प्यार वह अनुभूति है, जिससे मन-मस्तिष्क में कोमल भावनाएँ जागती हैं, नई ऊर्जा मिलती है व जीवन में मीठी यादों की ताजगी का समावेश हो जाता है।
विशेष रूप से पति-पत्नी के बीच प्यार ही वह डोर है, जो उन्हें एक-दूसरे से बाँधे रखती है। व्यक्ति के जीवन पर प्रतिकूल परिस्थितियों का बहुत प्रभाव पड़ता है। अतः बदलती सामाजिक और पारिवारिक स्थितियाँ दाम्पत्य जीवन की कोमलता पर भी रूखेपन का लेप चढ़ा देती है। अकसर जब बच्चे युवा होने लगते हैं तो दायित्वों की परिधि स्वतः ही बढ़ जाती है और पति-पत्नी दायित्वों और चिंताओं में उलझकर परस्पर भावनात्मक और आत्मीय स्तर पर एक-दूसरे से दूर होने लगते हैं। वे सोचने लगते हैं बच्चे बड़े हो गए हैं, अब हमारा जमाना गुजर गया है।
बढ़ती उम्र की वजह से जहाँ शारीरिक आकर्षण कम होने लगता है, वहीं यदि भावनात्मक लगाव भी दम तोड़ने लगे तो निश्चित ही सुखद स्थितियाँ निर्मित नहीं हो सकती हैं। बच्चों के बड़े होने पर वे अपने भविष्य, अपने कैरियर के प्रति ज्यादा ध्यान देने लगते हैं। उनकी अपनी सोच विकसित हो जाती है। ऐसी स्थिति में वे अपने माता-पिता की आंतरिक भावनाओं को ठीक से समझ नहीं पाते हैं और साथ ही जनरेशन गेप की भावना भी उनके मन में समा जाती है।
अब आप सोचिए कि बच्चों का पूर्ण सान्निध्य नहीं मिलना व साथ ही आपकी कुंठाग्रस्त सोच कि 'हमारा जमाना गया' आपके दाम्पत्य जीवन पर प्रश्न चिह्न लगा देगी, जिसके कारण आंतरिक टूटन, घुटन, अलगाव, खीझ, चिड़चिड़ापन और संभवतः विवाहेतर संबंधों को बढ़ावा मिलेगा। अतः आप अपने विवाह के शुरुआती दौर को याद करें, अपने एलबमों को बार-बार देखें। एक-दूसरे की भावनाओं को समझें। एक-दूसरे को यह अनुभूति करवाइए कि 'तुम हो, तुम्हारा अर्थ है, तुम्हारा अस्तित्व है और हमेशा रहेगा।' पति-पत्नी दोनोंको एक-दूसरे के साथ इस तरह का व्यवहार करना चाहिए कि हर पल, हर घड़ी प्यार अपनेपन का एहसास होता रहे, जिससे जिंदगी सार्थक लगे।