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इकलौता लाड़ला चला कॉलेज
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सुधा मूर्ति एक दिन मैं ट्रेन द्वारा बंगलोर (अब बेंगलुरू) से बेलगाँव जा रही थी। मैं द्वितीय श्रेणी में सफर कर रही थी। जब मैं अपनी जगह पर बैठ गई तब मैंने देखा कि दूसरी ओर एक दम्पति अपने पुत्र के साथ थे। पुत्र मात्र 19 साल का था। वह कॉलेज में पढ़ने जा रहा था। परिवार बहुत ही समृद्ध था। माता-पिता अपने बेटे को कई तरह के नियम समझा रहे थे। वे पुत्र से कहते कि इतनी ठंड है, तुम गर्म कपड़े क्यों नहीं पहन रहे हो? क्या तुम्हें भूख लग रही है? क्या मैं भोजन दूँ?ट्रेन में हमें तीन बर्थ मिली हैं। तुम किस बर्थ पर सोना चाहते हो? ऐसे कई प्रकार के प्रश्न पूछ रहे थे। वह नौजवान उनके इस रवैए पर बहुत खिन्ना था। अनजान व्यक्ति के समक्ष पुत्र शर्मिंदा महसूस कर रहा था, परंतु वह उनकी बातों का सम्मान कर रहा था। पति ने पत्नी से पूछा- क्या तुम्हारे पास पुराने कपड़े हैं? मैं इन गंदी सीटों को साफ करना चाहता हूँ। पत्नी ने हल्के गुस्से से कहा- कितनी बार तुम्हें कहा है कि आरक्षण करा लेना चाहिए, परंतु तुम मेरी बात ही नहीं सुनते हो। ट्रेन की टिकट पहले ही खरीद लेते तो हमें इतनी असुविधा नहीं होती। पति ने धीमे स्वर में कहा कि मुझे पता ही नहीं चला कि इतनी भीड़ होगी ट्रेन में। अक्सर हम हवाई जहाज से सफर करते हैं, परंतु हवाई जहाज से बेलगाँव पहुँचना बहुत ही कठिन है। अब तक मुझे पता चल गया था कि वे बेलगाँव जा रहे हैं। इसलिए मैंने पूछा- क्या आप बेलगाँव पहली बार जा रहे हैं? वे अचानक मुझे देखने लगे। लड़के की माँ मुझसे बात करने के लिए उत्सुक थी। वह कहने लगी- हाँ, हम वहाँ पर कभी नहीं गए। बेटे को बेलगाँव के मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिल गया है। हमने सुना है कि वह बहुत ही अच्छा कॉलेज है। क्या आप उसके बारे में कुछ जानती हैं? मैंने कहा- हाँ, मैंने सुना है कि बेलगाँव में अच्छा मेडिकल कॉलेज है। उन्होंने मुझसे पूछा- आपको इसके बारे में कैसे पता है? मैंने कहा- मैं वहीं की निवासी हूँ। इसके बाद वे मुझसे बात करने के लिए और अधिक उत्सुक हो गए। पति ने अपना परिचय देते हुए कहा- मेरा नाम राव है। मैंने बंगलोर से सी.ए. किया है। यह है मेरी पत्नी रागिनी। उन्होंने होम साइंस में स्नातकोत्तर किया है। मेरा बेटा पुनीत मेडिकल कॉलेज का विद्यार्थी बनने जा रहा है। बातचीत के दौरान ट्रेन चल पड़ी थी। ट्रेन के बंगलोर पहुँचने से पहले ही वे खाना खाने लगे थे। उनका लंच बॉक्स बहुत ही बड़ा था। उसमें बहुत-सी चीजें रखी थीं। माँ ने बर्थ पर टेबल मैट बिछाया एवं उस पर स्टील की प्लेट रखी। उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था कि वे घर पर खाना परोस रहे हों। दो प्रकार की सब्जियाँ थीं। दो प्रकार की दाल और दो प्रकार की रोटियाँ। दो प्रकार के चावल थे एवं मिठाइयाँ भी थीं। मैं उन्हें देखती ही रह गई थी। बेटा खाना खाने बैठा ही था कि वे कह उठे- डेटॉल के साबुन से हाथ धो लो। हाथ धोकर भोजन करने बैठो। जब वह उठकर चला गया तब उसके पिता ने कहा कि पुनीत हमारा इकलौता बेटा है। हमने उसका बहुत ही अच्छी प्रकार पालन-पोषण किया है। हम चाहते थे कि उसे बंगलोर के मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिल जाए, परंतु उसे वहाँ पर दाखिला नहीं मिल पाया। हमने उसे कहीं भी अकेला नहीं छोड़ा है।
यदि होस्टल उसे पसंद नहीं आता है तो मेरी पत्नी बेलगाँव में किराए का मकान लेकर बेटे के साथ रहने लगेगी। मैं बंगलोर से बेलगाँव आया करूँगा। बच्चों के लिए माता-पिता को खुशियाँ त्यागना पड़ती हैं। कहते-कहते वे बहुत ही भावुक हो उठे, रागिनी की आँखों से तो आँसू गिरने लगे थे। मैं उनके दर्द को समझ पा रही थी कि इतने साल बाद पुत्र से वे अलग हो रहे थे। माँ ने कहा- पुनीत हमारा लाड़ला बेटा है। इसके जन्म से पहले मैं महाविद्यालय में पढ़ाती थी, परंतु इसके जन्म के बाद मैंने नौकरी छोड़ दी। मेरे बहुत से दोस्त हैं, जो अभी भी कॉलेज में पढ़ाते हैं, परंतु मेरी इच्छा थी कि मैं अपने बच्चे को अच्छी तरह से बड़ा कर सकूँ। पिता ने कहा- तुमकुर क्षेत्र में मेरी बहुत ही अच्छी प्रैक्टिस चल रही है। वहाँ पर हमारी जमीन-जायदाद है, परंतु पुनीत की पढ़ाई के लिए हम बंगलोर में रहने लगे। उसके स्कूल के पास मैंने एक मकान खरीद लिया है। मैं अपने परिवार के बिना कहीं भी नहीं जाता। पिता ने कहा कि प्रतिदिन स्कूल में मैं भोजन लेकर जाता था। उसके बाद अध्यापकों के साथ मैं बात किया करता था कि पढ़ाई में वह कैसा है। शाम के समय वह अलग-अलग खेलों में व्यस्त रहता था। शतरंज सीखना अच्छा होता है, तेज दिमाग के लिए। कराटे से वह अपना बचाव खुद कर सकता था और क्रिकेट तो एक जाना-माना खेल है। मैं पुनीत के माता-पिता की बातें सुनकर हँसने लगी थी। मुझे उन पर दया आ रही थी। मैंने पूछा- गाना एवं डिबेट के बारे में आपके क्या सुझाव हैं? क्या आप इन क्षेत्रों पर ध्यान नहीं दे रहे हैं? उन्होंने उत्तर दिया- हमें इनकी जरूरत नहीं है। जब उसका जन्म हुआ था तब हमने तय किया था कि वह डॉक्टर बनेगा। मैंने पूछा कि उसकी क्या पसंद है?उन्होंने कहा- हमारी पसंद उसकी पसंद है। वह हमारा इकलौता बेटा है। उसे क्या पता है बाहर की दुनिया के बारे में? उसके बाद उनका बालक आकर चुपचाप भोजन करने लगा। खाना खाने के बाद माता-पिता ने तय किया कि वह कहाँ सोएगा। पिता ने तुरंत नीचे की सीट पर चादर बिछाकर तकिया लगा दिया, बच्चे को सोने के लिए कहा एवं तुरंत उसे कश्मीरी दुशाले से ढँक दिया। मुझसे कहने लगे- आशा है आपको बुरा नहीं लगेगा, यदि हम बत्ती बुझा दें। मेरा बेटा बत्ती जलने से सो नहीं पाएगा। बिना मेरी स्वीकृति लिए उन्होंने बत्ती बुझा दी।(
शेष अगले सप्ताह)