मैगी की विदाई... रास न आई
प्रीति सोनी
मैगी को लेकर उठा विवाद किसी प्रकार से थम नहीं रहा, लेकिन बच्चों को भी ये कुछ जम नहीं रहा। जी हां, मैगी में स्वीकार्य मात्रा से अधिक पाए गए सीसे और मोनोसोडियम ग्लूटामेट को लेकर भले ही देशभर में मैगी के खिलाफ जंग छिड़ी हो, भले ही 'टू मिनट मैगी' लाख नुकसान पहुंचा रही हो, लेकिन सालों से इसे अपने मनपसंद स्नैक्स के रूप में देखने वाले बच्चे और स्कूल से कॉलेज तक के स्टूडेंट्स इस बात से जरा भी खुश नहीं हैं।
हों भी क्यों... आखिर बचपन से एक प्यारभरा नाता जो जुड़ा है मैगी से। ये बात बिलकुल ठीक बैठती है कि मैगी में पाए जाने वाले पदार्थ बच्चों में इसकी लत लगा देने में सक्षम हैं और ऐसा है भी। तभी तो बच्चों में मैगी के प्रति जो दीवानगी है, वह जगजाहिर है।
बचपन के नखरों से लेकर हॉस्टल के गलियारों तक, खाना पसंद न आने पर भूख हमेशा मैगी ने ही मिटाई है। जिन्हें कुकिंग नहीं आती उन्हें भी मैगी ने अलग-अलग प्रयोग कर नए स्वाद को ईजाद करने में काफी मदद भी की।आधी रात को भी भूख लगने पर सिर्फ पानी डालकर पकाई जाने वाली स्वादिष्ट मैगी एकमात्र ऐसी डिश थी, जो तुरंत बनकर तैयार भी होती और इसे पसंद करने वालों की भूख और स्वाद दोनों को ही तृप्त भी करती।
शहरी इलाकों में जब भी घरों में राशन का सामान आता तो 70 फीसदी घरों में मैगी के पैकेट उसमें जरूर शामिल होते हैं। समय के साथ-साथ प्रतिस्पर्धी कंपनियों ने बाजार में नूडल्स की अन्य वैराइटीज जरूर परोसी, लेकिन मैगी के प्रति लोगों की दीवानगी कम नहीं हुई और सालों बाद भी उसी तरह बरकरार है बल्कि लोगों ने इसे अलग-अलग तरीकों से पकाकर परोसा जिसके भरोसे शहरों के रेस्तरां भी खूब चल पड़े।
और तो और, गुमटी के ठेले या किसी छोटी-मोटी दुकान पर मिलने वाला समोसा या सैंडविच भी इससे अछूता नहीं रहा। आलू, टमाटर या प्याज के अलावा मैगी समोसा और मैगी सैंडविच मार्केट में अच्छी- खासी टीआरपी बटोरने लगा।
कॉलेज या कार्यालयों के कैंटीन तो आज भी मैगी के ही भरोसे अपनी सबसे ज्यादा कमाई करते हैं। महिलाएं भी बच्चों की पसंद के अनुसार कुछ अच्छा बनाने के चक्कर में टाइम बरबाद नहीं करतीं, क्योंकि मैगी ने उनका काम सबसे आसान जो कर दिया। बच्चा भले ही मां के हाथ के पकवान खाने में नखरे कर ले, लेकिन मैगी से इंकार नहीं करेगा, यह बात हर मां जानती है इसीलिए उनके बनाए पकवानों की रेसिपी भी अब मैगी से ही होकर गुजरती है।
और ऐसा भी नहीं है कि मैगी का संबंध केवल बच्चों या युवाओं से ही रहा है। इतने सालों से समाज में अपनी जगह स्थापित कर चुकी मैगी अब तक 'बचपन से पचपन' तक का सफर तय चुकी है और अब पालक भी इसे खासा पसंद करते हैं।
अब बताइए... सालों से देशभर व 70 फीसदी शहरी समाज में... और लोगों के घरों में जुबान के रास्ते से होते हुए दिलों में जगह बना चुकी मैगी जांच में कितनी भी हानिकारक साबित हुई हो, लेकिन है तो अपनी-सी, भावनाओं से जुड़ी हुई इसीलिए मैगी की बाजार से विदाई लोगों को दिमाग से सही लेकिन दिल से तो रास नहीं आ रही।