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संवेदनाएँ खो गई हैं कहीं...

प्रेम दया वात्सल्य परोपकार अहिंसा
-सुषमा दुब

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प्रेम, दया, वात्सल्य, परोपकार, अहिंसा, हँसना, रोना, मानवता आदि गुण मनुष्यता के अलंकार माने जाते हैं, किंतु आज मानव अपनी संवेदनाएँ भूलकर पशुता की ओर बढ़ रहा है। वह न दूसरों के दुःख में रोता है, न सुख में हँसता है और न ही भावनाएँ प्रकट करता है। सड़क पर एक्सीडेंट से घायल आदमी को देखने भीड़ तो सैकड़ों लोगों की जुटती है, पर उसे अस्पताल ले जाने वाला बिरला ही मिलता है।

इसके कई कारण हो सकते हैं, जैसे-

* कमाने की होड़।

* प्रतिस्पर्धा की भावना।

* नकली और अयोग्य व्यक्तियों द्वारा लाभ लेना।

* घटनाएँ रोज-रोज होने से इनका आदी हो जाना।

* कोर्ट/ पुलिस के झंझट में पड़ने की अनिच्छा।

* केवल अपना ही स्वार्थ देखना।

* समय की कमी।

ऐसे ही कई कारणों से व्यक्ति पर स्वार्थ हावी हो गया है, किंतु जरा कुछ पल सोचिए। आप भी इंसान हैं और किसी दिन मुसीबत आप पर भी आ सकती है। तो आइए, कुछ ऐसा करें कि हमारी इंसानियत जीवित रहे :

* कभी राह चलते बीच सड़क पर रखे पत्थर को हटाकर देखें। शायद कहीं कोई दुर्घटना होने से बच जाए।

* कभी-कभी नन्हे बच्चों के संग खेलें, उनसे बतियाएँ या उन्हें कहानी सुनाएँ। यकीन मानिए ये आपको तरोजाता कर देगा। कुछ समय के लिए आप तनावमुक्त हो जाएँगे।

* कभी किसी बुजुर्ग के हाथ-पैर दबाएँ, उनकी मालिश कर दें। आपको आशीर्वाद के साथ-साथ मानसिक शांति भी मिलेगी।

* किसी वृद्ध या अशक्त को सड़क पार करवा दें।

* दुःखियों के आँसू पोंछें, उन्हें सांत्वना दें।

* मंदबुद्धि या विकलांग लोगों को सहानुभूतिभरी दृष्टि से देखने की बजाय उन्हें दुलारें या उनका उत्साहवर्धन करें।

* हमेशा दूसरों पर हँसने की बजाय कभी खुद की गलतियों पर भी हँसें।

* चुटकुलें सुनें/ सुनाएँ। छोटी-छोटी बातों पर भी खिलखिलाएँ।

* दूसरों की तारीफ करें।

* किसी के जन्मदिन पर उपहार या एक फूल की कली लेकर अचानक पहुँच जाएँ।

* परिचितों/ रिश्तेदारों को कभी-कभी बिना काम के भी फोन लगाएँ या एसएमएस करें।

* कभी-कभी शांत प्रकृति में विचरें, फूलों, पहाड़ों, झरनों को निहारें, चिड़ियों का कलरव सुनें, असीम सुकून मिलेगा।

आपाधापी के इस युग में सिर्फ कमाने एवं दूसरों से आगे निकलने की होड़ में ही न लगे रहें। आप मानव हैं और आपके पास एक प्यारा-सा मन है, उसका भी ध्यान रखें, ताकि इंसानियत बची रहे।