दिलों की दूरियाँ नहीं पटती
|
कभी लाख अपमान व प्रहार सहने पर भी दोस्त आत्मविश्वास बन हमारी हिम्मत बन जाता है, तो कभी एक छोटी सी चोट से काँच के खिलौने की तरह छन से टूटकर बिखर जाता है। इस बात का हमें तनिक भी पूर्वाभास नहीं होता है। हमारी जरा सी नासमझी कब हमसे हमारा सच्चा दोस्त छीन लेती है। इस बात का हमें तब अहसास होता है, जब हमारा दोस्त हमसे बहुत दूर चला जाता है।
दूरियाँ स्थानों की हो, तो कोई बात नहीं परंतु जब दिलों में दूरियाँ हो जाती है तथा मन में किसी के प्रति अविश्वास व दगाबाजी की भावना आ जाती है, तब यह सुंदर सा रिश्ता पलभर में ही टूटकर बिखर जाता है और रह जाते हैं केवल पश्च्याताप के आँसू।
| |
दोस्त की यह मदद हम भले ही भूल जाते हैं, परंतु जीवन के उत्तरार्द्ध में जब हम अकेले होते हैं व तकलीफ में होते हैं तब जरूर रह-रहकर हमें अपने उस मददगार व समझदार दोस्त की याद आती है।
किसी को 'दोस्त' कहने मात्र से ही इंसान में जिम्मेदारी की भावना जाग्रत हो जाती है। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम बदलते मौसम की तरह अपने तेवर बदलकर जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ लेते हैं या फिर दुखों की बरसात में भी हिम्मत की छतरी बन अपने दोस्त की सुरक्षा करते हैं। हर रिश्ते की तरह इस रिश्ते में भी जहाँ प्यार, विश्वास व आत्मीयता होती है, वहीं दर्द, शक व गलती की गुजांइश भी। अब आप ही निर्णय कर सकते हैं आप अपनी दोस्ती के पैमाने पर कितना खरा उतरते हैं?
जिंदगी की हर मुसीबतों में ढाल बन दोस्त हमें सुरक्षा प्रदान करता है। एक हमराज बन वह हमारा हमसाया बनकर साथ चलता है और 'मैं हूँ ना' कहकर हमारी हर गलती को सुधार देता है। परंतु नासमझी व कही-सुनी बातों में आकर यदि हम ऐसे दोस्त को खो देते हैं तथा ऐसा कार्य करते हैं, जिससे हमारे उस अपने का दिल टूट जाता है, तो सच कहूँ ऐसे इंसान से अधिक दुर्भाग्यशाली व्यक्ति कोई और नहीं होगा।
