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बांदकपुर का मेला

मेला
दादाजी के संग गए थे,
बांदकपुर के मेले में।
भीड़ अधिक होने के कारण,
हम फंस गए झमेले में।

कई दिनों से सोचा था ये,
मैं मेले में जाऊंगा।
मुन्नू-चुन्नू और कलू को,
अपने संग ले जाऊंगा।

दादाजी को बहुत मनाया,
मुश्किल से तैयार हुए।
मुन्नू-चुन्नू, कलू और मैं,
मिल कर पूरे चार हुए।

बस स्टैंड गए तो देखा,
बहुत भीड़ थी मेले की।
धक्का-मुक्की लोग कर रहे,
अकल नहीं है धेले की।

जगह जरा-सी नहीं बसों मैं,
लोग ठसाठस भरे हुए।
खड़े हुए थे बच्चे बूढ़े,
सहमें-सहमें डरे हुए।


दादाजी बोले तब हमसे,
नहीं हमें अब घर जाना।
भोले बाबा के मेले में,
किसी तरह भी है जाना।

इस कारण से हम सब के सब,
बैठ गए एक ठेले में।
दादाजी के संग गए थे,
बांदकपुर के मेले में।

मेला क्या था यूं लगता था,
जैसे मच्छर भिनक रहे।
जहां देखिए वहां आदमी,
एक-दूजे से चिपक रहे।

मंदिर के बाहर देखा तो,
कई झुंड के झुंड खड़े।
बम-बम भोले बोल-बोल कर,
दरवाजे पर अड़े-पड़े।

मंदिर के भीतर जाना ही
हमको तो दुश्वार लगा।
शायद ही हम जा पाएंगे,
हम सबको बस यही लगा।


दादाजी अब हमें पकड़कर,
एक तरफ को ले आए।
चूर-चूर हो थके हुए थे,
हम सब थोड़ा सुस्ताए।

इधर-उधर हम रहे घूमते,
कुछ भी समझ नहीं आया।
भीतर जाने का उपाय क्या?
कोई सुझा नहीं पाया।

किंतु अचानक दादाजी के,
मन मंदिर में बल्ब जला।
मंदिर के भीतर जाने का,
चटपट एक उपाय मिला।

एक पुजारी से दादा ने,
की कुछ बात अकेले में।
दादाजी के संग गए थे,
बांदकपुर के मेले में।

पीछे के दरवाजे से हम,
मंदिर के भीतर आए।
वहां पुजारी ने हम सबको,
शिव के दर्शन करवाए।


तुरंत बाद मां पार्वती का,
मंदिर हम सबने देखा।
चेहरा जिनका दमक रहा था,
माथे पर सुंदर टीका।

यहीं बगल के मंदिर थे,
बैठे राम-लखन भाई।
और बीच में शोभित थीं मां,
करुणामय‌ सीता माई।

राधा कृष्ण,विष्णु लक्ष्मी के,
मंदिर में भी हम आए।
बड़ी भीड़ थी जगह-जगह पर,
मुश्किल से दर्शन पाए।

नदी नर्मदा माता की भी,
भोली-सी मूरत देखी।
पत्थर-पत्थर में था ईश्वर,
नहीं कर सके अनदेखी।

और अंत में भैरवजी के,
दर्शन करने हम आए।
जहां देखिए वहीं-वहीं पर,
ढेरों झुंड खड़े पाए।


बम-बम भोले गूंज रहा था,
हर पत्थर के ढेले में।
दादाजी के संग गए थे,
बांदकपुर के मेले में।

शंकरजी के गीत गा रही,
थीं महिलाएं मस्ती में,
बम भोला की धूम मची थी,
इस बांदकपुर बस्ती में।

हर-हर महादेव के नारे,
भक्त लगाते जाते थे।
अपने परिजन मित्रों के संग,
आगे बढ़ते जाते थे।

एक जगह पर हमने देखा,
मुंडन का स्थान बना।
उसके ऊपर छाया करने,
पक्का सुंदर छत्र तना।

मंदिर के पीछे महिलाएं,
हाथ लगाती हल्दी के।
मनोकामना पूरी करतीं,
पार्वती मां जल्दी से।


एक सभा मंडप था होते,
जहां रीति-नीति से ब्याह।
जिसको छोड़ दिया दुनिया ने,
शिव जी देते उसे पनाह।

एक जगह पर कथा कराते,
ध्यान मग्न हो लोग मिले।
पोथी पत्रा दान दक्षिणा,
पंडितजी के भाग्य खुले।

पंडितजी का ध्यान लगा था,
लड्डू पेड़े केले में।
दादाजी के संग गए थे,
बांदकपुर के मेले में।

मंदिर से बाहर आकर हम,
सब मेले की ओर गए,
एक जगह जादू के करतब,
सबने देखे नए नए।

एक जगह बंदूकें लेकर
कुछ निशान हमनें साधे।
और निशाने साध-साध कर
फोड़ दिए फुग्गे आधे।


कुंआ मौत का हमने देखा,
कार चली दीवारों पर,
कई लोग ऐसे भी देखे,
जो चलते अंगारों पर।

एक बड़े होटल में हमको,
दादाजी लेकर आए।
बड़े मजे से हम पांचों ने,
छक कर रसगुल्ले खाए।

झूलों के मेले में देखीं,
हमनें नई-नई किस्में।
बोला मैंने दादाजी से,
हम झूलेंगे सब इसमें।

ऐसा कहते-कहते हम सब,
बैठ गए एक झूले में।
दादाजी के संग गए थे,
बांदकपुर के मेले में।

मजा आ गया था मेले में,
खुशी मिली बम भोले में।
दादाजी के संग गए थे,
बांदकपुर के मेले में।

(समाप्त)
लेखक के बारे में
प्रभुदयाल श्रीवास्तव
12, शिवम सुंदरम नगर, छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश (Mo.-+919131442512).... और पढ़ें