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ग़ज़लें : जोश
1.
क़सम है आपके हर रोज़ रूठ जाने कीके अब हवस है अजल को गले लगाने कीवहाँ से है मेरी हिम्मत की इब्तिदा अल्लाह जो इंतिहा है तेरे सब्र आज़माने कीफूँका हुआ है मेरे आशियाँ का हर तिनका फ़लक को ख़ू है तो हो बिजलियाँ गिराने कीहज़ार बार हुई गो मआलेगुल से दोचार कली से ख़ू न गई फिर भी मुस्कुराने कीमेरे ग़ुरूर के माथे पे आ चली है शिकनबदल रही है तो बदले हवा ज़माने की चिराग़े देरो हरम कब के बुझ गए ए जोशहनोज़ शम्मा है रोशन शराबख़ाने की
2.
ख़ुद अपनी ज़िन्दगी से वेहशत सी हो गई हैतारी कुछ ऐसी दिल पे इबरत सी हो गई हैज़ौक़े तरब से दिल को होने लगी है वेहशतकुछ ऐसी ग़म की जानिब रग़बत सी हो गई हैसीने पे मेरे जब से रक्खा है हाथ तूनेकुछ और दर्दे दिल में शिद्दत सी हो गई है मुमकिन नहीं के मिलकर रसमन ही मुस्कुरा दोतुमको तो जैसे हमसे नफ़रत सी हो गई अब तो है कुछ दिनों से यूँ दिल बुझा-बुझा-सादोनों जहाँ से गोया फ़ुरसत सी हो गई वो अब कहाँ हैं लेकिन ऐ हमनशीं यहाँ तो मुड़-मुड़ के देखने की आदत सी हो गई हैऐ जोश रफ़्ता-रफ़्ता शायद हमारे दिल से ज़ौक़े फ़सुरदगी को उल्फ़त सी हो गई है---------------
3.
वो जोश ख़ैरगी है तमाशा कहें जिसेबेपरदा यूँ हुए हैं के परदा कहें जिसेअल्लाहरे ख़ाकसारिए रिनदाँने बादा ख्वार रश्के ग़ुरूरो क़ैसरो कसरा कहें जिसेबिजली गिरी वो दिल पे जिगर तक उतर गईइस चर्ख़े नाज़ से क़दे बाला कहें जिसेज़ुल्फ़े हयात नोएबशर में है आज तक ज़ख़्मे गुनाहे आदम ओ हव्वा कहें जिसेकितनी हक़ीक़तों से फ़ज़ूँतर है वो फ़रेब दिल की ज़ुबाँ में वाद ए फ़रदा कहें जिसेमेरा लक़ब है जिसका लक़ब है शमीमे ज़ुल्फ़ मेरी नज़र है चेहरा ए ज़ेबा कहें जिसेलो आ रहा है वो कोई मस्तेख़राम से इस चाल से के लरज़िशे सेहबा कहें जिसेतेरे निशाते ख़ाना ए अमरोज़ में नहीं वो बुज़दिली के ख़तरा ए फ़रदा कहें जिसे ख़ंजर है जोश हाथ में दामन लहू से तरये उसके तौर हैं के मसीहा कहें जिसे----------------------