विस्मृत होती दादी-नानी
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अपने बहू-बेटों को रिश्तों की अहमियत का पाठ पढ़ाती, दुख के थपेड़ों में परिवार की हिम्मत बढ़ाती, अपनी लोरी से व चंदा मामा की कहानियों से अपने नवासों और पोते-पोतियों को मीठी नींद सुलाने वाली दादी-नानी अब अपने ही परिवार में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करती नजर आ रही हैं। लोग कहते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ अब उनके अनुभव व सोच भी बूढ़े हो गए हैं इसलिए वो नई पीढ़ी के लोगों के साथ रहने के काबिल नहीं है।
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दूर से ही अपने नाती,पोतों को देखकर खुश होना, उनके जन्मदिन पर मिठाई बाँटना, उनके दुख-दर्द में दिन-रात खुशियों की तलाश करना ... बस अब यही काम होता है दादी-नानी का, जो आज भी अपनी फूटी ऐनक से दुनिया को देखती हैं व परायों के बच्चों में अपने पोते-पोतियों का आभास करके खुश होती हैं।
क्या शोहरत इतनी अच्छी होती है कि अपने आँचल में छुपाकर दूध पिलाने वाली माँ का आँचल आज हमें मैला नजर आता है? उसका लाड़-प्यार आज हमें दकियानूसी बातें लगती हैं तथा उनकी संगत हमारे बच्चों को भटकाव की राह पर ले जाने वाली लगती है। यदि ऐसा है तो शायद हम भ्रम में जी रहे हैं। यह मत भूलिए कि कल को आपकी दुर्दशा भी यही हो सकती है तथा आज के बच्चों कल को आपकी सोच को भी पुराना कहने लगेंगे।
कहते हैं पैसे से सब कुछ मिल जाता है परंतु याद रखिए कि पैसे से दादी-नानी का प्यार व उनके संस्कार नहीं मिलते। वो तो ममता की वो खदान होती हैं, जिसमें संस्कार, प्यार व रिश्तों की अहमियत का सोना छुपा होता है लेकिन क्या करें आजकल के बच्चों का परिवार तो उनके माँ-बाप तक ही सिमटकर रह गया है।
अब भी वक्त है सँभल जाइए तथा अपने परिवार से जुदाई सहते इन बड़े-बुजुर्गों को अपने घर व दिल में स्थान दीजिए। जब तक इनका साथ है तब तक आपके साथ ईश्वर की कृपा है। आज इन्हें आपकी दुत्कार व तानों की नहीं बल्कि प्यार की जरूरत है।
