शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2026
  1. समाचार
  2. मुख्य ख़बरें
  3. UN News
  4. Why climate change is a human rights crisis
Written By UN
Last Updated : शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025 (18:00 IST)

जलवायु परिवर्तन एक मानवाधिकार संकट भी क्यों है?

Climate change
जलवायु परिवर्तन को कई दशकों तक केवल एक तकनीकी समस्या माना जाता रहा, जिसे कार्बन बजट, तापमान लक्ष्य और उत्सर्जन के आंकड़ों के माध्यम से मापा जाता था। लेकिन अब दुनिया यह मानने लगी है कि जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरणीय विफलता नहीं है, बल्कि यह एक गहन मानवाधिकार संकट भी है।
 
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने, इस वर्ष (2025) जिनीवा में, इसी सन्देश को दोहराते हुए मानवाधिकार परिषद से सवाल किया : क्या हम वाक़ई ऐसे क़दम उठा रहे हैं जो लोगों को जलवायु संकट से बचा सकें, उनके भविष्य की रक्षा कर सकें, और प्राकृतिक संसाधनों का ऐसा प्रबन्धन कर सकें, जो मानवाधिकारों और पर्यावरण, दोनों का सम्मान करता हो? उनका जवाब स्पष्ट था, हमें जितने प्रयास करने चाहिए, हम उनके कहीं आसपास भी प्रयास नहीं कर रहे हैं।
 
प्रोफ़ेसर जोयीता गुप्ता संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के लिए विज्ञान, तकनीक और नवाचार की पैरोकारी करने के लिए उच्च स्तरीय समूह की सदस्य रही हैं। वह पृथ्वी आयोग (Earth Commission) की सह-अध्यक्ष भी हैं।
प्रोफ़ेसर जोयीता गुप्ता, स्वच्छ और सतत जलवायु व मानवाधिकारों के बीच सम्बन्धों पर विशेष काम कर रही हैं। वह बताती हैं कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को केवल एक ग्रह संकट के रूप में ही नहीं, बल्कि मानवाधिकारों के उल्लंघन के दृष्टिकोण से भी समझना ज़रूरी है।
 
एक बिखरा हुआ क़ानूनी ढांचा
प्रोफ़ेसर जोयीता गुप्ता के अनुसार, जलवायु क्षति का मानवाधिकार क़ानून के तहत सामना करना इतना कठिन इसलिए रहा, क्योंकि इस सम्बन्ध में क़ानूनी ढांचा विखंडित (fragmented) है।
 
उन्होंने यूएन न्यूज़ हिन्दी के साथ बातचीत में बताया कि पर्यावरण, मानवाधिकार, व्यापार और निवेश से जुड़े क़ानून और समझौते अकसर एक-दूसरे से अलग-अलग दिशा में काम करते हैं। कई देश जलवायु समझौतों पर हस्ताक्षर कर सकते हैं, लेकिन मानवाधिकार सन्धियों से नहीं बंधे होते, या वे निवेशकों की सुरक्षा करते हैं जबकि पर्यावरणीय नुक़सान की अनदेखी करते हैं।
 
प्रोफ़ेसर गुप्ता ने कहा कि यह विभाजन देशों को, अपनी ज़िम्मेदारी अलग-अलग हिस्सों में बांटने की सुविधा देता है। वे कह सकते हैं, ‘उन्होंने यहां सहमति दी, लेकिन वहां नहीं। यही कारण है कि वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन को मानवाधिकार उल्लंघन के रूप में मान्यता देना इतना कठिन रहा है। मगर हाल ही में इसमें बदलाव शुरू आए हैं। 
अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) ने, एक ऐतिहासिक सलाहकारी राय में स्पष्ट किया है कि जलवायु परिवर्तन को अलग-थलग आकलित नहीं किया जा सकता। ICJ के अनुसार, न्यायालयों और देशों की सरकारों को जलवायु सम्बन्धी ज़िम्मेदारियों को, मानवाधिकारों और अन्य पर्यावरणीय समझौतों के साथ जोड़कर देखना होगा। प्रोफ़ेसर गुप्ता के अनुसार, यह क़ानूनी बदलाव देर से आया, लेकिन बेहद आवश्यक है।
 
कौन सबसे अधिक प्रभावित?
जलवायु नीति के मूल में एक नैतिक सवाल है : हम कितनी अधिकतम तापमान वृद्धि सह सकते हैं? प्रोफ़ेसर जोयीता गुप्ता बताती हैं कि 1992 के जलवायु सम्मेलन में मानव नुक़सान को मापने पर ध्यान नहीं दिया गया। साल 2015 में पेरिस समझौते में, तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने का, वैश्विक सहमति से निर्णय लिया गया, जिसे बाद में 1.5 डिग्री सेल्सियस तक लाना सुरक्षित माना गया। लेकिन छोटे द्वीपीय देशों के लिए यह एक ऐसा समझौता था जिसे शक्ति असन्तुलन के कारण स्वीकार करना पड़ा।
 
उन्होंने बताया कि छोटे द्वीपीय देशों के लिए, 2 डिग्री सेल्सियस असहनीय था…बढ़ता समुद्री स्तर और अत्यधिक तूफ़ान, इन पूरे देशों को मिटा सकते हैं। जब धनी देशों ने वैज्ञानिक प्रमाण मांगे, तो IPCC को 1.5 डिग्री और 2 डिग्री सेल्सियस के प्रभावों का अध्ययन करने का काम सौंपा गया। प्रोफ़ेसर गुप्ता ने अपने शोध (Nature में प्रकाशित) का ज़िक्र किया, जिसमें 1 डिग्री सेल्सियस ही न्यायसंगत सीमा है। 
 
इससे अधिक तापमान वृद्धि पर, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, दुनिया की 1 प्रतिशत से अधिक आबादी, यानि लगभग 10 करोड़ लोगों के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। उन्होंने दुख जताया कि दुनिया ने पहले ही, 2017 में 1 डिग्री सेल्सियस का स्तर पार कर लिया था, और सम्भावना है कि 2030 तक, यह वृद्धि 1.5 डिग्री सेल्सियस भी पार हो सकती है।
 
इस सदी के अन्त में तापमान कम करने के वादे ,उन अपरिवर्तनीय नुक़सानों की अनदेखी करते हैं, जिनमें हिमनदों का पिघलना, पारिस्थितिकी तंत्र को क्षति पहुंचना और जीवन का नुक़सान शामिल है। जलवायु न्याय और विकास अलग नहीं हैं। ऊर्जा पर पानी, भोजन, आवास, परिवहन, बिजली जैसे हर मूलभूत अधिकार निर्भर हैं।
प्रोफ़ेसर जोयीता कहती हैं कि अनेक पक्षों का मानना है कि हम धनी लोगों की जीवनशैली में बदलाव किए बिना, सतत विकास के लक्ष्य हासिल कर सकते हैं, लेकिन यह न तो गणितीय रूप से सम्भव है और न ही नैतिक रूप से सही। उनका शोध से बताता है कि मूलभूत मानव आवश्यकताओं की पूर्ति भी, कार्बन उत्सर्जन में महत्वपूर्ण योगदान देती है। चूंकि पृथ्वी पहले ही सुरक्षित सीमा पार कर चुकी है, इसलिए धनी देशों को अपने उत्सर्जन को बहुत तेज़ी से घटाना होगा।
 
जलवायु परिवर्तन और विस्थापन
जलवायु अन्याय का सबसे स्पष्ट प्रभाव, विस्थापन है। इसके बावजूद, अन्तरराष्ट्रीय क़ानून आज भी 'जलवायु शरणार्थियों' को मान्यता नहीं देता। प्रोफ़ेसर जोयीता कहती है कि, जिन इलाक़ों में सूखा बढ़ रहा है, जहां फ़सलें बर्बाद हो जाती हैं या पीने का पानी ख़त्म हो जाता है, वहां रहने वाले लोग जीवित रहने के लिए अपनी ज़मीन छोड़ने पर मजबूर हो जाते हैं।
 
लोग पूरी तरह विस्थापित होने से पहले अनुकूलन करने की कोशिश करते हैं, जैसे धान की पारम्परिक, पानी-भरी खेती छोड़कर कम पानी में उगाई जाने वाली खेती अपनाना लेकिन जब यह अनुकूलन भी काम नहीं आता, तो उनके पास अपना घर छोड़ने के अलावा, कोई रास्ता नहीं बचता।
 
उन्होंने कहा कि ज़्यादातर लोग अपने ही देश या आसपास के क्षेत्रों में विस्थापित होते हैं, क्योंकि महाद्वीपों के पार पलायन करना बेहद महंगा और कठिन होता है। ऐसे में, क़ानूनी चुनौती यह साबित करने में है कि लोग जलवायु परिवर्तन के कारण, अपनी जगह छोड़ने पर विवश हुए हैं या ख़राब शासन या बाज़ार विफलताओं जैसी वजहों से।
 
उनके अनुसार, असल चुनौती यह है कि जब लोग स्थानीय या अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर कहीं और जाते हैं, तो क्या उन्हें वहांस्वीकार किया जाता है? और इन विस्थापित लोगों की क़ानूनी स्थिति क्या है? हालांकि प्रोफ़ेसर गुप्ता ने उन जारी अध्ययनों का ज़िक्र किया जो वैज्ञानिक उपायों के ज़रिए अत्यधिक चरम मौसमीय घटनाओं या दीर्घकालिक जलवायु बदलावों को, मानव विस्थापन से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।
उनके अनुसार, ‘जैसे ही ये अध्ययन यह मापने लगेंगे कि जलवायु परिवर्तन किस हद तक लोगों को अपना घर छोड़ने पर मजबूर करता है, हम जलवायु-जनित विस्थापन को अन्तरराष्ट्रीय क़ानून में शामिल करने की दिशा में आगे बढ़ सकेंगे। ‘स्रोत विज्ञान’ (Attribution Science) एक वैज्ञानिक तरीक़ा है, जिससे यह पता लगाया जाता है कि कोई विशेष मौसमीय घटना या जलवायु घटना (जैसे बाढ़, सूखा) कितनी हद तक मानव-सृजित जलवायु परिवर्तन से जुड़ी है।
 
सीमाओं के पार प्रभाव
जलवायु परिवर्तन के लिए ज़िम्मेदारी तय करना बेहद जटिल है क्योंकि इसके प्रभाव सीमाओं को पार कर जाते हैं। प्रोफ़ेसर गुप्ता ने एक उदाहरण देते हुए बताया कि पेरू के एक किसान ने जलवायु परिवर्तन से हुए नुक़सान के लिए जर्मनी की एक कम्पनी के ख़िलाफ़ जर्मन अदालत में, मुक़दमा दायर किया।
 
अदालत ने मान्यता दी कि विदेशी पीड़ित ऐसे मुक़दमों को दाखिल कर सकते हैं, लेकिन उत्सर्जन और नुक़सान के बीच, सम्बन्ध साबित करना अब भी एक बड़ी चुनौती है। यह मामला सीमापार जलवायु-सम्बन्धी मानवाधिकार हानियों के लिए देशों या कम्पनियों को जवाबदेह ठहराने में कठिनाइयों को उजागर करता है।
 
जलवायु स्थिरता
प्रोफ़ेसर गुप्ता का कहना है कि स्थिर या सतत जलवायु को एक सामूहिक मानव अधिकार के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए, सुरक्षित और स्थिर जलवायु हमारे जीवन के खाद्य उत्पादन, जल आपूर्ति, ऊर्जा और उद्योग जैसे हर पहलू को प्रभावित करता है।
 
यदि इसे क़ानूनी अधिकार के रूप में स्वीकार किया जाए तो देशों की सरकारों या कम्पनियों के इसे बनाए रखने में विफल होने पर लोग न्यायिक प्रक्रिया के ज़रिए न्याय की मांग कर सकते हैं। उनके अनुसार, लातीनी अमेरिका और योरोप में पहले ही, ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें तर्क दिया गया कि जलवायु की अस्थिरता के कारण अपने अन्य मानवाधिकारों का सही ढंग से उपयोग या संरक्षण नहीं कर पा रहे हैं। 
यह अधिकार व्यक्तिगत स्तर का नहीं, बल्कि सामूहिक स्तर का है। एक स्थिर और पूर्वानुमानित जलवायु से हम सभी लाभान्वित होते हैं। खेती और जल प्रणाली का प्रबन्धन से लेकर ऊर्जा का वितरण जैसी हमारी हर गतिविधि, इसी पर निर्भर करती है।
 
जीवाश्म ईंधनों से दूरी
प्रोफेसर जोयीता ने बताया कि वैश्विक अदालत ने अब स्पष्ट किया है कि जीवाश्म ईंधन का लगातार उपयोग अन्तरराष्ट्रीय रूप से ग़लत कृत्य माना जा सकता है। देशों की सरकारें अपने यहां उत्सर्जन के लिए ही केवल ज़िम्मेदार ही नहीं हैं, बल्कि वे अपने देश में कम्पनियों को नियंत्रित करने के लिए उत्तरदाई भी हैं।
 
उन्होंने कहा कि इस सन्दर्भ में विभिन्न क़ानूनी रणनीतियां उभर रही हैं। इनमें अमेरिका में कम्पनियों की ग़लतबयानी के ख़िलाफ़ दायर मुक़दमे और फ़्रांस का कॉर्पोरेट जवाबदेही (विजिलेंस) क़ानून शामिल हैं। उधर, संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार और जलवायु परिवर्तन पर विशेषज्ञ एलिसा मोरगेरा ने कहा है कि अर्थव्यवस्थाओं से जीवाश्म ईंधनों के प्रयोग को धीरे-धीरे ख़त्म करना सबसे प्रभावी तरीक़ा है।
 
इससे जलवायु परिवर्तन के प्रभाव कम किए जा सकते हैं और साथ ही मानवाधिकारों की रक्षा भी हो सकती है। मोरगेरा ने बताया कि यह आसान काम नहीं है क्योंकि जीवाश्म ईंधन हमारे जीवन और अर्थव्यवस्था के हर हिस्से में अपनी पहुंच बना चुका है।
 
राजनैतिक इच्छाशक्ति और ज़िम्मेदारी
प्रोफ़ेसर गुप्ता ने कहा कि पेरिस समझौते से कुछ देशों की वापसी में बहुपक्षवाद के कमज़ोर होने के बीज छुपे हैं, जिससे वैश्विक भरोसा कमज़ोर हुआ है। वहीं नए जीवाश्म ईंधन विस्तार का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा कुछ समृद्ध देशों द्वारा संचालित होता है।
उन्होंने कहा कि बाज़ार, नियमों से मुक्ति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर केन्द्रित नवउदारवादी विचारधारा किसी सामूहिक संकट का समाधान नहीं कर सकती है। जलवायु परिवर्तन ‘सार्वजनिक हित’ से जुड़ी एक समस्या है, जिसके समाधान के लिए स्पष्ट नियमों, सहयोग और मज़बूत देशों की आवश्यकता है।
ये भी पढ़ें
Bajaj Pulsar 220F भारत में लॉन्च, कीमत 1.28 लाख रुपए, नए रंग और फीचर्स के साथ आया 2026 मॉडल