नरक कितने, कहां होते हैं और कौन जाता है, रहस्यमयी ज्ञान...


अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|
कौन जाता है के द्वार : कुछ लोग कहते हैं कि स्वर्ग या नरर्क हमारे भीतर ही है। कोई भी ऐसा नहीं हो जो मनुष्य के किये की सजा या पुरस्कार देता हो। मनुष्य अपने कर्मों से ही स्वर्ग या नरक की स्थिति को भोगता है। यदि वह बुरे कर्म करेगा को बुरी जगह और बुरी परिस्थिति में होगा और अच्छे कर्म करेगा तो अच्छी जगह और परिस्थिति में होगा। कुछ हद तक यह बात सही मानी जा सकती है, लेकिन इसके सही होने के पीछे के विज्ञान या मनोविज्ञान को समझना होगा। पुराणों अनुसार कैलाश के उपर स्वर्ग और नीचे नरक व है। संस्कृत शब्द स्वर्ग को मेरु पर्वत के ऊपर के लोकों हेतु प्रयुक्त किया है। जिस तरह धरती पर पाताल और की स्थिति बताई गई है उसी तरह धरती पर स्वर्ग की स्थिति भी बताई गई है। आज के कश्मीर और हिमालय के क्षेत्र को उस काल में स्वर्गलोक कहा जाता था, जहां के आकाश में बादल छाए रहते थे और जहां से पानी सारे भारत में फैलता था। हिमालय में ही देवात्म नामक एक हिमालय है जहां अच्छी आत्माएं शरीर छोड़ने के बाद रहती हैं।
 
पुराणों अनुसार जीवात्मा 84 लाख योनियों में भटकने के बाद मनुष्य जन्म पाती है। अर्थात नीचे से ऊपर उठने की इस प्रक्रिया को ही ऊर्ध्वगति कहते हैं। अदि मनुष्य अपने पाप कर्मों के द्वारा फिर से नीचे गिरने लगता है तो उसे अधोगति कहते हैं। अधोगति में गिरना ही नरक में गिरना होता है। जिस तरह हमारे शरीर जब रात्रि में अचेत होकर सो जाता है तब हम हर तरह के स्वप्न देखते हैं यदि हम लगातार बुरे स्वपन्न देख रहे हैं तो यह नरक की ही स्थिति है। यह मरने के बाद अधोगति में गिरने का संकेत ही है। वर्तमान में चौरासी लाख योनियों से भी कहीं अधिक योनियां हो गई होगी। हालांकि पुरानी गणना अनुसार निम्नलिखित 84 लाख योनियां थी। इस आप संख्या में न लेकर प्रकार में लें।
 
* पेड़-पौधे - 30 लाख 
* कीड़े-मकौड़े - 27 लाख
* पक्षी - 14 लाख
* पानी के जीव-जंतु - 9 लाख
* देवता, मनुष्य, पशु - 4 लाख   
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