क्या आप भी अपनों पर जहर उगलते हैं?
भारती पंडित
वास्तव में संबंधों का रसायन भी क्रिया-प्रतिक्रिया के नियम पर ही चलता है, यानी हम जो देंगे, वही हमें प्राप्त होगा... आपकी नकारात्मकता का आज भले ही आपको जवाब न मिले, मगर कालांतर में आपको इसकी प्रतिक्रिया का शिकार किसी न किसी रूप में होना ही पड़ेगा।
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रिश्ते खुशी देते हैं, तो एवज में उन्हें सहेजने का कर्म भी तो करना होगा न...! ये सच है कि जो हमारे सबसे करीब होते हैं, अक्सर वे ही नजर नहीं आते, पूरी दुनिया नजर आती है, लेकिन वे ही भूले से रहते हैं। हमारी खीझ, कमी, झल्लाहट, हताशा और नकारात्मकता का शिकार होते हमारे अपने हमारे प्यार, सांत्वना, परवाह, समर्पण और तरलता का भी तो हक रखते हैं, तो क्यों सारी दुनिया में डिसेंट होते-होते हम अपनों के ही सामने फट पड़ते हैं। उन्हें भी तो अपनी सॉफ्टनेस का दर्शन कराएं।
सुबह होते ही मानों घर में भूचाल आ जाता है। बर्तन-भांडे के साथ मुंह भी बजने लगते हैं। ये नहीं किया, वो नहीं हुआ, इतनी-सी बात समझ में नहीं आती, तुम्हें तो कुछ भी नहीं आता जैसी ढेरों नहीं-नहीं... घर के वातावरण में घुलती जाती हैं। अलार्म नहीं बजा, काम समय पर नहीं हुआ, देर हो गई, इन सबका गुस्सा उतरा स्कूल के लिए तैयार होते बच्चों पर... कारण तो जरा-सा था, मगर उसका प्रभाव एक स्थायी नकारात्मकता के रूप में दिनभर के लिए बच्चों के दिलों-दिमाग में बस गया।
घर-दफ्तर में अपनी व्यवहारकुशलता के लिए माने जाने वाले श्रीमान 'क' घर में घुसते ही मानो चोला बदल डालते हैं। घर में घुसते ही दृष्टि केवल कटाक्ष करने वाले कारणों को, वस्तुओं को ढूंढती रहती है। चाय बेस्वाद है से शुरू हुआ संवाद कितना अस्त-व्यस्त है घर, कितना शोर-शराबा है, सलीके से बैठो, चुप तो रहो थोड़ी देर, आखिर इतना भी नहीं होता तुमसे... जैसे प्रहारों के साथ इति पाना है और स्वागतार्थ निकट आए पत्नी और बच्चे चुपचाप इधर-उधर हो लेते हैं... मन में आपके व्यवहार की नकारात्मक छाप लिए ...।
