाभदायक है। इससे गर्दन की माँसपेशियाँ लचीली तथा मजबूत होती हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से भी यह आसन लाभदायक है। 4.
मार्जायासन : इसे मार्जारी आसन भी कहते हैं। चौपाये (गाय या भैस) की तरह घुटने के बल होकर गर्दन और कमर को ऊपर-नीचे 10 बार चलाना चाहिए। इसके बाद पुठ्ठों को आगे-पीछे करते हुए क्लाक वाइज और एंटी क्लाक वाइज घुमाएँ।इसका लाभ : यह पेट, कमर, गर्दन, कंधें, रीढ़ की हड्डी के लिए तो लाभदायक है ही साथ ही यह यौन रोग से भी बचाकर यौन शक्ति बढ़ाता है। मार्जारी आसन पीठ और कमर की मांसपेशियों के तनाव को कम करने में सहायक है। इससे रीढ़ की तंत्रिकाओं में स्फूर्ति आती है।5.
उष्ट्रासन : घुटनों पर खड़े होकर पीछे झुकते हुए एड़ियों को दोनों हाथों से पकड़कर गर्दन पीछे झुकाएँ और पेट को आगे की तरफ उठाएँ। 10-15 श्वास-प्रश्वास करें।इसका लाभ : इस आसन से घुटने, ब्लडर, किडनी, छोटी आँत, लीवर, छाती, लंग्स एवं गर्दन तक का भाग एक साथ प्रभावित होता है, जिससे कि उपर्युक्त अंग समूह का व्यायाम होकर उनका निरोगीपन बना रहता है। श्वास, उदर, पिंडलियों, पैरों, कंधे, कुहनियों और मेरुदंड संबंधी रोग में लाभ मिलता है। उदर संबंधी रोग, जैसे कॉस्ट्रयूपेशन, इनडाइजेशन, एसिडिटी रोग निवारण में इस आसन से सहायता मिलती है। गले संबंधी रोगों में भी यह आसन लाभदायक है। 6.
शशकासन : शशक का अर्थ होता है खरगोश। इस आसन को करते वक्त खरगोश की आकृति-सी स्थिति हो जाती है। वज्रासन में बैठकर सामने झुककर 10-15 बार श्वास-प्रश्वास करें।इसका लाभ : ह्रदय रोगियों के लिए यह आसन लाभकारी है। पेट, कमर व कूल्हों की चर्बी कम कर आँत, यकृत, अग्न्याशय व गुर्दो को बल प्रदान करता है। तनाव, क्रोध, चिड़चिड़ापन आदि को दूर करता है।7.
मत्स्यासन : वज्रासन या पद्मासन में बैठकर कोहनियों की मदद से पीछे झुककर गर्दन लटकाते हुए सिर के ऊपरी हिस्से को जमीन से स्पर्श करें और 10-15 श्वास-प्रश्वास करें।इसका लाभ : इससे आँखों की रोशनी बढ़ती है। गला साफ रहता है तथा छाती और पेट के रोग दूर होते हैं। रक्ताभिसरण की गति बढ़ती है, जिससे चर्म रोग नहीं होता। दमे के रोगियों को इससे लाभ मिलता है। पेट की चर्बी घटती है। खाँसी दूर होती है। 8.
सर्वांगासन : पीठ के बल लेटकर हाथों की मदद से पैर उठाते हुए शरीर को काँधों पर रोकें। 10- 15 श्वास-प्रश्वास करें।इसका लाभ : थायराइड एवं पिच्युटरी ग्लैंड के मुख्य रूप से क्रियाशील होने से यह कद वृद्धि में लाभदायक है। दमा, मोटापा, दुर्बलता एवं थकानादि विकार दूर होते है। इस आसन का पूरक आसन मत्स्यासन है, अतः शवासन में विश्राम से पूर्व मत्स्यासन करने से इस आसन से अधिक लाभ प्राप्त होते हैं। 9.
भुजंगासन : पीठ के बल लेटकर हथेलियाँ कंधों के नीचे जमाकर नाभि तक उठाकर 10-15 श्वास-प्रश्वास करें।इसका लाभ : यह आसन फेफड़ों की शुद्धि के लिए भी बहुत अच्छा है और जिन लोगों का गला खराब रहने की, दमे की, पुरानी खाँसी अथवा फेंफड़ों संबंधी अन्य कोई बीमारी हो, उनको यह आसन करना चाहिए। इससे पेट की चर्बी घटाने में भी मदद मिलती है और आयु बढ़ने के कारण से पेट के नीचे के हिस्से की पेशियों को ढीला होने से रोकने में सहायता मिलती है।10.
धनुरासन : पेट के बल लेटकर दोनों टखनों को पकड़कर गर्दन, सिर, छाती और घुटनों को ऊपर उठाकर 10-15 श्वास-प्रश्वास करें।इसका लाभ : धनुरासन पेट की चर्बी तेजी से घटाने में मददगार है। इससे सभी आंतरिक अंगों, मांसपेशियों और जोड़ों का व्यायाम हो जाता है। गले के तमाम रोग नष्ट होते हैं। पाचन शक्ति बढ़ती है। इससे कब्ज की समस्या दूर होती है और पाचन क्रिया में सुधार होता है. लीवर की कार्यक्षमता नियमित होती है और अग्नाशय और एड्रिनल ग्रंथी भी उचित स्राव करने लगती है।11.
शवासन : पीठ के बल लेटकर, शरीर ढीला छोड़कर 10-15 श्वास-प्रश्वास लंबी-गहरी श्वास लेकर छोड़ें तथा 30 साधारण श्वास करें और आँखें बंद रखें।इसका लाभ : आंतरिक अंग सभी तनाव से मुक्त हो जाते हैं, जिससे कि रक्त संचार सुचारु रूप से प्रवाहित होने लगता है। और जब रक्त सुचारु रूप से चलता है तो शारीरिक और मानसिक तनाव घटता है। खासकर जिन लोगों को उच्च रक्तचाप और अनिद्रा की शिकायत है, ऐसे मरीजों को शवासन अधिक लाभदायक है।