सम्बंधित जानकारी
- हिंदू और मुसलमानों के पुरखे एक ही : मोहन भागवत
- जावेद अख्तर के बयान को विहिप ने बताया 'साजिश', कड़ी कार्रवाई की मांग
- क्या है जावेद अख्तर का आरएसएस को लेकर बयान, जिस पर मचा है बवाल
- आरएसएस की तुलना तालिबान से करने पर शिवसेना ने दिया जावेद अख्तर को जवाब
- RSS पर टिप्पणी को लेकर विवाद, जावेद अख्तर के घर पर बढ़ाई गई security
इंफोसिस की निंदा के बाद पाञ्चजन्य से ही खुद को दूर किया आरएसएस ने
पहले 'पाञ्चजन्य' ने इंफोसिस को 'देश विरोधी' ताकतों का जरिया बताया और अब आरएसएस ने खुद को पत्रिका से ही दूर कर लिया है। दीनदयाल उपाध्याय को प्रेरणा स्त्रोत माने वाली पत्रिका से क्या संघ को अलग किया जा सकता है?
'पाञ्चजन्य' के अगस्त 2021 के अंक में छपे एक लेख में सरकारी वेबसाइटों को ठीक से ना चला पाने के लिए भारत की दूसरी सबसे बड़ी आईटी कंपनी इंफोसिस को देश विरोधी ताकतों का जरिया बता दिया गया।
पत्रकार चंद्र प्रकाश द्वारा लिखे गए इस लेख में कहा गया, "कहीं ऐसा तो नहीं कि कोई देशविरोधी शक्ति इंफोसिस के माध्यम से भारत के आर्थिक हितों को चोट पहुंचाने में जुटी है?" लेखक ने यह भी कहा की उनके "पास यह कहने के कोई पुख्ता साक्ष्य नहीं हैं, किंतु कंपनी के इतिहास और परिस्थितियों को देखते हुए इस आरोप में कुछ तथ्य दिखाई दे रहे हैं।"
इंफोसिस पर आरोप
कंपनी की जिन गतिविधियों पर लेखक ने संदेह व्यक्त किया उनमें 'द वायर', 'आल्ट न्यूज' और 'स्क्रॉल' जैसी वेबसाइटों को पैसे देना शामिल है। कंपनी के मालिकों को कांग्रेसी और 'वर्तमान सत्ताधारी विचारधारा' का विरोधी बताया गया है।
साथ ही यह आरोप भी लगाया गया है कि कंपनी "अपने महत्वपूर्ण पदों पर विशेष रूप से एक विचारधारा विशेष के लोगों को बिठाती है", जिनमें "अधिकांश बंगाल के मार्क्सवादी हैं।"
दो आरोप और लगाए गए हैं। पहला यह कि इंफोसिस "अराजकता' पैदा करना चाहती है, "ताकि सरकारी ठेके स्वदेशी कंपनियों को ही देने की नीति बदलनी पड़े।" दूसरा, कंपनी भारतीय करदाताओं का डाटा चोरी करना चाहती है।
'पाञ्चजन्य' को हमेशा से आरएसएस के मुखपत्र के रूप में जाना जाता रहा है, इसलिए इस लेख को इंफोसिस पर संघ के ही हमले की तरह देखा गया। कंपनी के बचाव में जिन लोगों ने खुल कर बयान दिए उनमें कंपनी के पूर्व निदेशक मोहनदास पाई भी शामिल हैं।
आरएसएस और पाञ्चजन्य
एनडीए सरकार के मुखर समर्थकों के रूप में जाने जाने वाले पाई ने ट्विट्टर पर इस लेख के लेखक को "पागल" बताया और उनकी सोच को "कॉन्सपिरेसी थियरी" बताया।
भारतीय कंपनी के नाते इंफोसिस का भारत की उन्नति में महत्वपूर्ण योगदान है।इंफोसिस संचालित पोर्टल को लेकर कुछ मुद्दे हो सकते हैं परंतु पान्चजन्य में इस संदर्भ में प्रकाशित लेख,लेखक के अपने व्यक्तिगत विचार हैं,तथा पांचजन्य संघ का मुखपत्र नहीं है।@editorvskbharat
— Sunil Ambekar (@SunilAmbekarM) September 5, 2021
जब विवाद काफी बढ़ गया तो संघ ने एक बयान जारी कर खुद को पाञ्चजन्य से ही दूर कर लिया। आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने ट्वीट कर इंफोसिस की प्रशंसा भी की और कहा कि कंपनी ने देश की प्रगति में एक बुनियादी भूमिका अदा की है।
हालांकि पत्रिका के सम्पादक हितेश शंकर ने लेख का समर्थन किया और पत्रिका के संघ से संबंध के बारे में बस इतना कहा कि यह लेख इंफोसिस के बारे में है, ना की संघ के बारे में।
There is a lot of hue and cry over the cover story of the 5th September issue of Panchjanya. Everyone should read this cover story. https://t.co/gsDI52GN15
— Hitesh Shankar (@hiteshshankar) September 5, 2021
Three things are worth noting in this context”. #Infosys @epanchjanya pic.twitter.com/Y86pxdFQD2
पाञ्चजन्य और अंग्रेजी पत्रिका 'ऑर्गनाइजर' को नई दिल्ली स्थित कंपनी भारत प्रकाशन छापती है, जिसे आरएसएस की ही प्रकाशन संस्था माना जाता है। पाञ्चजन्य के पहले संपादक पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे। पत्रिका आरएसएस विचारक दीनदयाल उपाध्याय को अपना प्रेरणा स्त्रोत मानती है।
अगला लेख
