संस्कारों में रचा हुआ हास्य
भारतीय समाज में इससे पहले कभी हँसी को इतना सम्मान नहीं मिला था। हालाँकि पहले तनाव भी इतना नहीं था। खूब हँसने वाले को लोग खुशमिजाज नहीं, ठिठोलीबाज समझते थे। हँसाने वाले को भांड, मसखरा और जोकर कहा जाता था। अब हँसी की भी कीमत बढ़ी है और हँसाने वालों की भी। हँसी की कीमत तो इतनी बढ़ी है कि लोग सुबह बगीचों में जाकर नकली हँसी हँसते हैं। हालाँकि नकली हँसी असली रोने से भी ज्यादा दयनीय होती है। सेहतमंद होने के लिए नकली हँसने वालों को देखकर रोना आता है। उनसे गरीब और कौन होगा, जो खुल के हँस भी नहीं सकते। हँसाने वालों का सम्मान भी बढ़ा है। प्रतिष्ठित हास्य कवि इन दिनों पचास-पचास हजार रुपए पेमेंट माँगते हैं और ये पेमेंट उन्हें दिया भी जाता है। सबसे ज्यादा सम्मान मिला है राजू श्रीवास्तव को, जिनके बारे में बच्चों को पढ़ाया जाएगा। सीबीएसई पाठ्यक्रम के तहत आठवीं के कोर्स में एक पाठ राजू श्रीवास्तव के बारे में भी है।राजू को ये सम्मान ऐसे ही नहीं मिला है। वे वाकई इसके हकदार हैं। सोनी टीवी पर आने वाले कॉमेडी शो को आप देखिए। हँसाने के लिए प्रतियोगी इतने नीचे तक चले जाते हैं, जिसके नीचे सिर्फ अंतिम खुलापन ही बचता है। स्टैंड अप कॉमेडी करने वाले कई लोग बहुत फूहड़, उबाऊ और अश्लील हैं। इसके बरखिलाफ राजू श्रीवास्तव अव्वल तो अश्लीलता से दूर रहते हैं। अपवादस्वरूप यदि कभी कोई हलका चुटकुला आ जाए, तो सुनाते समय उनके काले गाल शर्म से बैंगनी हो जाते हैं और उनकी ये अदा और अच्छी लगती है।राजू श्रीवास्तव जब कोई कॉमेडी आइटम तैयार करते हैं, तो उन्हें भान रहता है कि गाँव में बैठी मेरी माँ भी इसे देखेगी, भौजी भी, बहन भी, मौसी भी और मुहल्ले की तमाम औरतें भी। यही वजह है कि राजू श्रीवास्तव बिना बहुत नीचे गिरे, खूब हँसाते हैं। और सच पूछा जाए तो असल हँसाना यही है। प्रतिभा इसी से नजर आती है कि हास्य अशिष्ट न हो। राजू श्रीवास्तव की ताकत है उनके संस्कार और उनकी भारतीयता। उनसे कहा गया कि विदेशी शो की नकल कीजिए। उन्होंने अमेरिकन कॉमेडी शो की नकल से इंकार कर दिया।राजू श्रीवास्तव के पास जैसा आब्जर्वेशन पावर है, जैसा परिहास बोध है, दूसरों के पास नहीं है। टीवी पर आने वाले लहरदार पट्टों का वो अभिनय कर लेते हैं। उनका एक आइटम है घर के बर्तनों की आपसी बातचीत का। निर्जीव चीजों में अपने ऑब्जर्वेशन पावर से वो व्यक्तित्व ढूँढ लेते हैं और अपनी अदाकारी से उन विभिन्ना व्यक्तित्वों को उजागर भी कर देते हैं। एक तरफ हास्य कवि हैं, जो चुटकुलों को अपने ढीली-ढाली तुक में बैठाते हैं और मौलिकता के नाम पर उनके पास लगभग कुछ नहीं होता। दूसरी तरफ राजू हैं, जिनके पास मौलिकता की कोई कमी नहीं है। टीवी पर राजू श्रीवास्तव के देखे हुए आइटम भी घंटों देखे जा सकते हैं। सीबीएसई पाठ्यक्रम में उन्हें लिया जाना उनकी प्रतिभा और योगदान को रेखांकित करने वाला है। स्टैंड अप कॉमेडी की विधा को राजू ने नई ऊर्जा दी है। इससे पहले स्टैंड अप का मतलब होता था मिमिक्री। जॉनी लीवर तक मिमिक्री ही किया करते थे। पहली बार है जब शुद्ध हास्य को इतना सम्मान दिया गया है और मजे की बात यह है कि सम्मान के ठोस कारण भी मौजूद हैं।