अपराजिता : 'ललमुनिया' के लिए लौट आओ 'अलबेली...


वह शब्दों में रंग भरती थीं, रंगों में संगीत रचती थीं, वह अलबेली थीं, पर नहीं अकेली थीं...उसके साथ उसके पास एक ललमुनिया थी....नाजुक नन्ही चिरैया थी....

वह जो करती थीं कोई और भी कर सकता था....लेकिन जिस मोहक और दिलकश अंदाज़ में वह करती थीं वह शर्तिया कोई नहीं कर सकता है... सोशल मीडिया पर दुख पसरा है, 'ललमुनिया' झरझर रो रही है.... पर वह स्मित मुस्कान वाली सुंदर सी अलबेली कहीं नहीं है...

अपराजिता...स्त्री मन को इतने मनभावन और मासूम अंदाज़ में उकेरने वाली अपराजिता शर्मा नहीं रहीं....सोशल मीडिया पर उनकी कला और अभिव्यक्ति के अनूठे अंदाज़ ने ऐसे परचम लहराएं कि हर स्त्री का मन अलबेली होने लगा और हर चिरैया ललमुनिया लगने लगी....अपनी रचनात्मकता को बताने ,कहने और पूरी सजधज के साथ रखने का अंदाज़ कुछ ऐसा कि तेवर तीखे भी हो तो मन रीझ जाए....उनके रेखाचित्रों पर जीभर लाड़ ही उमड़ आए....

अपराजिता... सच में नाम के अनुरूप अपराजिता ही थीं...परिचय एक हो तो देना शुरू करें हर किसी के पास उनकी अपनी एक पहचान की छाप है....जो मिला नहीं कभी वह भी भर त्योहार रोने रोने को हो गया और जो उनके मित्र, प्रशंसक साथ वाले हैं वे तो भरोसा नहीं कर पाने से जड़ से हो गये हैं...कैसे स्वीकारें कि अब अपराजिता अपनी अलबेली और ललमुनिया को इस दारुण खबर के साथ अस्त व्यस्त कर गई हैं....

दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस में हिंदी की इस प्रोफेसर ने अल्पायु में ही अपने इलस्ट्रेशन और उनकी अलहदा सजधज, देसी ठेठपन से जो मुकाम हासिल किया वह निश्चित रूप से वंदनीय है...

चेहरे पर भर मुस्कान लाने वाली अपराजिता एंडोमीट्रीयोसिस जैसी दर्दनाक बीमारी को पराजित कर रही थीं.... खिलखिल हंसने वाले किरदारों के माध्यम से तीखे मीठे व्यंग्यबाण चलाने वाली अपने जीवन में सहज सौम्य थीं....

अभी तो अलबेली के कितने कितने दिन आने वाले थे,कितने कितने गीत के मुखड़े तुमसे, तुम्हारी आश्चर्यजनक कल्पनाशीलता से सजने वाले थे....कितने 'हिमोजी' तुम्हारी नाजुक अंगुलियों से रचकर गुदगुदाने को आतुर थे....तुम्हारी प्रस्तुति से हर कोई हतप्रभ रह जाता था कैसे क्या क्या कर लेती है ये लड़की.....और आज ये क्या कर गई अपने रंग,ब्रश,तकनीक, चुटीली चटखारेदार चुटकी सबको समेट लिया....एकदम अचानक.....बस 40 की उम्र में???? कितने चौंकाने वाले चमत्कार अभी अवतरित होने थे लाड़ो....

ललमुनिया' के लिए लौट आओ 'अलबेली....सुनो ओ मेरी कच्ची पक्की सहेली...सुनो तो....





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