अनजानी डोर कहे ''मैं हूँ ना!''
बकुला पारेख
कभी-कभी कठिन परिस्थितियों में जब कहीं कोई सहारा नजर नहीं आता तो अचानक कोई उम्मीद की किरण बनकर आ जाता है और मुसीबत के बादल छँट जाते हैं।
सिर्फ तीन अक्षर मात्र से जमा यह वाक्य स्वयं में गूढ़ आत्मीयता का अर्थ लिए है। आज के इस युग में जहाँ पारिवारिक रिश्तों में ही खटास बनी रहती है, वहाँ पारिवारिक परिवेश से बाहर इन तीन अक्षरों के साथ कुछ मूक सेवक दूसरों की जिंदगी आबाद करते हैं।
दुनिया में बाबा आमटे, मदर टेरेसा की तरह संपूर्ण जगत को अपना परिवार समझकर सेवा करने वाले भी हैं, तो 'मूर्ति' दंपति की तरह जरूरतमंदों की सहायता करने वाले भी हैं। ये सभी जरूरतमंदों के लिए 'मैं हूँ ना' बने हुए हैं।
आइए कुछ मिसालों से रूबरू होते हैं, जिनमें इन तीन शब्दों की सामीप्य की ऊष्मा से कुछ जिंदगियाँ सँवर गई हैं।
शादी के 5 साल के पश्चात कृति की गोद हरी नहीं हो पाई। इस पर ससुराल वालों ने उसे बाँझ समझ लिया। किसी भी कार्यक्रम में इसी प्रश्न की पुनरावृत्ति पर कृति परेशान रहने लगी। संतान प्राप्ति हेतु बेटे का ब्याह अन्यत्र करने की बात तक घर में चलने लगी। तब 'मैं हूँ ना' की तर्ज पर कृति की ममिया सास, जो कि लेडी डॉक्टर हैं, पेश आई।
उसने कृति एवं उसके पति को चिकित्सकीय जाँच के लिए प्रेरित किया। परिणाम देखकर सासूजी चौंकी, कमी स्वयं के बेटे में थी। आगे अपनी आर्थिक क्षमता के अनुरूप इलाज शुरू किए, लेकिन उन नाजुक क्षणों में कृति का हाथ थामने वाली डॉक्टर सास की कृति हमेशा कृतज्ञ है।
शादी के मंडप में आकस्मिक दहेज की माँग पर कविता का रिश्ता टूट गया। उपस्थित मेहमान खुसर-पुसर करते हुए रवाना हो गए, सिर्फ एक युवक को छोड़कर जिसने इस नाजुक स्थिति को समझा एवं बगैर दहेज के उसी मंडप में कविता के साथ ब्याह करने को राजी हो गया।
स्वयं के ही निर्णय पर कविता की जिंदगी के उन नाजुक क्षणों में उसका हाथ थामने वाला वह नवयुवक 'मैं हूँ ना' को सार्थक करते हुए सुखी दांपत्य जीवन बिता रहा है।
अविनाश को व्यापार में घाटा हो गया। आर्थिक पतन के दौर में दूर का क्या अपना भी साथ नहीं देता। इस सदमे से उसकी पत्नी भी चल बसी। दो बच्चों के साथ आर्थिक समस्या से जूझ रहा अविनाश सब तरफ से निराश हो चुका था। इस कठिन समय में 'मैं हूँ ना' को सार्थक करती हुईं गंगादेवी, अविनाश के पुराने मुनीमजी की पत्नी ने आकर बच्चों को दादी की तरह संभाल लिया।
मुनीमजी ने अविनाश को पिता की तरह व्यापार संबंधी कुछ हिदायतें समझाईं। मुनीमजी एवं गंगादेवी के 'अपनत्व' ने अविनाश को पुनः स्फूर्ति से भर दिया। अब वह गृहस्थी को भलीभाँति चला रहा है।
कस्बे के स्कूल में पढ़ रही सुशीला कक्षा में हमेशा अव्वल आती है। बारहवीं कक्षा में पूरे कस्बे में प्रथम आई। आर्थिक परिस्थिति कमजोर होने के कारण आगे पढ़ने में अक्षम तो थी ही साथ ही घर से शादी करने का दबाव भी डाला जा रहा था। इन परिस्थितियों से परेशान सुशीला ने अपनी स्कूल प्राचार्या से बात की।
'मैं हूँ ना' की तर्ज पर प्राचार्या ने दोनों परिस्थितियों से निकलने में सहायता की। हालाँकि मुश्किल जरूर आई फिर भी वह अपने उद्देश्य के अनुरूप पढ़ाई करने में कामयाब हुई और अब वह एक स्कूल में शिक्षिका के पद पर कार्यरत है।
नमिता एक ऑफिस में काम करती है। उसके बॉस का रवैया उसकी तरफ अच्छा नहीं है। सब कुछ जानते हुए भी वह सर्विस करने पर मजबूर है, कमजोर आर्थिक परिस्थिति की वजह से। अचानक निरीक्षण पर आए बड़े साहब की नजरों से यह बात छिपी नहीं। नमिता को स्वयं की बेटी कीजगह पर सोचकर 'मैं हूँ ना' की तर्ज पर उन्होंने उसके बॉस का तबादला दूसरे शहर में करवा दिया।
इन उदाहरणों के अलावा कुछ सहायता समूह भी बने हुए हैं, जो जरूरतमंदों की 'मैं हूँ ना' की तर्ज पर मदद करते हैं, जैसे
* मामूली शुल्क पर व्यावसायिक प्रशिक्षण देने वाले संस्थान।
* पढ़ने वाले जरूरतमंद विद्यार्थी को अधिक पारिश्रमिक पर काम देने वाले संस्थान।
* पीड़ित स्त्रियों की मदद हेतु कार्यरत संस्थान।
* विकलांगों हेतु कार्यरत संस्थान।
* मूक प्राणियों की चिकित्सा हेतु कार्यरत संस्थान।
* मूक, बधिर एवं शारीरिक-मानसिक अस्वस्थता पीड़ितों हेतु कार्यरत संस्थान।
इन सबके बावजूद कभी यदि आप कठिनाई के दौर से गुजरने पर कहीं से भी सहायता नहीं ले पाते हैं तो, ऐसे समय में सच्चे मन से ईश्वर से प्रार्थना करें- 'हे ईश्वर आपकी बनाई इस सृष्टि में आपके बनाए नियमों का मैं प्रयासपूर्वक यथासंभव पालन करूँगा, मेरी समस्या से आप
अवगत ही हैं, तो आप भी प्रतिध्वनि के रूप में उत्तर सुनेंगे 'मैं हूँ ना'।
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सिर्फ तीन अक्षर मात्र से जमा यह वाक्य स्वयं में गूढ़ आत्मीयता का अर्थ लिए है। आज के इस युग में जहाँ पारिवारिक रिश्तों में ही खटास बनी रहती है, वहाँ पारिवारिक परिवेश से बाहर इन तीन अक्षरों के साथ कुछ मूक सेवक दूसरों की जिंदगी आबाद करते हैं।
दुनिया में बाबा आमटे, मदर टेरेसा की तरह संपूर्ण जगत को अपना परिवार समझकर सेवा करने वाले भी हैं, तो 'मूर्ति' दंपति की तरह जरूरतमंदों की सहायता करने वाले भी हैं। ये सभी जरूरतमंदों के लिए 'मैं हूँ ना' बने हुए हैं।
आइए कुछ मिसालों से रूबरू होते हैं, जिनमें इन तीन शब्दों की सामीप्य की ऊष्मा से कुछ जिंदगियाँ सँवर गई हैं।
शादी के 5 साल के पश्चात कृति की गोद हरी नहीं हो पाई। इस पर ससुराल वालों ने उसे बाँझ समझ लिया। किसी भी कार्यक्रम में इसी प्रश्न की पुनरावृत्ति पर कृति परेशान रहने लगी। संतान प्राप्ति हेतु बेटे का ब्याह अन्यत्र करने की बात तक घर में चलने लगी। तब 'मैं हूँ ना' की तर्ज पर कृति की ममिया सास, जो कि लेडी डॉक्टर हैं, पेश आई।
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शादी के मंडप में आकस्मिक दहेज की माँग पर कविता का रिश्ता टूट गया। उपस्थित मेहमान खुसर-पुसर करते हुए रवाना हो गए, सिर्फ एक युवक को छोड़कर जिसने इस नाजुक स्थिति को समझा एवं बगैर दहेज के उसी मंडप में कविता के साथ ब्याह करने को राजी हो गया।
स्वयं के ही निर्णय पर कविता की जिंदगी के उन नाजुक क्षणों में उसका हाथ थामने वाला वह नवयुवक 'मैं हूँ ना' को सार्थक करते हुए सुखी दांपत्य जीवन बिता रहा है।
अविनाश को व्यापार में घाटा हो गया। आर्थिक पतन के दौर में दूर का क्या अपना भी साथ नहीं देता। इस सदमे से उसकी पत्नी भी चल बसी। दो बच्चों के साथ आर्थिक समस्या से जूझ रहा अविनाश सब तरफ से निराश हो चुका था। इस कठिन समय में 'मैं हूँ ना' को सार्थक करती हुईं गंगादेवी, अविनाश के पुराने मुनीमजी की पत्नी ने आकर बच्चों को दादी की तरह संभाल लिया।
मुनीमजी ने अविनाश को पिता की तरह व्यापार संबंधी कुछ हिदायतें समझाईं। मुनीमजी एवं गंगादेवी के 'अपनत्व' ने अविनाश को पुनः स्फूर्ति से भर दिया। अब वह गृहस्थी को भलीभाँति चला रहा है।
कस्बे के स्कूल में पढ़ रही सुशीला कक्षा में हमेशा अव्वल आती है। बारहवीं कक्षा में पूरे कस्बे में प्रथम आई। आर्थिक परिस्थिति कमजोर होने के कारण आगे पढ़ने में अक्षम तो थी ही साथ ही घर से शादी करने का दबाव भी डाला जा रहा था। इन परिस्थितियों से परेशान सुशीला ने अपनी स्कूल प्राचार्या से बात की।
'मैं हूँ ना' की तर्ज पर प्राचार्या ने दोनों परिस्थितियों से निकलने में सहायता की। हालाँकि मुश्किल जरूर आई फिर भी वह अपने उद्देश्य के अनुरूप पढ़ाई करने में कामयाब हुई और अब वह एक स्कूल में शिक्षिका के पद पर कार्यरत है।
नमिता एक ऑफिस में काम करती है। उसके बॉस का रवैया उसकी तरफ अच्छा नहीं है। सब कुछ जानते हुए भी वह सर्विस करने पर मजबूर है, कमजोर आर्थिक परिस्थिति की वजह से। अचानक निरीक्षण पर आए बड़े साहब की नजरों से यह बात छिपी नहीं। नमिता को स्वयं की बेटी कीजगह पर सोचकर 'मैं हूँ ना' की तर्ज पर उन्होंने उसके बॉस का तबादला दूसरे शहर में करवा दिया।
इन उदाहरणों के अलावा कुछ सहायता समूह भी बने हुए हैं, जो जरूरतमंदों की 'मैं हूँ ना' की तर्ज पर मदद करते हैं, जैसे
* मामूली शुल्क पर व्यावसायिक प्रशिक्षण देने वाले संस्थान।
* पढ़ने वाले जरूरतमंद विद्यार्थी को अधिक पारिश्रमिक पर काम देने वाले संस्थान।
* पीड़ित स्त्रियों की मदद हेतु कार्यरत संस्थान।
* विकलांगों हेतु कार्यरत संस्थान।
* मूक प्राणियों की चिकित्सा हेतु कार्यरत संस्थान।
* मूक, बधिर एवं शारीरिक-मानसिक अस्वस्थता पीड़ितों हेतु कार्यरत संस्थान।
इन सबके बावजूद कभी यदि आप कठिनाई के दौर से गुजरने पर कहीं से भी सहायता नहीं ले पाते हैं तो, ऐसे समय में सच्चे मन से ईश्वर से प्रार्थना करें- 'हे ईश्वर आपकी बनाई इस सृष्टि में आपके बनाए नियमों का मैं प्रयासपूर्वक यथासंभव पालन करूँगा, मेरी समस्या से आप
अवगत ही हैं, तो आप भी प्रतिध्वनि के रूप में उत्तर सुनेंगे 'मैं हूँ ना'।
