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मधुर मिलन की स्मृति
तेरा-मेरा वो मधुर मिलनरात का सुबह से मिलनसाये का शरीर से मिलन धरती का सूरज से मिलनहोता है क्षणिक किंतु आनंद उस मिलन का है अपार अधरों से जब छलकता है प्यार तो पतझड़ में भी खिलती है कोंपलेखुशी में भी छलकती है आँखें जीवन में छाता है उल्लास अपार वो तेरा-मेरा प्यार ... शरमा के भीतर ही भीतर करती हूँ जब तेरा आलिंगनतब लगता है जिंदगी है कितनी खास भूल जाती हूँ चिंता और डर जब थाम लेता है तू हाथ तेरे संग हर दिन सुहाना और रंगी है हर रात। मिलन की ये बेला बीत न जाए कहीं मन का ये मयूर हो न जाए उदास कहीं इस मिलन को यादगार बना दो तुम कब आओगे ये बता दो।
लेखक के बारे में
गायत्री शर्मा