उत्तरप्रदेश को चाहिए अर्जुन की आंख

के वर्तमान राजनीतिक परिवेश एवं विभिन्न राजनीतिक दलों की स्थितियों को देखते हुए बड़ा दुखद अहसास होता है कि किसी भी राजनीतिक दल में कोई अर्जुन नजर नहीं आ रहा, जो मछली की आंख पर निशाना लगा सके। कोई युधिष्ठिर नहीं, जो धर्म का पालन करने वाला हो। ऐसा कोई नेता नजर नहीं आ रहा, जो स्वयं को संस्कारों में ढाल मजदूरों की तरह श्रम करने का प्रण ले सके।

प्रदेश की राजनीतिक चकाचौंध ने आज सभी को धृतराष्ट्र बना दिया। मूल्यों की आंखों पर पट्टी बांध ये सब एक ऐसी राजनीतिक छांव तले अपनी महत्वाकांक्षा एवं निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए जीवन की भाग्यरेखा तलाशते रहे हैं और उसी की पुनरावृत्ति के लिए प्रयास शुरू हो गए हैं। सभी राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव है और परिवारवाद तथा व्यक्तिवाद छाया पड़ा है।

नए-नए नेतृत्व उभर रहे हैं लेकिन सभी ने देश-सेवा के स्थान पर स्व-सेवा में ही एक सुख मान रखा है। आधुनिक युग में नैतिकता जितनी जरूरी मूल्य हो गई है उसके चरितार्थ होने की संभावनाओं को उतना ही कठिन कर दिया गया है।
ऐसा लगता है मानो ऐसे तत्व पूरी तरह छा गए हैं जो 'खाओ, पीओ, मौज करो' के सिद्धांत को ही लागू करने के लिए जद्दोजहद करते दिखाई दे रहे हैं। सब कुछ हमारा है। हम ही सभी चीजों के मापदंड हैं। हमें लूटपाट करने का पूरा अधिकार है। हम समाज में, राष्ट्र में, संतुलन व संयम नहीं रहने देंगे। यही आधुनिक सभ्यता का घोषणा पत्र है जिस पर लगता है कि हम सभी ने हस्ताक्षर किए हैं।

एक बार पुन: ऐसे ही घोषणा पत्र को लागू करने के लिए महासंग्राम छिड़ रहा है, भला इन स्थितियों के बीच वास्तविक जीत कैसे हासिल हो? आखिर जीत तो हमेशा सत्य की ही होती है और सत्य इन तथाकथित राजनीतिक दलों के पास नहीं है।
महाभारत युद्ध में भी तो ऐसा ही परिदृश्य था। कौरवों की तरफ से सेनापति की बागडोर आचार्य द्रोण ने संभाल ली थी।

एक दिन शाम के समय दुर्योधन आचार्य द्रोण पर बड़े क्रोधित होकर बोले- 'गुरुवर कहां गया आपका शौर्य और तेज? अर्जुन तो हमें लगता है समूल नाश कर देगा। आप के तीरों में जंग क्यों लग गई। बात क्या है?’

इस पर आचार्य द्रोण ने कहा, ‘‘दुर्योधन मेरी बात ध्यान से सुन। हमारा जीवन इधर ऐश्वर्य में गुजरा है। मैंने गुरुकुल के चलते स्वयं ‘गुरु’ की मर्यादा का हनन किया है। हम सब राग-रंग में व्यस्त रहे हैं। सुविधाभोगी हो गए हैं, पर अर्जुन के साथ वह बात नहीं। उसे लाक्षागृह में जलना पड़ा है, उसकी आंखों के सामने द्रौपदी को नग्न करने का दु:साहस किया गया है, उसे दर-दर भटकना पड़ा है, उसके बेटे को सारे महारथियों ने घेरकर मार डाला है, विराट नगर में उसे नपुंसकों की तरह दिन गुजारने को मजबूर होना पड़ा। अत: उसके बाणों में तेज होगा कि तुम्हारे बाणों में?' यह निर्णय तुम स्वयं कर लो। दुर्योधन वापस चला गया।
लगभग यही स्थिति आज के राजनीतिक दलों के सम्मुख खड़ी है। किसी भी राजनीतिक दल के पास आदर्श चेहरा नहीं है, कोई पवित्र एजेंडा नहीं है, किसी के पास बांटने को रोशनी के टुकड़े नहीं हैं, जो नया आलोक दे सकें।

आज भी मतदाता विवेक से कम, सहज वृत्ति से ज्यादा परिचालित हो रहा है। इसका अभिप्राय यह है कि मतदाता को लोकतंत्र का प्रशिक्षण बिलकुल नहीं हुआ। सबसे बड़ी जरूरत है कि मतदाता जागे, उसे लोकतंत्र का प्रशिक्षण मिले।
हमें किसी पार्टी विशेष का विकल्प नहीं खोजना है। किसी व्यक्ति विशेष का विकल्प नहीं खोजना है। विकल्प तो खोजना है भ्रष्टाचार का, अकुशलता का, प्रदूषण का, भीड़तंत्र का, गरीबी के सन्नाटे का, महंगाई का, राजनीतिक अपराधों का। यह सब लंबे समय तक त्याग, परिश्रम और संघर्ष से ही संभव है।

मुझे आचार्यश्री तुलसी के नेतृत्व में अणुव्रत आंदोलन के बैनर तले 2 दशक पूर्व आयोजित किए गए चुनाव शुद्धि अभियान का स्मरण हो रहा है जिसका हार्द था कि स्वस्थ लोकतंत्र का सही विकल्प यही है कि हम ईमानदार, चरित्रवान और जाति-संप्रदाय से मुक्त व्यक्ति को उम्मीदवार के रूप में मौका दें। सही चयन से ही राष्ट्र का सही निर्माण होगा। आने वाले चुनाव में ऐसा करके ही हम उत्तरप्रदेश को यदि उत्तम प्रदेश बना सकेंगे।
धृतराष्ट्र की आंखों में झांककर देखने का प्रयास करेंगे तो वहां शून्य के सिवा कुछ भी नजर नहीं आएगा। इसलिए हे राजनीतिक दलों! जागो! ऐसी रोशनी का अवतरण करो, जो दुर्योधनों के दुष्टों को नंगा करे और अर्जुन के नेक इरादों से जन-जन को प्रेरित करें।





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