मनोहर पर्रिकर : प्रोफाइल

भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेताओं में से एक थे। गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर अपनी सादगीपूर्ण जीवनशैली और साफ छवि के लिए चर्चाओं में रहे। 30 सालों बाद जब दिल्ली में मोदी सरकार बनी तो उन्हें गोवा से दिल्ली बुलाया गया और रक्षामंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
गोवा की गलियों में भी बिना किसी तामझाम के वे अपने स्कूटर से एक आम इंसान की तरह लोगों के बीच पहुंच जाते थे। लंबी बीमारी के बाद 17 मार्च 2019 को उन्होंने अंतिम सांस ली। वे पैनक्रियाज के कैंसर से पीड़ित थे।

मनोहर पहले देश के ऐसे मुख्ममंत्री थे, जो आईआईटी डिग्रीधारी थे। गोवा की राजनीति में भाजपा की जड़ें जमाने वाले पर्रिकर पहली बार 1994 में विधायक बने थे, तब पार्टी की सिर्फ चार सीटें हुआ करती थीं, लेकिन छ: साल के भीतर ही गोवा में भाजपा को पहली बार पर्रिकर ने सत्ता दिला दी और मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली।
पैनक्रियाटिक कैंसर से पीड़ित : पिछले साल फरवरी में ही पर्रिकर को एडवांस्ड पैनक्रियाटिक कैंसर होने का पता चला था। इसके बाद न्यूयॉर्क, दिल्ली, मुंबई और गोआ के अस्पतालों में पर्रिकर का इलाज चला। पणजी के पास स्थित उनके निजी आवास में ही मनोहर पर्रिकर का इलाज किया जा रहा था।

प्रारंभिक जीवन : मनोहर पर्रिकर का जन्म 13 दिसंबर 1955 को गोवा के मापुसा में हुआ था। मनोहर पर्रिकर ने आईआईटी मुंबई से इंजीनियरिंग डिग्री हासिल की।

राजनीतिक जीवन : गोवा में भाजपा की जड़ें जमाने वाले मनोहर पर्रिकर पहली बार 1994 में विधायक बने थे, तब पार्टी की सिर्फ 4 सीटें हुआ करती थीं, लेकिन छ: साल के भीतर ही गोआ में भाजपा को पहली बार पर्रिकर ने सत्ता दिला दी और वे मुख्यमंत्री बन गए।

24 अक्टूबर 2000 को वे पहली बार गोवा के मुख्यमंत्री बने। इसके बाद 5 जून 2002 को वे दोबारा मुख्यमंत्री पद के लिए चुने गए। वे गोआ के गृह, कार्मिक, सामान्य प्रशासन और शिक्षामंत्री भी रहे। 2005 में वे विपक्ष के नेता रहे और 2007 में पुन: चुने गए।
राष्ट्रीय राजनीति पर भी छोड़ी छाप : साफ छवि के मनोहर पर्रिकर 2009 में भाजपा अध्यक्ष की कुर्सी के करीब तक पहुंच गए थे, लेकिन लालकृष्ण आडवाणी पर दिए एक बयान ने उन्हें पार्टी के शीर्ष तक नहीं पहुंचने दिया, इसके बावजूद पांच साल के भीतर पर्रिकर की लोकप्रियता गोआ से बढ़कर महाराष्ट्र होते हुए दूसरे राज्यों तक भी पहुंची।

पर्रिकर 2012 में दूसरी बार मुख्यमंत्री बने और तब से उनके सुशासन और सादगी की चर्चा रही है। 2012 में विपक्ष में रहते हुए पर्रिकर ने कांग्रेस सरकार के दौरान हुए खनन घोटालों का पर्दाफाश किया था।
रक्षा मंत्री के रूप में लिए कई बड़े फैसले : मनोहर पर्रिकर ने 9 नवंबर 2014 को देश के रक्षा मंत्री के रूप में कार्यभार संभाला। पर्रिकर ने रक्षा मंत्रालय में आने के बाद कई बड़े फैसले लिए।

उरी में हुए आतंकी हमले में जवानों की शहादत का बदला अक्टूबर 2016 में भारत ने पाकिस्तान की सीमा में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक कर आतंकियों को ढेर करके लिया था। सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान भारतीय सेना के जाबांजों ने पाकिस्तान कई आतंकी कैंप ध्वस्त किए थे। सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान पूरी रात देश के रक्षा मंत्री ऑपरेशन पर नजर बनाए हुए थे।
भारतीय सेना मणिपुर में आतंकियों के खिलाफ पीछे साल के मई महीने म्यांमार सरहद पर खुफिया रिपोर्ट के बाद एक सफल ऑपरेशन को अंजाम दिया। इस ऑपरेशन पर मनोहर पर्रिकर की पैनी नजर थी और उन्हीं की निगरानी में इस ऑपरेशन को अंजाम दिया गया। पर्रिकर ने खुद उस वक्त के आर्मी प्रमुख को जमीनी हालात लेने के लिए भेजा था।

राफेल सौदे को दी थी हरी झंडी : लंबे समय से लटके राफेल फाइटर प्लेन के सौदे को रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर की अगुवाई में हरी झंडी मिली। सितंबर 2016 में भारत और फ्रांस के बीच राफेल फाइटर प्लेन के सौदे पर हस्ताक्षर हुए। भारत दौरे पर आए फ्रांस के रक्षा मंत्री ज्यां यीव ली ड्रियान और रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए। सैनिकों की 40 साल पुरानी 'वन रैंक वन पेंशन' की मांग को अमल के रास्ते पर ले जाने में पर्रिकर की बड़ी भूमिका देखी गई।
सादगी और ईमानदारी की मिसाल :
भारत में कोई भी मुख्यमंत्री इतना सामान्य नहीं रहा जितने कि मनोहर पर्रिकर। पिछले साल एक पूजा के सिलसिले में वे हरिद्वार गए थे और पूजा के बाद जब उन्होंने पंडित को दक्षिणा देने के लिए जेब में हाथ डाला तो कम रुपए थे। फिर उन्होंने अपने साथ चलने वाले व्यक्ति से 500 रुपए उधार लिए और पंडित की दक्षिणा दी। एक ईमानदार मुख्यमंत्री की हालत यही है कि उसकी जेब में 500 रुपए तक नहीं होते। यह घटना उनकी सादगी और सरलता को दर्शाती है।



और भी पढ़ें :