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सूर्य सप्तमी व्रत की पौराणिक एवं प्रामाणिक कथा

सूर्य सप्तमी व्रत की पौराणिक एवं प्रामाणिक कथा - Surya Saptami Vrat Katha
एक बार युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि कृपा करके यह बताइए कि कलयुग में स्त्री किस व्रत के प्रभाव से अच्छे पुत्र वाली हो सकती है? 


 

 
तब श्रीकृष्ण ने कहा कि प्राचीनकाल में इंदुमती नाम की एक वेश्या थी। उसने एक बार वशिष्ठजी के पास जाकर कहा कि मुनिराज, मैं आज तक कोई धार्मिक कार्य नहीं कर सकी हूं। कृपा कर यह बताइए कि मुझे मोक्ष कैसे मिलेगा?
वेश्या की बात सुनकर वशिष्ठजी ने बताया कि स्त्रियों को मुक्ति, सौभाग्य और सौंदर्य देने वाला अचला सप्तमी से बढ़कर और कोई व्रत नहीं है इसीलिए तुम इस व्रत को माघ शुक्ल सप्तमी के दिन करो, इससे तुम्हारा सभी तरह से कल्याण हो जाएगा।
 
वशिष्ठजी की शिक्षा से इंदुमति ने यह व्रत विधिपूर्वक किया और इसके प्रभाव से शरीर छोड़ने के बाद वह स्वर्गलोक में गई। वहां वह समस्त अप्सराओं की नायिका बन गई। स्त्रियों के लिए इस व्रत का विशेष महत्व है। 
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