महादेवी वर्मा ने प्राथमिक शिक्षा पाई थी इंदौर में

mahadevi verma
नगर इस तथ्य पर गर्व करने का हकदार है कि यहां से अखिल भारतीय ख्यातिप्राप्त अनेक साहित्यकारों का संबंध रहा। यह नगर उनकी कर्मभूमि रही है। ऐसे प्रमुख हस्ताक्षरों की लंबी सूची बनाई जा सकती है जिनमें से कुछ व्यक्तित्वों का उल्लेख यहां करना चाहेंगे।

प्रसिद्ध लेखक, पत्रकार व संपादक बनारसीदासजी चतुर्वेदीजी इंदौर से कुछ समय तक जुड़े रहे। पांडेय बेचैन शर्मा 'उग्र' ने हिन्दी को नई दिशा प्रदान करते हुए अनके ग्रंथों की रचना की। बाबू संपूर्णानंदजी इंदौर से जुड़े रहे, जो अपनी विद्वत्ता, राजनीतिक व दार्शनिक चिंतन के लिए सुविख्यात हैं।

आकाशवाणी इंदौर केंद्र में प्रसिद्ध उपन्यासकार श्री इलाचन्द्र जोशी ने सेवा की। इंदौर से प्रकाशित होने वाली कुछ हिन्दी पत्रिकाओं में 'मालव मयूर' का अपना अलग स्थान था, जिसका संपादन प्रसिद्ध पत्रकार श्री हरिभाऊ उपाध्याय ने किया। छायावाद के प्रमुख स्तंभों में गिने जाने वाले श्री शांतिप्रिय द्विवेदी इंदौर में कुछ समय तक 'वीणा' का संपादन करते रहे।
प्रभाकर माचवे, गजानंद माधव मुक्तिबोध व वीरेन्द्र कुमार जैन जैसे आधुनिक कवि व लेखकों ने अपने लेखन का प्रारंभ इंदौर से किया। विक्रम विश्वविद्यालय के पूर्व कुल‍पति व मालवा के लाड़ले कवि डॉ. शिवमंगलसिंह 'सुमन' नेअपना अध्यापन कार्य इंदौर से प्रारंभ किया। श्री ब्रजलाल बियाणी अपने जीवन के अंतिम दिनों में इंदौर आ बसे थे और यहां रहकर उन्होंने अपनी साहित्य सेवा को अनवरत जारी रखा।
इंदौर नगर इस तथ्य से सदैव गौरवान्वित होता रहेगा कि आधुनिक काल की महान कवयित्री महादेवी वर्मा की प्रारंभिक शिक्षा इंदौर में हुई थी। अक्षय कुमार जैन, रामविलासजी शर्मा व चंद्रकांत देवताले जैसे भी इंदौर से जुड़े रहे हैं। इंदौर नगर के आधुनिक कवियों में इन्द्रदेवी गुप्ता, भालचन्द्र जोशी, सरोजकुमार जैन, रमेश मेहबूब, रामकृष्ण सोमानी, आदि उल्लेखनीय हैं।

उपन्यास लेखकों व अन्य विधाओं के सृजकों में डॉ. श्यामसुंदर व्यास, ठाकुर जयसिंह, श्याम संन्यासी, रामनारायण शास्त्री, पुरुषोत्तम महादेव वैद्य, डॉ. रणवीर सक्सेना, निर्मोही, चन्द्रशेखर दुबे, राहुल बारपुते, कृष्णकान्त दुबे, महेन्द्र त्रिवेदी, विलास गुप्ते, राजेश जैन, प्रेम कासलीवाल, दत्तात्रय सरमंडल, जयंत मेहता, राजेन्द्र माथुर, कमलाकांत मोदी, सूर्यकांत नागर, पी.डी. शर्मा, एन.सी. जमीदार, डॉ. शरद पगारे, मिर्जा इस्माइल बेग व रामसेवक गर्ग आदि प्रमुख हैं।

इंदौर के हिन्दी प्रेमी साहित्यकार :कला व साहित्य के क्षेत्र में होलकर प्रशासकों ने प्रारंभ से ही उदारतापूर्वक संरक्षण प्रदान किया था। नगर में साहित्य की अभिवृद्धि हेतु न केवल लेखकों को प्रोत्साहित किया गया, अपितु राज्य ने अपनी ओर से इंदौर में 'हिन्दी साहित्य समिति' व 'महाराष्ट्र साहित्य समिति' की स्थापना कर बुद्धिजीवियों को प्रेरित किया था।
इंदौर में साहित्यिक गतिविधियों से जुड़े रहे कुछ प्रमुख हस्ताक्षरों का यहां उल्लेख किया जाना प्रासंगिक होगा। सर सिरेमल बापना, जो होलकर राज्य के प्रधानमंत्री थे, हिन्दी के प्रबल समर्थक थे। सरदार किबे, मराठी भाषा के विद्वान थे, किंतु उन्होंने आजीवन हिन्दी से प्रेम किया और उसे प्रोत्साहित करते रहे। सर सेठ हुकुमचंदजी, जो व्यापार जगत के सरताज थे, को हिन्दी से विशेष अनुराग था।

उन्होंने यद्यपि स्वयं साहित्य रचना नहीं की, किंतु हिन्दी ग्रंथों के प्रकाशन के लिए पर्याप्त अनुदान दिया। सुखसंपतराय भंडारी ने अनेक स्तरीय पुस्तकें लिखीं, जिनमें उनका ग्रंथ 'भारत के देशी राज्य' विशेष रूप से उल्लेखनीय है। शिखरचंदजी जैन ने स्तरीय जीवनियां लिखीं।
जहां तक साहित्यिक पत्रकारिता का प्रश्न है, इस क्षेत्र में श्री सूरजमल जैन व श्री कालिकाप्रसाद दीक्षित को संस्थापक कहा जा सकता है। श्रीनिवासजी चतुर्वेदी ने शिक्षा व साहित्य के क्षेत्र में नई जमीन तोड़ी थी। राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित करने वाले कवि व रूपक लेखक श्री हरिकृष्णजी 'प्रेमी' पर इंदौर को गर्व है। पत्रकारिता के क्षेत्र में श्री गोपीवल्लभ उपाध्याय के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।
हिन्दी साहित्य समिति द्वारा प्रकाशित प्रकाशित पत्रिका 'वीणा' ने अखिल भारतीय स्तर पर हिन्दी जगत में अपना स्थान बनाया। समय-समय पर इस पत्रिका के संपादन का सौभाग्य हिन्दी के विद्वानों को मिलता रहा। श्री प्रयाग नारायण 'संगम', श्री कमलाकर मिश्र, शांतिप्रियजी द्विवेदी व डॉ. श्यामसुंदर व्यास इनमें प्रमुख हस्ताक्षर हैं।

प्रभात किरण सोजतिया ने जासूसी साहित्य के सृजन की परंपरा प्रारभं की। ऐतिहासिक, धार्मिक पुस्तकों को लिखने में ज्वालाप्रसाद सिंहल ने काफी प्रसिद्धि पाई। इन लेखकों ने हिन्दी साहित्य की जो सेवा की, उससे नगर में एक साहित्यिक वातावरण निर्मित हुआ और युवा हिन्दी लेखकों को नई प्रेरणा मिली। धीरे-धीरे इंदौर नगर हिन्दी पत्रकारिता का तो केंद्र बना ही, यहां से कई हिन्दी ग्रंथों व मासिक पत्रिकाओं का भी सफलतापूर्वक प्रकाशन होता रहा।
इंदौर के संस्कृत विद्वान :
अहिल्याबाई होलकर ने संस्कृत के अनेक विद्वानों को दक्षिण से आमंत्रित कर महे्श्‍वर में संरक्षण दिया था। राजधानी इंदौर में स्थापित हो जाने पर संस्कृत के कई विद्वान इंदौर आ बसे थे। इंदौर में वेदशाला, संस्कृत विद्यालय व संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना ने संस्कृत साहित्य की अभिवृद्धि का मार्ग प्रशस्त किया।

संस्कृत विद्यालय से 1916 ई. में ही एक त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हुआ जिसे 'त्रैमासिकम्' संबोधन दिया गया था। इस विद्यालय के संस्‍थापक प्रधान श्री जगन्नाथ राव टिल्लू ने अपने पिता द्वारा रचित 'होलकर वंशम्' का प्रकाशन उक्त त्रैमासिक के माध्यम से किया।
श्री गजानंद शास्त्री करमलकर ने 'लोकमान्यालंकार', 'पद्म बंध' तथा 'हरबंध' नामक ग्रंथों की रचना की। नारायण द‍त्त शास्त्री ने अपने चर्चित ग्रंथ 'आयुर्वेद दर्शनम्' द्वारा आयुर्वेद के दार्शनिक पक्ष पर सर्वथा नवीन प्रकाश डाला। श्रीपाद शास्त्री हसूरकर ने महाराणा प्रताप, रामदास व वल्लभाचार्य की जीव‍नी लिखी। श्री सुरेन्द्रनाथ शास्त्री ने नाट्य शास्त्र पर अपनी लेखनी चलाई।
इनके अतिरिक्त विप्रदास, पुरुषोत्तम शास्त्री, काशिककर, एन.एम. जोशी, पी.एन. कवठेकर तथा आर.ए. कालेले आदि ने संस्कृत साहित्य को समृद्ध किया।

संस्कृत ग्रंथों के उल्लेख में 'अहल्याचरितम्' की चर्चा सामयिक होगी। 20वीं सदी में संस्कृत भाषा में लिखे गए ग्रंथों में 'अहल्याचरितम्' नामक महाकाव्य का स्थान बहुत ही ऊंचा है। महाकाव्यों की प्रणाली के अनुसार इसमें भी कुल 17 सर्ग हैं एवं प्रत्येक सर्ग में 50 से अधिक तथा पूरे महाकाव्य में कुल 1261 श्लोक हैं।
इसमें कोई संदेह नहीं कि इस महाकाव्य के र‍चयिता सखाराम शास्त्री भागवत एक सहृदय कवि तथा एक बड़े पंडित थे। उन्होंने अपने विद्वान पिता से बाल्यकाल में अमरकोष, अष्टाध्यायी, निघण्टु आदि की शिक्षा प्राप्त कर उन्हें कंठस्थ किया था। 'अहल्याचरितम्' का प्रकाशन 1935 में सातारा से हुआ था।

'होलकर वंशम्' की रचना इंदौर में ही लगभग 1900 ई. में हुई। इस ग्रंथ के रचनाकार संस्कृत के विद्वान रावजी वासुदेव टुल्लू थे।
होलकर शासकों ने अपने संस्कृत प्रेम को उनके द्वारा जारी सिक्कों पर भी परिलक्षित किया। यशवंतराव (प्रथम) ने तो अपने चांदी के सिक्कों पर 'इन्द्रप्रस्थस्थितो राजा चक्रवर्ती भूमंडले...' जैसे पूरे श्लोक उत्कीर्ण करवाए थे। तुकोजीराव (द्वितीय) ने भी देवी अहिल्या के स्मरण में जो सिक्के ढलवाए, उन पर 'श्री शंकरानुचर्य हल्या जयति' तथा 'सावमलार्यहल्या दिवं जयति' आदि वाक्यों को उत्कीर्ण करवाया था। होलकर राज्य के 'राज्य चिह्न' पर 'प्राहोमेशोलभ्या: श्रीकर्तु: प्रारब्धात्' अंकित करवाया जाता था।
मालवी की मिठास जिंदा है इंदौर में :
मालवा का संपन्न प्रदेश सदैव ही सम्राटों और सुल्तानों को आकर्षित करता रहा है। मालवा का परमार वंश सारे देश में अपने सुशासन के लिए विख्यात रहा है। इस वंश के पतन के बाद मालवा में सुल्तानों ने अपनी सल्तनत का विस्तार किया और मांडू को अपना प्रमुख केंद्र बनाया।

मालवा की आर्थिक व सांस्कृतिक संपन्नता के चर्चे समय-समय पर मालवा की यात्रा करने वाले विदेशी इतिहासकारों ने भी किए हैं। 'मालव धरती गहन गंभीर, डग-डग रोटी, पग-पग नीर' की प्राचीन उक्ति भी इसी संपन्नता को परिलक्षित करती है।
इंदौर नगर, मालवा का सबसे प्रमुख औद्योगिक व व्यापारिक केंद्र रहा है। संपूर्ण मालवा क्षेत्र के व्यापारी व सामान्यजन इंदौर के जीवंत संपर्क में रहे हैं। इंदौर नगर के आसपास 10-15 कि.मी. की दूरी पर स्थित ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी मालवी भाषा, वेशभूषा, परंपराओं व खानपान की आनंद लिया जा सकता है। वस्तुत: 'मालवी' बड़ी मीठी व बोधगम्य भाषा है। इसके संबोधनों में सहज ही स्नेह, अपनत्व व आदर झलकता है।
इंदौर, होलकरों की राजधानी बनने के बाद यद्यपि मराठी भाषा से प्रभावित होने लगा था तथापि इस क्षेत्र की पारंपरिक 'मालवी' भाषा ने भी अपना अस्तित्व बनाए रखा। यह एक दु:खद सत्य है कि पिछली एक सदी से मालवी साहित्य के सृजन व प्रकाशन को कोई महत्व नहीं मिल पाया। फिर भी मालवी के साधक अपनी राह पर चलते ही रहे। ऐसे विद्वानों में श्री आनंदराव दुबे, श्री नरेन्द्रसिंह तोमर, श्री नरहरि पटेल, श्री मदनमोहन व्यास, श्री चन्द्रशेखर दुबे, श्री भागीरथ दुबे प्रमुख हैं।
आकाशवाणी इंदौर केंद्र से श्री कृष्णकांत दुबे व उनके साथी द्वारा लंबे समय तक प्रसारित कृषि व खेती-गृहस्थी कार्यक्रमों में मालवी का बड़ा प्रभावी उपयोग किया गया। समय-समय पर इस केंद्र द्वारा मालवी गीतों का प्रसारण भी होता रहा है, जिसने इस केंद्र की स्थानीय पहचान श्रोताओं में बनाई।

इंदौर से प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचार-पत्रों में 'नईदुनिया' ऐसा पहला अखबार है, जिसने 'मालवी' के लिए अपने साप्ताहिक प्रकाशन में कॉलम उपलब्ध कराए हैं। यदा-कदा मालवी में लिखे 'पत्र संपादक के नाम' भी प्रकाशित होते हैं।
गत कुछ वर्षों से म.प्र. शासन ने 'मालवा उत्सव' मनाना प्रारंभ किया है। इन सारे प्रयासों के बावजूद मालवी साहित्य समृद्ध नहीं हो पाया है। आवश्यक है कि देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में 'मालवी' शोध केंद्र स्थापित हो, जिसमें अध्ययन-अध्यापन के साथ-साथ शोध-कार्य भी होता रहे।

मराठी और हिन्दी का मामला :
कौंसिल ने विचार-विमर्श के पश्चात बुधवार, 24 फरवरी 1904 ई. के अपने प्रस्ताव क्र. 115 द्वारा यह आदेश प्रसारित किया कि 1 मई 1904 ई. से हिन्दी भाषा को होलकर दरबार तथा न्यायालयों की भाषा के रूप में स्वीकार किया जाता है।
जब इस प्रकार की घोषणा होलकर दरबार द्वारा की गई तो मराठी व अन्य भाषा-भाषी लोगों के मस्तिष्कों में विभिन्न प्रकार की धारणाओं ने जन्म लेना प्रारंभ कर दिया। वे अपने आपको राज्य की ओर से उपेक्षित समझने लगे। उन लोगों की इन विपरीत धारणाओं का खंडन करने हेतु होलकर दरबार की कौंसिल ने सोमवार 17 अक्टूबर 1904 ई. को एक अन्य प्रस्ताव क्र. 884 पारित किया जिसका सारांश इस प्रकार है- इंदौर राज्य मराठी भाषा-भाषी जनता अल्पसंख्यक है। 1901 की जनगणना के आंकड़ों से स्पष्ट है कि राज्य की कुल जनसंख्‍या 8,50,690 में से 7,60,000 व्यक्ति हिन्दी भाषा-भाषी हैं।

केवल 37,912 व्यक्ति ही ऐेसे हैं, जो मराठी भाषा-भाषी हैं। इसके अतिरिक्त केवल 24,620 लोग भीली, 11,564 लोग गुजराती तथा 10,817 उर्दू भाषा का ज्ञान रखते हैं। हिन्दी भाषी लोग मराठी भाषा का भी ज्ञान रखते हैं। उन्होंने इसे कार्यालयीन उपयोग हेतु सीखा है अथवा उन्हें ऐेसे विद्यालयों में प्रवेश दिया जाता है जिनकी शिक्षा का माध्यम मराठी है।
संपूर्ण राज्य में ग्रामीण अभिलेख तथा राजस्व विषयक लेख हिन्दी में लिखे जाते हैं। भूतपूर्व नरेश द्वारा हिन्दी को पुलिस तथा सैन्य विभाग में पहले ही कार्यालयीन भाषा के रूप में घोषित किया जा चुका है। केवल न्यायालयों, कोषालयों तथा राजस्व कार्यालयों में अमीन से ऊपर के स्तर पर साधारणतया मराठी भाषा का प्रयोग किया जाता है।

इसका मूल कारण यही है कि मराठी उच्च वर्ग की भाषा है अथवा उस वर्ग की भाषा है जिसमें से अधिकांश अधिकारियों का चयन किया गया है। चूंकि आरंभ में न्यायालयीन सूचना पत्र, साक्ष्य कथनों तथा न्यायाधीश द्वारा प्रदत्त न्यायिक आदेशों आदि को लिपिबद्ध करने का माध्यम मराठी था, इसलिए न्याय के लिए वादी तथा प्रतिवादी पक्ष एवं साक्ष्यदाता न्यायालय की कार्रवाई से पूर्णत: अवगत नहीं हो पाते थे। जिसका दुष्परिणाम यही था कि सभी स्तर के लोगों को न्यायालय में आवेदन करने अथवा न्यायालयीन पत्रों का उत्तर देने के लिए प्राय: व्यावसायिक मराठी भाषी लोगों की सहायता लेनी पड़ती थी।
हिन्दी को राज्य भाषा बनाने में कौंसिल का उद्देश्य यही है कि राज्य की जनता तथा अधिकारी वर्ग के मध्य सीधा संपर्क स्थापित हो सके।

इंदौर राज्य दंड संहिता की धारा 506 के अंतर्गत यह प्रावधान है कि यह सरकार पर निर्भर होगा कि वह न्यायालयीन भाषा का दर्जा किस भाषा को प्रदान करे। प्रशासकीय सुविधा को ध्यान में रखते हुए यह स्थान हिन्दी भाषा को प्रदान किया गया है, क्योंकि वह जनता की प्रमुख भाषा है। प्रशासन के साधारण कार्यों में हिन्दी के उपयोग को अब अनुमोदित कर दिया गया है, इससे जनता को अब दोहरा लाभ होगा।

पहला तो यह कि अब जनता शासकीय कर्मचारियों से उसकी स्वयं की भाषा में संपर्क स्थापित करेगी तथा दूसरा- जैसा कि मंगलवार 26 अप्रैल ई. 1904 के राजस्व सूचना पत्र क्र. 15 में निर्देशित किया गया है कि अब राजकीय सेवाओं में उन लोगों को भी अवसर प्रदान किए जाएंगे, जो योग्य तो हैं, किंतु राजकीय सेवा के लिए भाषा के आधार पर अयोग्य घोषित किए गए हैं।
सोमवार 29 फरवरी ई. 1904 को होलकर राज्य द्वारा प्रसारित एक शासकीय सूचना पत्र‍ द्वारा राजकीय अधिकारियों को आदेश दिया गया है कि वे हिन्दी का पर्याप्त ज्ञान अर्जित कर लें जिससे कि वे भविष्‍य में कर्तव्यों को उचित निर्वाह कर सकें।

इस प्रकार जहां बहुसंख्यक जनता की भाषा हिन्दी को कार्यालयीन भाषा का स्तर प्रदान किया गया, वहीं नरेशों ने मराठी भाषी जनता तथा अधिकारियों के हितों का भी ध्यान रखा। उन्होंने जनसाधारण तथा प्रशासकीय अधिकारी वर्ग के मध्य सीधा संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया। इससे भाषा के कारण राज्य में व्याप्त भ्रष्टाचार में कमी आई तथा योग्य हिन्दी भाषी लोगों को शासकीय सेवाओं में आने के अवसर प्राप्त हुए। होलकर राज्य के शिक्षा संचालक रानडे, इंदिराबाई भागवत के अतिरिक्त श्रीमती किबे की भूमिका हिन्दी के विकास में उल्लेखनीय रही।
जहां एक ओर होलकर सरकार द्वारा हिन्दी को शासकीय कार्यालयों की भाषा घोषित किया गया, वहीं उसके साहित्यिक विकास के लिए भी प्रयास किए गए। इसी उद्देश्य से प्रेरित होकर ई. 1915 में होलकर नरेश तुकोजीराव (तृतीय) के प्रयत्नों से मध्यभारत हिन्दी साहित्यिक संस्था की स्थापना की गई, जिसने मध्यभारत में न केवल हिन्दी के प्रचार-प्रसार व प्रकाशन का कार्य किया, अपितु प्रतिभावान साहित्यकारों को पर्याप्त प्रोत्साहन एवं आश्रय भी प्रदान किया। इस संस्था को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए होलकर दरबार की ओर से 2,500 रु. की वार्षिक सहायता प्रदान की जाती थी।
इस समिति के द्वारा 1915 ई. से 1928 तक 5000 रु. प्रकाशित पुस्तकों के लेखकों को प्रोत्साहन पुरस्कार पुरस्कार के रूप में प्रदान किए गए। हिन्दी में कविता, नाटक, दर्शन शास्त्र, नैतिक शास्त्र, शरीर विज्ञान आदि पर रचना करने वाले साहित्यकारों को लगभग 16,000 रु. की सहायता उनकी 29 पुस्तकों के लिए प्रदान की गई।

इसके अतिरिक्त 1929 ई. में समिति को व्यवस्‍थित स्वरूप प्रदान करने के लिए दरबार की ओर से एक भवन का भी निर्माण किया गया। साथ ही मुद्रणालय की भी स्थापना की गई और एक मासिक पत्रिका 'वीणा' का प्रकाशन (हिन्दी में) इस समिति द्वारा प्रारंभ किया गया। हिन्दी के प्रोत्साहन हेतु 1944 ई. तक इस संस्था के सार्वजनिक पुस्तकालय में लगभग 10,780 पुस्तकों का भंडार सुरक्षित था।



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