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ग़ालिब की ग़ज़लें
1.
ये न थी हमारी क़िस्मत, के विसाल-ए-यार होता अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता तेरे वादे पे जिए हम, तो ये जान झूठ जानाके ख़ुशी से मर न जाते, अगर एतबार होतातेरी नाज़ुकी से जाना के बंधा है एहद-ए-बूदाकभी तू न तोड़ सकता अगर उस्तुवार होताकोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीम कश को ये खलिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होताये कहाँ की दोस्ती है के बने हैं दोस्त नासेह कोई चारा साज़ होता, कोई ग़मगुसार होतारग-ए-संग से टपकता, वो लहू के फिर न थमजिसे ग़म समझ रहे हो ये अगर शरार होता ग़म अगरचे जाँ गुसल है, प बचें कहाँ के दिल है ग़म-ए-इश्क़ गर न होता, ग़म-ए-रोज़गार होता कहूँ किस से मैं के क्या है, शब-ए-ग़म बुरी बला है मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होताहुऎ हम जो मर के रुस्वा हुए क्यों न ग़र्क़-ए-दरियान कभी जनाज़ा उठता न कही मज़ार होताउसे कौन देख सकता के यगाना है वो यकताजो दुई की बू भी होती तो कहीं दो-चार होता ये मसाइल-ए-तसव्वुफ़ ये तेरा बयान ग़ालिब तुझे हम वली समझते लो न बादाख़्वार होताकठिन शब्दों के अर्थ---बादाख़्वार---शराब पीने वाला,मसाइल-ए-तसव्वुफ़----अध्यात्म की बातेंवली---ईश्वर की याद में खोया हुआ--अल्लाह वाला ग़र्क़ होना ----डूबना, शब-ए-ग़म ----दुखभरी रात जाँगुसल------जान लूटने वाला, ग़म-ए-रोज़गार --दुनिया के दुख शरार ---चिंगारी, नासेह ----नसीहत करने वाला चारा साज़ ---इलाज करने वाला. ग़मगुसार --ग़म बाटने वाला एहद-ए-बूदा---कच्चा वादा, उस्तवार ---सीधा, मज़बूत 2.
शौक़ हर रंग रक़ीब-ए-सर-ओ-सामाँ निकलाक़ैस तस्वीर के परदे में भी उरयाँ निकलाज़ख़्म ने दाद न दी तंगी-ए-दिल की यारबतीर भी सीना-ए-बिस्मिल से पुरअफ़शाँ निकला बू-ए-गुल, नाला-ए-दिल, दूद-ए-चिराग़-ए-महफ़िल जो तेरी बज़्म से निकला सो परेशाँ निकला दिल-ए-हसरत ज़दा था, मादा-ए-लज़्ज़त-ए-दर्द काम यारों का बक़द्र-ए-लब-ओ-दनदाँ निकला ऎ नोआमूज़-ए-फ़ना, हिम्मत-ए-दुश्वार पसंद सख़्त मुश्किल है के ये काम भी आसाँ निकला दिल में फिर गिरये ने इक शोर उठाया ग़ालिब आह जो क़तरा न निकला था सो तूफ़ाँ निकलाकठिन शब्दों के अर्थ---रक़ीब-ए-सर-ओ-सामाँ----साज़ोसामान का दुश्मनक़ैस----मजनू. उरयाँ----नंगा.तंगी-ए-दिल---दिल का तंग होना. पुरअफ़शाँ---भरा हुआ. बू-ए-गुल--फूल की ख़ुश्बू.नाला-ए-दिल----दिल का रोना चिल्लाना.दूद-ए-चिराग़-ए-महफ़िल ------महफ़िल के दिये का धुआँ
3.
दर्द मिन्नत कश-ए-दवा न हुआ मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ है ख़बर गर्म उनके आने की आज ही घर में बोरिया न हुआजमअ करते हो क्यों रक़ीबों को इक तमाशा हुआ गिला न हुआक्या वो नमरूद की ख़ुदाई थीबन्दगी में मेरा भला न हुआहम कहाँ क़िस्मत आज़माने जाऎंतू ही जब ख़ंजर आज़मा न हुआकितने शीरीं हैं तेरे लब के रक़ीब गालियाँ खा के बेमज़ा न हुआजान दी, दी हुई उसी की थीहक़ तो ये है के हक़ अदा न हुआथी ख़बर गर्म के ग़ालिब के उड़ेगे पुरज़े देखने हम भी गए थे प तमाशा न कठिन शब्दों के अर्थ मिन्नत कशे दवा-----दवा का अहसन मन्द बोरिया----बिस्तर. रक़ीबो----दुश्मनोंगिला------शिकायत. शीरीं----मीठेनमरूद----बादशाह का नाम जो अपने आप को ख़ुदा कहता थालब के रक़ीब-----होंटों से निकले हुए कड़वे शब्द