janmashtami par nibandh in hindi: जन्माष्टमी का पावन पर्व पूरे भारत में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रेम, भक्ति, और कर्म के अद्भुत समन्वय का उत्सव है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आधी रात में मथुरा के कारावास में जन्मे कृष्ण, केवल एक बालक नहीं, बल्कि स्वयं भगवान विष्णु के आठवें और पूर्ण अवतार थे। वे वासुदेव और देवकी के आठवें पुत्र थे। उनका जन्म धरती पर बढ़ रहे अधर्म और अन्याय का नाश करने के लिए हुआ था। उस समय मथुरा का राजा कंस, अपनी क्रूरता से प्रजा को आतंकित कर रहा था। भगवान विष्णु ने अपनी माया से कृष्ण के रूप में अवतार लिया ताकि धर्म की पुनः स्थापना हो सके।
बाल्यकाल से कर्मयोग तक का सफर
कृष्ण का बाल्यकाल चमत्कारों और लीलाओं से भरा था। नंदबाबा और यशोदा मैया के लाडले कन्हैया ने बचपन में ही कई राक्षसों का वध किया। पूतना जैसी राक्षसी को दूध पीते-पीते ही मार डाला, कालिया नाग के विषैले फन पर नृत्य करके यमुना नदी को शुद्ध किया और गोकुल वासियों की रक्षा के लिए अपनी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया। ये सभी लीलाएं न केवल मनमोहक थीं, बल्कि इनके गहरे अर्थ थे। उन्होंने समाज को यह सिखाया कि बुराई चाहे कितनी भी ताकतवर क्यों न हो, अच्छाई के आगे नहीं टिक सकती।
संसार को दिया प्रेम का संदेश
राधा-कृष्ण का प्रेम तो संसार को यह संदेश देता है कि प्रेम एक पवित्र और निस्वार्थ भावना है, जो किसी भी भौतिक बंधन से परे है। पूरा बृज मंडल राधा और कृष्ण के प्रेम का साक्षी रहा। यही वह धरती है जिसने उनके पवित्र प्रेम को साक्षात देखा और महारास का दिव्य अनुभव भी यहीं घटा। महारास कोई भौतिक आनद नहीं बल्कि प्रेम के माध्यम से आत्मा का परमात्मा से मिलन दर्शाता है, यही परमानन्द है।
शिक्षा और ज्ञान का मार्ग
बचपन की लीलाओं के बाद, कृष्ण ने अपने बड़े भाई बलराम के साथ उज्जैन के संदीपनी आश्रम में जाकर शिक्षा ग्रहण की। यह दर्शाता है कि भगवान होकर भी उन्होंने ज्ञान प्राप्ति के महत्व को स्वीकार किया। उन्होंने 64 दिनों में 64 कलाओं की शिक्षा प्राप्त कर ली। यहीं उन्होंने कर्मयोग का अभ्यास किया, जिसमें बिना किसी फल की आशा के कर्म करने पर जोर दिया गया है। कृष्ण और उनके परम मित्र सुदामा की कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची मित्रता अमीरी-गरीबी का भेद नहीं मानती, बल्कि दिल से जुड़ी होती है। आगे उल्लेख मिलता है कि सुदामा की गरीबी देखकर भी कृष्ण ने उनका सम्मान किया और बिना कुछ कहे ही उनका जीवन सुख-समृद्धि से भर दिया।
कंस वध और मथुरा गमन
जब कृष्ण बड़े हुए, तो उन्होंने अपने मामा कंस के अत्याचारों का अंत करने का निश्चय किया। मथुरा जाकर उन्होंने कंस के सबसे ताकतवर पहलवानों को हराया और अंत में कंस का वध करके मथुरा की प्रजा को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई। इस घटना से यह स्पष्ट हुआ कि न्याय की हमेशा जीत होती है और अत्याचारियों का अंत निश्चित है। कंस का वध करने के बाद, कृष्ण ने अपने माता-पिता, देवकी और वसुदेव को कारागार से मुक्त कराया और अपने नाना उग्रसेन को मथुरा का राजा बनाकर न्याय और धर्म का शासन स्थापित किया।
महाभारत युद्ध में सारथी बन विश्व को दिया गीता का महाज्ञान
श्रीकृष्ण का सबसे बड़ा योगदान महाभारत के युद्ध में सामने आया। कुरुक्षेत्र के मैदान में जब अर्जुन अपने ही बंधु-बांधवों को सामने देखकर मोह में पड़ गए थे, तब कृष्ण उनके सारथी बनकर आए और उन्हें भगवद् गीता का महाज्ञान दिया। गीता में उन्होंने कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग का अद्भुत उपदेश दिया। उन्होंने अर्जुन को समझाया कि आत्मा अमर है और शरीर नश्वर है, इसलिए किसी के मरने का शोक नहीं करना चाहिए। उन्होंने कर्म करने का महत्व समझाते हुए कहा कि हमारा कर्तव्य केवल कर्म करना है, फल की चिंता नहीं। यह उपदेश केवल अर्जुन के लिए नहीं था, बल्कि पूरे विश्व के लिए एक महाज्ञान था। गीता का यह उपदेश आज भी हमें सही और गलत के बीच का भेद बताता है और जीवन की चुनौतियों का सामना करने की प्रेरणा देता है।
कृष्ण का जीवन हमें सिखाता है कि जीवन के हर पड़ाव पर – चाहे वह बचपन की चंचलता हो, युवावस्था का प्रेम हो, या युद्ध का मैदान – धर्म, न्याय और सच्चाई का साथ देना चाहिए। जन्माष्टमी का यह पर्व हमें कृष्ण के जीवन से प्रेरणा लेने और उनके दिखाए मार्ग पर चलने का संदेश देता है।