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Written By WD

लोगों की सुनोगे तो पछताओगे

मिटा डालिए लोग क्या कहेंगे का भ्रम

कानाफूसी
- सुषमा दुबे

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हम में से ज्यादातर लोग अपनी पसंद का काम इसीलिए नहीं कर पाते, क्योंकि वे यह सोचकर चलते हैं कि "लोग क्या कहेंगे?" 30 वर्षीय आकाश ने जब देखा कि उसका वजन तेजी से बढ़ रहा है। कुछ समयाभाव व कुछ आलस्य की वजह से वह नियमित व्यायाम नहीं कर पा रहा है तो उसने सोचा क्यों न ऑफिस साइकल से जाया जाए, लेकिन समस्या यह थी कि "लोग क्या कहेंगे?" पत्नी व पिता ने हौंसला बढ़ाया।

लोगों को कहने दो, कब तक कहेंगे? कोई कहता- "यार खूब पेट्रोल बचा रहे हो?" किसी ने कहा- "अपनी प्रतिष्ठा का तो ख्याल रखो!" किंतु 8 महीने की कड़ी मेहनत के बाद आकाश फिट हो गया तो सराहना तो मिली ही, देखा-देखी अन्य लोग भी हिचकिचाहट छोड़कर साइकल पर आ गए।

घर की आर्थिक स्थिति को देखते हुए पुनीत ने दोनों परिवारों की सहमति से मंदिर में सादे ढंग से शादी करने का निर्णय लिया। शादी में लगने वाले पैसों को बिजनेस बढ़ाने में लगाया। थोड़े दिन लोगों में कानाफूसी हुई, किंतु आज उसकी प्रगति देखकर कई लोगों ने उससे प्रेरणा ली।

  यदि आप कुछ अच्छा, प्रेरणादायी, स्वाभाविक या मन को भाने वाला कार्य कर रहे हैं तो अवश्य कीजिए। यह कतई समाज विरोधी या शर्मिंदा करने वाला कार्य नहीं है। इससे आपके मन को सुकून मिलेगा। लोगों का कहना है तो कहते रहें।      
शादी के बाद पढ़ाई करना हो, पसंद की ड्रेस पहनना हो, उछलकर कच्ची कैरियाँ तोड़ना हो, नदी में डुबकी लगाना हो, बारिश में भीगना हो, ठेले पर चाट-पकौड़ियाँ खाना हो या मॉर्निंग वाक के स्थान पर दौड़ लगाने जैसी छोटी-बड़ी इच्छाओं को कई बार इसलिए दबाना होता है, क्योंकि "लोग क्या कहेंगे"। अरे आप कुछ करें या न करें, लोगों को तो कुछ कहना ही है, फिर क्यों लोगों के लिए अपने मन को मारा जाए?

एक छोटे-से गाँव में ब्याही सुमेधा ने जब देखा कि पति की किराना दुकान से घर खर्च चलाना मुश्किल है तो उसने पति की सहमति से आगे पढ़ाई की। अब वह रोजाना स्कूटी पर बैठकर दूसरे गाँव पढ़ाने जाती है। कुछ दिन तो गाँव वालों के साथ सास-ससुर ने भी ताने दिए, लेकिन 4-5 हजार कमाती तथा नई जानकारियों के साथ घर व बाहर की समस्या सुलझातीं बहू अब उन्हें अच्छी लगने लगी है। यही नहीं, अब गाँव की बहू-बेटियाँ आगे पढ़ने व स्कूटी चलाने में भी संकोच नहीं करती हैं। उनके लिए सुमेधा आदर्श बन चुकी हैं।

यदि आप कुछ अच्छा, प्रेरणादायी, स्वाभाविक या मन को भाने वाला कार्य कर रहे हैं तो अवश्य कीजिए। यह कतई समाज विरोधी या शर्मिंदा करने वाला कार्य नहीं है। इससे आपके मन को सुकून मिलेगा। लोगों का कहना है तो कहते रहें।

इसी प्रकार मृत्युभोज जैसी सामाजिक कुरीतियों यथा बाल विवाह, दहेज प्रथा, आडम्बरयुक्त शादियाँ, मामेरा प्रथा या समाज में फैली अन्य कुप्रथाओं का विरोध करने का मन बन गया हो तो झिझकिए नहीं, अपने निर्णय को मूर्त रूप दे डालिए। लोगों में हो सकता है शुरुआत में कानाफूसी हो, वे आपको हतोत्साहित भी करें, पर एक दिन वे खुद आपसे ही प्रेरणा लेकर आपके साथ जुड़ जाएँगे।
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WD