आचार्य महाश्रमण की अहिंसा यात्रा : इंसानियत की लहलहाती हरीतिमा का आगाज


- ललित गर्ग
 
 
समय-समय पर रह-रहकर सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं ऐसा वीभत्स एवं तांडव नृत्य करती रही हैं जिससे संपूर्ण मानवता प्रकंपित हो जाती है। हाल ही में पूर्वी दिल्ली के कुछ इलाके हो या इससे पूर्व उत्तरप्रदेश का मुजफ्फरनगर- सांप्रदायिक विद्वेष, नफरत एवं घृणा ने ऐसा माहौल बना दिया है कि इंसानियत एवं मानवता बेमानी से लगने लगे हैं।
 
अहिंसा की एक बड़ी प्रयोग भूमि भारत में आज सांप्रदायिक की यह आग- खून, आगजनी एवं लाशों की ऐसी कहानी गढ़ रही है जिससे घना अंधकार छा रहा है। चहूंओर भय, अस्थिरता एवं अराजकता का माहौल बना हुआ है।
 
जब-जब इस तरह मानवता ह्रास की ओर बढ़ती चली जाती है, नैतिक मूल्य अपनी पहचान खोने लगते हैं, समाज में पारस्परिक संघर्ष की स्थितियां बनती हैं, तब-तब कोई न कोई महापुरुष अपने दिव्य कर्तव्य, चिन्मयी पुरुषार्थ और तेजोमय शौर्य से मानव-मानव की चेतना को झंकृत कर जन-जागरण का कार्य करता है। 
 
भगवान महावीर हो या गौतम बुद्ध, स्वामी विवेकानंद हो या महात्मा गांधी, गुरुदेव तुलसी हो या आचार्य महाप्रज्ञ- समय-समय पर ऐसे अनेक महापुरुषों ने अपने क्रांत चिंतन द्वारा समाज का समुचित पथदर्शन किया। अब इस जटिल दौर में सबकी निगाहें उन प्रयत्नों की ओर लगी हुई हैं जिनसे इंसानी जिस्मों पर सवार हिंसा का ज्वर उतारा जा सके।
 
ऐसा प्रतीत होता है कि आचार्यश्री महाश्रमण की अहिंसा यात्रा इन घने अंधेरों में इंसान से इंसान को जोड़ने का उपक्रम बनकर प्रेम, भाईचारा, नैतिकता, सांप्रदायिक सौहार्द एवं अहिंसक समाज का आधार प्रस्तुत करने को तत्पर है। महाभारत में भगवान कृष्ण अर्जुन को संबोधित करते हुए कहते हैं-
 
यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।
 
अर्थात हे अर्जुन! जब-जब धर्म की शिथिलता और अधर्म की प्रबलता होती है, तब-तब ही मैं (यानी ईश्वर) जन्म लेता हूं। वेदव्यास महाभारत के भीष्म पर्व में आगे कहते हैं-
 
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे-युगे।।
 
अर्थात साधुओं की रक्षा, दुष्टों के नाश और धर्म की स्थापना के लिए मैं (यानी ईश्वर) युग-युग में जन्म लेता हूं।
 
 



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