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पिता-पुत्र के बीच सेतु बनाएँ माँ को...

पिता बेटा परिवार
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कल शर्माजी के यहाँ से सुबह-सुबह लड़ने की आवाज आई तो देखा कि पिता-पुत्र में जमकर घमासान हो रहा है। दोनों एक-दूसरे को कोसने और अपशब्द कहने में लगे हुए थे। दोनों की कहासुनी इस कदर बढ़ी कि बेटा अपने परिवार सहित कार में बैठकर घर छोड़कर चला गया। बात छोटी-सी थी कि बेटे ने कुछ जरूरी कागजात दुकान में छोड़ दिए थे। पिता का कहना था ऐसी लापरवाही रखेगा तो कुछ कमा नहीं पाएगा।

ऐसे ही मिश्राजी की अपने बेटे से रोज एक ही बात पर बहस होती कि दिनभर टी.वी. देखने की बजाए कुछ काम क्यों नहीं करते। त्रिवेदीजी और उनके बेटे में जब भी घर में रहते कुछ न कुछ खटर-पटर चलती रहती थी। वे किसी भी बात पर एक मत नहीं होते थे। एक पूर्व तो दूसरे को पश्चिम की तरफ चलना जरूरी लगता था।

इस तरह पांडे्‌य साहब जब भी मिलते अपने बेटे की जमकर बुराई जरूर करते। ऐसा नहीं है कि उन्हें अपने बेटे से प्रेम नहीं, पर पता नहीं क्योंकि उनकी जमती ही नहीं थी। वे सोचते थे कि बेटा सभी रिश्तेदारों के यहाँ जाया करे, पर बेटे को लगता कि रिश्तेदारों के यहाँ जाना समय की बर्बादी है। इस कारण उनमें हमेशा तनाव बना रहता था।

इस तरह के वाकये लगभग हर घर में देखने को मिल जाते हैं। शर्माजी का बेटा जब घर छोड़कर गया तो उसकी माँ का चेहरा देखने लायक था। वह आगे बढ़कर बेटे को रोक भी नहीं पाई। ये लड़ाई और बहस भले ही साधारण हो पर इसका असाधारण असर दिखाई देता है-माँ पर। क्योंकि इन दोनों विचारधाराओं में बेचारी माँ पिस जाती है। मम्मा आप पापा को समझा लो। ये मेरी बात नहीं सुनते हैं। सुनो तुम अपने लाड़ले को समझा लो। या फिर- 'आप इनसे (पापा से) कह दो कि मेरे दोस्तों के सामने मेरी बुराई न किया करें। मेरे मामलों में टाँग न अड़ाएँ।'

'इससे (बेटे से) कह दो कि समाज में मेरी इज्जत खराब न करे। हमेशा जुबान लड़ता रहता है। अपने बेटे से कह दो कि उसे वही करना पड़ेगा जो मुझे ठीक लगेगा।' ऐसे कितने ही निर्णयों को दोनों एक-दूसरे पर थोपते रहते हैं। ऐसे अनेक परिवार हैं, जहाँ पति और बेटों के बीच माँ संचार सेतु का काम करती है। वे अपना कोई भी मैसेज सीधे नहीं देते चाहे वह व्यक्तिगत मामला हो या पारिवारिक हो। किसी निर्णय को लेना हो या कोई माँग हो। इन सबमें माँ एक डाकिए की तरह हो जाती है जिसे सिर्फ संदेश देने का काम करना पड़ता है। उसकी अपनी राय लेना तो दूर, वे अपनी विचारधाराओं को उस पर थोपते हैं।
शर्माजी की पत्नी से जब भी मिलो वे दोनों के कारण बड़ी परेशान दिखाई देतीं। कहती है- मैं आखिर किसका साथ दूँ? बेटे का साथ देती हूँ तो पति नाराज हो जाते हैं और उनका देती हूँ तो बेटे को खोने का डर बना रहता है। यह विडंबना किसी एक माँ की नहीं बल्कि लगभग हर उस बेटे की माँ की है, जिनकी विचारधारा अपने पिता से स्वतंत्र चलती है। पिता से बेटे का संबंध एक स्तर पर आकर बराबरी का हो जाता है। इस कारण वह किसी दबाव में आकर निर्णय करने से इंकार करता है। और पिता को लगता है कि वो अपना सम्मान खो रहे हैं तो वे उसे दबाने की कोशिश करते हैं।

सामान्य परिवारों में जहाँ महिलाएँ घर में रहती हैं और सभी निर्णयों का अधिकार पतियों का रहता है, वहाँ इस प्रकार की स्थिति आम है क्योंकि पति घर में चलने वाली अपनी हुकूमत में हिस्सेदारी नहीं चाहते और वे अपनी पत्नी को बेटे की तरफदारी करते नहीं देख सकते। लेकिन इसमें दुविधा स्त्री की हो जाती है जो पति और बेटे के बीच पिस जाती है। यहाँ वह किसी एक के पक्ष में नहीं बोल पाती और उसे जो कुछ भी हो रहा है वह देखना पड़ता है। इस बहस में माँ का व्यक्तिगत अस्तित्व कहीं खो जाता है।

पिता-पुत्र के बीच एक कड़ी बनी माँ उनकी विचारधाराओं में पिसने लगती है और इसका अंत कई जगह पर बड़ा बुरा देखा गया। लेकिन उन पिता-पुत्रों को चाहिए कि वे बेहतर संवाद स्थापित करने के लिए माँ को सेतु बनाएँ तो उसके विचारों को भी महत्व देना सीखें। इस प्रकार के संवाद में किसी पर कोई आरोप नहीं लगेगा कि कोई अपनी मर्जी थोपने की कोशिश कर रहा है। इससे परिवार का स्वरूप भी बना रहेगा।