हर जनम में पाऊँ कन्या रूप
मुझे गर्व है लड़की होने पर
समुद्र के गर्भ में छिपे सीप की कोख में पलते मोती की नैसर्गिक चमक, बंद कोंपलों में खिलते फूल का मादक यौवन या फिर तपती धरती पर नीले नभ से गिरी बारिश की पहली बूँद की शीतलता ... ये सभी सृजन के रूप हैं ... प्रकृति ने यही वरदान स्त्री को भी दिया है। उसकी कोख से जन्मी बेटियाँ ही इस वरदान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाती हैं। वह दौर बीत गया जब लड़कियों के जन्म पर शोक छा जाता था। आज तो बेटियाँ वो पावन दुआएँ हैं, जो हर क्षेत्र में अपनी सफलता के लिए आदर्श बन रही हैं। आज की नारी इन सभी पुराने अंधविश्वासों व रूढ़ियों पर विजय पाकर अपनी श्रेष्ठता का प्रतिपादन कर रही है। आज हर नारी को अपने कन्या रूप में जन्म लेने पर शर्म नहीं बल्कि गौरव महसूस होता है। हमने महिला सशक्तिकरण के इस दौर में कई महिलाओं से चर्चा की व जाना कि क्या वे अगले जन्म में फिर से लड़की के रूप में जन्म लेना चाहेंगी या नहीं? यूनाईटेड नेशन डेवलपमेंट प्रोजेक्ट में प्रोजेक्ट स्पेशलिस्ट इन रिसर्च में काम करने वाली भोपाल की अर्पिता नाहर मानती हैं कि लड़की होना मेरे लिए एक गर्व की बात है। मैं मानती हूँ कि लड़की में वो खूबी होती है कि वो दूसरों के नजरिये को समझ सकती है, सभी को बेहतर तरीके से जान सकती है, चूँकि मुझे अपने कार्यक्षेत्र में रूरल डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत कई गाँवों में जाकर ग्रामीणों से मिलकर उनकी समस्याएँ जाननी होती है। तब मैं स्वयं इस बात को महसूस करती हूँ कि किसी लड़की को वो बेहतर तरीके से अपनी समस्याएँ बताते हैं क्योंकि उन्हें विश्वास होता है कि एक लड़की उनकी समस्या को अच्छे से समझ सकती है। वो मुझे खुलकर अपनी परेशानियाँ बताते हैं और मैं भी बेहतर तरीके से उन्हें समझने का प्रयास करती हूँ।लड़कियों की एक और खूबी होती है और वो है सहनशीलता। लड़की हर कठिनाई की घड़ी में अपने इस गुण का परिचय देती है। मैं एक लड़की हूँ, जिसे अपनी प्रोफेशनल व पर्सनल लाइफ में बैलेंस करना बखूबी आता है। हमारे समाज में आज भी कई महिलाएँ उपेक्षा, तिरस्कार व प्रताड़ना की शिकार हैं और प्रगति से वंचित हैं। मैं ऐसी महिलाओं के लिए इस जन्म व अगले जन्म में भी बहुत कुछ करने की इच्छा रखती हूँ। अगले जन्म में भी मैं कन्या के रूप में पैदा होना पसंद करूँगी ताकि मैं उन महिलाओं के लिए बहुत कुछ कर सकूँ जो विकास की दौड़ से पिछड़ी हैं। यह कहना है रतलाम जिले की बालिका शिक्षा केंद्र की जिला समन्वयक प्रवीणा दवेसर का। चंदा मामा मैग्जीन की कंटेट हेड सौम्या भारद्वाज को अपने लड़की होने पर गर्व है। वह मानती हैं कि एक औरत में एक अच्छा इंसान भी बसता है। औरत में भावनाएँ होती हैं, उसमें चीजों को जानने व परखने की बेहतर समझ होती है। आज औरत निरंतर प्रगति की ओर अग्रसर होते हुए रूढ़िवादिता की सारी दीवारों को लाँघकर अपनी एक अलग पहचान बना रही है। यदि मैं अपना व्यक्तिगत अनुभव कहूँ तो हर दर्द में और हर कठिन परिस्थिति में मुस्कुराना और उतनी ही लगन से अपने काम का बेहतर प्रदर्शन करना औरत की सबसे बड़ी खासियत है। एमएससी उत्तरार्द्ध में पढ़ने वाली मंदसौर की छात्रा प्रतिभा शर्मा का इस प्रश्न पर कहना है कि मैं अगले जन्म में बेशक लड़की ही बनना चाहूँगी। पहले के जमाने में भले ही लड़कियों का मनोबल कमजोर था परंतु अब ऐसा नहीं है। आज महिला सशक्तिकरण के दौर में महिलाएँ हर क्षेत्र में लड़कों के बराबर या यूँ कहें कि लड़कों से दो कदम आगे है। कल तक पिछड़ेपन का पर्याय माने जाने वाले ग्रामीण लोग भी बदलाव के इस दौर में अपने घर बेटी के पैदा होने की दुआएँ करते हैं। यह सब लड़कियों की कामयाबी व काबिलियत का परिणाम है। ऐसा इसलिए सोचना कि नारी दुर्बलता की ब्रांड बन चुकी है और उसे हेय दृष्टि से देखना एक आम दृष्टि बन चुकी है। सो, उसे तिरस्कृत श्रेणी में ही रखा जाए ... यह मिथक खुद नारी ने तोड़ दिया है। यदि वह आकाश में अपनी सफलता की उड़ान भरकर उसके स्वत: स्फूर्त सशक्तिकरण का इंद्रधनुष बिखेर सकती है तो यह भी उसी के वश में है कि वह एक कामकाजी महिला होने के बाद भी पारिवारिक/सामाजिक दायित्वों को बखूबी निभा सकती है। वह अब केवल घर, परिवार और समाज ही नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण की धूरी है। इन सभी तर्कों से तो यही बात स्पष्ट होती है कि आज की नारी को स्वयं के कन्या रूप में जन्म लेने पर गर्व है। वो चाहती है कि हर जन्म में वो मादा भ्रूण के रूप में ही जन्म ले तथा नारी वर्ग व समाज के उत्थान के लिए अपना सहयोग प्रदान करे।
लेखक के बारे में
गायत्री शर्मा