कोरोना काल में तबाही की आहट, Solar Minimum से भीषण ठंड, भूकंप और सूखे की आशंका

Last Updated: बुधवार, 20 मई 2020 (17:05 IST)
पृथ्वीवासियों के जीवन के लिए प्रकाश और गर्मी प्रदान करता है। दुनिया आज कोरोना वायरस से लड़ रही है। कोरोना वायरस की महामारी को रोकने के लिए दुनिया के कई देशों में चल रहा है। इस लॉकडाउन से ग्लोबल वॉर्मिंग के लिए जिम्मेदार गैसों का उत्सर्जन कम हुआ है।
सूर्य की एक अप्रत्याशित घटना ने अंतरिक्ष वैज्ञानिकों और खगोलशास्त्रियों की चिंताओं को बढ़ा दिया है। इसी बीच अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने सूर्य की सतह पर होने वाली घटनाओं में अप्रत्याशित रूप से कमी दर्ज की है, जो पृथ्वी के लिए एक खतरे का संकेत है। सूर्य का मैग्निेटिक फील्ड भी पहले से कमजोर हुआ है इसके कारण ही सूर्य के सतह पर कास्मिक रेज होती है और गर्म हवाएं चलती हैं। सूरज की सतह पर सोलर स्पॉट में वृद्धि देखी जा रही है।

शुरू हो गया है सोलर मिनिमम : सोलर मिनिमम (Solar Minimum)
शुरू हो गया है और यह काफी गहरा है। सूरज की सतह पर सन स्पॉट बनने बंद हो गए हैं और सूरज का मेग्नेटिक फील्ड कमजोर हुआ है। इस कारण से अतिरिक्त कॉस्मिक किरणों सोलर सिस्टम में आ रही है। अतिरिक्त कॉस्मिक किरणों के कारण एस्ट्रॉनॉट्स और पोलर एयर ट्रेवलर के स्वास्थ्य को खतरा पैदा हो सकता है।

सोलर मिनिमम का असर धरती पर भी देखने को मिल सकता है। वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि इससे धरती के मौसम पर गंभीर असर पड़ सकता है। सूरज की किरणों में कमी होने से कई तरह के परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं। सूर्य का मैग्निेटक फिल्ड कमजोर होने से नासा ने धरती पर भीषण ठंड, भूकंप और सूखे की आशंका जताई है।
इससे हिम युग की वापसी भी हो सकती है।

नासा के ग्लोबल क्लाइमेट चेंज ब्लॉग के अनुसार पिछली बार ऐसा 1650 और 1715 के बीच हुआ था, जिसे पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में लिटिल आइस एज के रूप में जाना जाता है। जब ज्वालामुखी एयरोसोल और कम सौर गतिविधि से ठंडा होने के कारण सतह के निचले तापमान का उत्पादन होता है। नासा ने अगस्त 2018 में पार्कर सोलर प्रोब लॉन्च किया था। इससे पहले कोई भी उपग्रह सूर्य के इतने नजदीक नहीं गया था।

ज्यादा प्रभावी होगा सोलर मिनिमम : वैज्ञानिकों ने कहा है कि इस बार सोलर मिनिमम पहले की अपेक्षा ज्यादा प्रभावकारी होगा। सोलर स्पॉट के बढने से सूरज की मैग्नेटिक फील्ड कमजोर पड़ जाएंगी जिससे कास्मिक किरणों में बढ़ोतरी होगी। ये कास्मिक रेज अंतरिक्ष में मौजूद एक्ट्रोनॉट्स के अलावा धरती के वायुमंडल के लिए भी खतरनाक होगी।

मच सकती है डाल्टन मिनिमम जैसी तबाही : नासा के वैज्ञानिकों ने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि इससे डाल्टन मिनिमम जैसी घटना फिर से हो सकती है। डाल्टन मिनिमम के कारण 1790 से 1830 के दौरान धरती पर भारी तबाही देखने को मिली थी। इस कारण भयंकर ठंड से यूरोप में कई नदियां जम गई थीं। किसानों की फसलें खराब हो गई थी।
साल 1816 की जुलाई में यूरोप में भारी बर्फबारी देखने को मिली थी। धरती के कई हिस्सों में भूकंप-सूखा जैसी स्थिति भी बनी थी।

11 साल में होती है ऐसी घटनाएं : रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी के वैज्ञानिकों का कहना है कि सूर्य की सतह पर प्रत्येक 11 साल में ऐसी घटनाएं देखने को मिलती हैं। यह प्रकृति का चक्र है, इससे घबराने की जरूरत नहीं है। कुछ दिनों में सूर्य का चुंबकीय क्षेत्र अपने पुराने रूप में लौटा आएगा।
(Photo courtesy: NASA)



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