आखि‍र क्‍या हैं प्रधानमंत्री मोदी की बांग्लादेश यात्रा के मायने?

अगर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव नहीं होता तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दो दिवसीय बांग्लादेश यात्रा का विश्लेषण निश्चय अलग दृष्टिकोण से किया जाता।

चुनाव है और पश्चिम बंगाल के मतदाताओं के किसी तरह बांग्लादेश में मोदी की गतिविधियों से प्रभावित होने की संभावना है तो उस दृष्टिकोण से देखा जाएगा। मोदी जब बांग्लादेश के सत्खीरा स्थित शताब्दियों पुराने 51 शक्तिपीठों में से एक जेशोरेश्वरी काली मंदिर में पूजा अर्चना कर रहे थे, सोने और चांदी के मुकुट चढ़ा रहे थे और वो लाइव भारत में दिख रहे थे तो फिर विरोधी और विश्लेषक यह टिप्पणी करेंगे ही कि बंगाल के हिंदू मतदाताओं को लुभाने के लिए वे ऐसा कर रहे हैं।

उसी तरह अगर उन्होंने मतुआ समुदाय के आध्यात्मिक गुरु हरिचंद ठाकुर के जन्म स्थान गोपालगंज स्थित ओरकांडी मंदिर में पूजा अर्चना के बाद उनको संबोधित किया तो उसका संदेश इस पार आना ही है। आखिर मतुआ महासंघ बांग्लादेश से ज्यादा पश्चिम बंगाल में सक्रिय है। बांग्लादेश मतुआ महाआयोग के अध्यक्ष पद्मनाभ ठाकुर हों या हरिचंद ठाकुर के वंश के सदस्य सुब्रतो ठाकुर उनका प्रभाव पश्चिम बंगाल के मतुआ समुदाय पर निसंदेह है। सुब्रतो ठाकुर बांग्लादेश में काशियानी उपज़िला परिषद के अध्यक्ष हैं।

मतुआ नामशूद्र समुदाय का प बंगाल की सात लोकसभा सीटों और 60-70 विधानसभा सीटों पर प्रभाव है। मोदी ने अपने संबोधन में जिस बोडो मां यानी वीणापानी देवी से मुलाकात की चर्चा की उनके जीवनकाल में मतुआ समुदाय की राजनीति उनके संकेत से संचालित होती थी। स्वयं ममता बनर्जी ने भी मतुआ समुदाय को साधने की कोशिश की। बोडो मां के सबसे बड़े बेटे कपिल कृष्ण ठाकुर को बनगांव लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया और वे जीतकर 2014 में सांसद बने।

अक्तूबर, 2014 में जब उनकी मृत्यु हो गई तो उनकी पत्नी ममता ठाकुर को चुनाव मैदान में उतारा और वह भी सांसद बनी। जो शांतनु ठाकुर ओरकांडी मंदिर में मोदी के साथ थे वे अभी बनगांव से भाजपा के सांसद हैं। उन्होंने ही अपनी चाची ममता ठाकुर को हराया। भाजपा ने उनके के छोटे भाई सुब्रत ठाकुर को गाईधाट विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया है।

संभव है मोदी ने ओरकांडी ठाकुरबारी से बंगाल चुनाव को भी साधने की कोशिश की हो। यह नहीं भूलिए की विभाजन के बाद उस पार रह गए मतुआ लोगों के बीच कोई भारतीय प्रधानमंत्री नहीं गया था। मूल प्रश्न यह है कि क्या प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी का वहां जाना, जेशोरेश्वरी मंदिर में पूजा करना कूटनीति की दृष्टि से सही कदम नहीं था? बिल्कुल था। कूटनीति का अर्थ केवल आर्थिक, सामरिक राजनीतिक द्विपक्षीय अंतर्संबंध नहीं है। सभ्यता- संस्कृति, अध्यात्म, नस्ल आदि इसके ज्यादा सबल पक्ष हैं।

दक्षिण एशिया, पूर्वी एशिया आदि में भारतीय कूटनीति तभी सफल होगी जब भारत के नेता संस्कृति- सभ्यता, धर्म और अध्यात्म के तंतुओं को जोड़ने की प्रबल कोशिश करेंगे। मोदी ने अब तक इस भूमिका को प्रखरता से निभाया है। वैसे भी बांग्लादेश हो या पाकिस्तान अगर वहां हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन हैं, इनके उपासना स्थान वहां है, हमारे देव स्थानों के कुछ मुख्य केंद्र वहां सदियों पुराने हैं तो उन सबका ध्यान भारत के अलावा और कौन रख सकता है?

भारत और नेपाल के बाद हिंदुओं की सबसे ज्यादा आबादी आज भी बांग्लादेश में है। मोटा- मोटी आकलन है कि एक करोड़ 70 लाख हिंदू वहां हैं। बांग्लादेश के निष्ठावान नागरिक होते हुए भी वे लोग हमेशा अपने ऊपर भारत से अपनत्व वाले हाथ तथा संकट में साथ की उम्मीद करते हैं। मोदी जब जून 2015 में बांग्लादेश की पहली यात्रा पर गए थे तब भी उन्होंने ढाकेश्वरी मंदिर और रामकृष्ण मठ की यात्रा की थी और उसका गहरा प्रभाव हुआ।

इस समय भी उनकी यात्रा का तात्कालिक परिणाम यह हुआ कि बांग्लादेश सरकार ने जेशोरेश्वरी तक जाने की सड़कें बेहतर कर दी, वहां गेस्ट हाउस रेस्ट हाउस बने, मंदिर और आसपास के भवनों का जीर्णोंद्धार हुआ। ऐसा ओरकांडी ठाकुर बारी में भी देखा गया। हरिचंद ठाकुर की जयंती पर हर साल बारोनी श्नान उत्सव मनाया जाता है, जिसमें भाग लेने के लिए भारत से भारी संख्या में लोग जाते हैं। इस यात्रा को आसान बनाने की मांग बरसों से थी और मोदी ने इसे पूरा करने का वायदा किया। प्रधानमंत्री ने वहां एक प्राइमरी स्कूल तथा लड़कियों के मिडिल स्कूल को अपग्रेड करने के साथ कई घोषणाएं की जिनका असर वहां की सरकार और प्रशासन पर भी हुआ होगा।

आने वाले समय में बांग्लादेश सरकार की ओर से वहां के संपूर्ण हिंदू समुदाय, मंदिरों, मतुआ समुदाय आदि के लिए कई कार्य किए जाएंगे। यह भी न भूलें कि गोपालगंज जिले के ही तुंगीपाड़ा में बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान की समाधि है। मोदी वहां जाने और श्रद्धा सुमन अर्पित करने वाले किसी विदेशी सरकार के पहले मुखिया बने हैं। क्या इसे भी चुनाव से जोड़कर देखा जा सकता है?

राजनीतिक नजरिए से हम मोदी के इन कार्यक्रमों को चाहे चुनाव की चासनी में डाल दें या फिर एक हिंदू हृदय सम्राट बनने की आकांक्षा का प्रतीक मान लें, भविष्य के भारत की दृष्टि से इन कदमों के बेहतर परिणाम होंगे। वैसे भी मोदी की यात्रा के दौरान द्विपक्षीय सहयोग के विभिन्न क्षेत्रों में पांच सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर हुए। प्रधानमंत्री ने अपने ट्वीट में ही स्पष्ट किया कि भारत और बांग्लादेश ने आपदा प्रबंधन, खेल एवं युवा मामलों, व्यापार और तकनीक जैसे क्षेत्रों में सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर किए हैं। विदेश सचिव हर्षवर्धन सिंहला ने कहा कि दोनों नेताओं के बीच तीस्ता मुद्दे पर चर्चा हुई। प्रधानमंत्री ने शेख हसीना को कहा कि भारत तीस्ता जल बंटवारे संबंधी समझौते को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है और इसके लिए जो भी हित धारक हैं उन सबसे परामर्श किया जा रहा है।

भारत ने फेनी नदी के जल बंटवारे के लिए मसौदे को जल्द अंतिम रूप देने का अनुरोध भी किया। दोनों प्रधानमंत्रियों ने वर्चुअल ही कई परियोजनाओं का संयुक्त रूप से उद्घाटन किया। इनमें भारत-बांग्लादेश सीमा पर तीन नई सीमायी हाटें और ढाका न्यू जलपाईगुड़ी के बीच नई यात्री रेल मिताली एक्सप्रेस शामिल है। इसका महत्व इस मायने में है कि भारत ने बंगबंधु की जन्मशती और बांग्लादेश मुक्ति संग्राम की स्वर्ण जयंती के मौके पर शुरू करने की घोषणा की।

वास्तव में मोदी की बांग्लादेश यात्रा में जनता से सरकार तक संबंधों को सुदृढ़ करने तथा दूरगामी परिणामों वाला बनाने के कारक सम्मिलित थे। बांग्लादेश की जनता को भावनात्मक तौर पर जोड़ने के लिए प्रधानमंत्री के वहां जाने के पूर्व शेख मुजीबुरर्हमान को गांधी शांति पुरस्कार-2020 प्रदान करने की घोषणा हो गई थी। मोदी ने जब अपने हाथों से शेख हसीना को यह पुरस्कार सौंपा तो वहां उपस्थित लोग भाव विह्वल नजर आ रहे थे।

इसी तरह कोविड-19 टीका का 12 लाख खुराक तथा भारत की ओर से 109 एंबुलेंसों की चाबी सौंप कर मोदी ने बांग्लादेश के लोगों को संदेश दिया कि उनका संबंध दिलों तक फैला है। तो मोदी की इस यात्रा को भारतीय विदेश नीति के एक व्यापक प्रभावी कार्यक्रमों के रूप में देखा जाना चाहिए। अगर बांग्लादेश की स्वतंत्रता घोषित करने की स्वर्ण जयंती है और उसमें भारत के प्रधानमंत्री मुख्य अतिथि के रुप में आमंत्रित किए गए तो उन्हें जाना ही चाहिए था। भारत में चुनाव है इसका ध्यान रखते हुए बांग्लादेश ने आयोजन तो किया नहीं। चूंकि चुनाव है इसलिए प्रधानमंत्री वहां जाएं ही नहीं इससे बड़ी आत्मघाती सोच कुछ हो ही नहीं सकती।

मोदी ने अपने भाषण में भारत और बांग्लादेश को मिलकर विश्व में जिस निर्णायक और प्रभावी भूमिका की बात की वह लंबी वैश्विक साझेदारी की सोच है। मोदी को भी पता है कि बांग्लादेश में मजहबी कट्टरपंथियों तथा जिहादी आतंकवादियों की एक बड़ी फौज विकसित हो गई है। ये समस्या अकेले बांग्लादेश की नहीं हमारी भी है और हमें मिलकर ही इनका समाधान करना होगा। बांग्लादेश भी उभरती हुई आर्थिक शक्ति है। उसकी आजादी में मुख्य भूमिका के कारण आज भी एक बड़ी आबादी का भारत के प्रति भावनात्मक रिश्ता है। उसे लगातार मजबूत करते रहने की आवश्यकता है।

चीन की बांग्लादेश में आर्थिक और रक्षा संबंधी गतिविधियां हमारे लिए चिंता और चुनौतियां हैं, लेकिन केवल उन पर फोकस करने वाली कूटनीति से हम सामना नहीं कर सकते। राजनीतिक-आर्थिक-सामरिक के साथ-साथ सभ्यता- संस्कृति, नस्लीय एकता का संदेश देने वाले पहलुओं पर पूरा फोकस करते हुए ही हमारा संबंध ज्यादा विश्वास के साथ सुदृढ़ हो सकता है। मोदी ने बांग्लादेश की यात्रा से इन्ही लक्ष्य को पाने की कोशिश की है।

(इस आलेख में व्‍यक्‍त विचार लेखक की नि‍जी राय और अनुभूति है, इसका वेबदुनिया डॉट कॉम से कोई संबंध नहीं है।)



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