शाकंभरी नवरात्रि कब से हो रही है प्रारंभ, क्या करते हैं इस नवरात्र में?
Shakambhari navratri: शाकम्भरी नवरात्रि, पौष शुक्ल अष्टमी से आरम्भ होकर पौष पूर्णिमा पर समाप्त होती है। माता शाकंभरी का उत्सव 28 दिसंबर 2025 से प्रारंभ होकर 13 जनवरी 2026 को समाप्त होगा। 07 जनवरी से शाकम्भरी नवरात्रि प्रारंभ होगी जो 13 जनवरी को समाप्त होगी। 3 जनवरी 2026 शनिवार को शाकंभरी जयंती मनाई जाएगी।
क्या करते हैं इस नवरात्रि में?
वैसे तो वर्ष भर में चार नवरात्रि मानी गई है, आश्विन माह के शुक्ल पक्ष में शारदीय नवरात्रि, चैत्र शुक्ल पक्ष में आने वाली चैत्र नवरात्रि, तृतीय और चतुर्थ नवरात्रि माघ और आषाढ़ माह में मनाई जाती है। परंतु तंत्र-मंत्र के साधकों को अपनी सिद्धि के लिए खास माने जाने वाली शाकंभरी नवरात्रि का आरंभ पौष मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से होता है, जो पौष पूर्णिमा पर समाप्त होता है। समापन के दिन मां शाकंभरी जयंती भी मनाई जाएगी। तंत्र-मंत्र के जानकारों की नजर में इस नवरात्रि को तंत्र-मंत्र की साधना के लिए अतिउपयुक्त माना गया है। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार गुप्त नवरात्रि की भांति शाकंभरी नवरात्रि का भी बड़ा महत्व है।
इस नवरात्रि में क्या करते हैं? (महत्व और पूजा विधि)
शाकंभरी नवरात्रि का मुख्य उद्देश्य प्रकृति, वनस्पतियों और अन्न के प्रति आभार व्यक्त करना है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब पृथ्वी पर अकाल पड़ा था, तब मां दुर्गा ने शाकंभरी रूप धारण कर अपने शरीर से उत्पन्न शाक (सब्जियों) और फलों से संसार की रक्षा की थी।
पूजा के मुख्य कार्य:
सब्जियों और फलों का भोग: अन्य नवरात्रों के विपरीत, इस नवरात्रि में मां को विशेष रूप से ताजी हरी सब्जियां, फल और वनस्पतियां अर्पित की जाती हैं। मंदिरों में मां का श्रृंगार भी सब्जियों से किया जाता है।
कलश स्थापना और व्रत: भक्त अष्टमी के दिन व्रत का संकल्प लेते हैं और मां की मूर्ति या चित्र स्थापित कर 'दुर्गा सप्तशती' का पाठ करते हैं।
पर्यावरण के प्रति आभार: इस समय पौधों को जल देना और प्रकृति की रक्षा का संकल्प लेना अत्यंत शुभ माना जाता है।
दान-पुण्य: जरूरतमंदों को अन्न, शाक-भाजी और अनाज दान करने का विशेष महत्व है।
शाकंभरी जयंती: नवरात्रि के अंतिम दिन (पूर्णिमा) को 'शाकंभरी जयंती' के रूप में बड़े उत्साह से मनाया जाता है।