नगर के प्रमुख महल, छत्रियां व इमारतें

महिदपुर के युद्ध में पराजित हो जाने पर होलकर पक्ष को मंदसौर की संधि (1818 ई.) करनी पड़ी जिसके तहत इंदौर में ईस्ट इंडिया कंपनी को अपनी रेसीडेंसी कायम करने की इजाजत होलकर ने दी। इस संधि के बाद ही इंदौर होलकर रियासत की राजधानी बना। अंगरेजों व होलकर शासकों ने इंदौर में अनेक इमारतों का निर्माण करवाया जो आज अपने व स्थापत्य शैली के कारण दर्शनीय बन गई हैं।

इंदौर की पहचान राजबाड़ा

राजबाड़ा और इंदौर नगर एक-दूसरे के पर्याय बन चुके हैं। इंदौर का गौरव व प्रतीक चिह्न बन गया है यहां का राजबाड़ा। प्रारंभिक दिनों में जब खान नदी पर कृष्णपुरा पुल नहीं बना था, नगर की बसाहट इस नदी के पश्चिम में ही थी। अत: होलकर शासक मल्हारराव (द्वितीय) ने इसी क्षेत्र में राजबाड़ा बनवाने का निश्चय किया। 7 मंजिला इस विशाल भवन का निर्माण 1820 से 1833 के मध्य संपन्न हुआ और इसके निर्माण पर उस समय 4 लाख रु. से अधिक की राशि खर्च की गई।
मराठा शैली में निर्मित इस भवन का विशाल द्वार पूर्व की ओर रखा गया, जो वास्तुशास्त्र के अनुसार शुभ दिशा मानी जाती है। मुख्य द्वार के दोनों ओर द्वार रक्षकों के स्थान निर्मित हैं। राजबाड़े की प्रारंभिक मंजिल तक इसके अग्रभाग में पत्थरों की चिनाई की गई है, जो इसके अग्रभाग की मजबूती के लिए लगाए गए हैं। भवन के इसी भाग पर 7 मंजिलों का निर्माण किया गया है। संभवत: प्रारंभ से ही इस ऊंचाई को ध्यान में रखकर प्रथम तल को पत्थरों की मजबूती प्रदान की गई थी।
मुख्य प्रवेश द्वार के भीतर जाते ही एक बड़ा खुला चौक है। पूर्व में इस खुले क्षेत्र का उपयोग विशेष समारोहों व उत्सवों के अवसर पर जनता द्वारा किया जाता था। इस चौक के सामने पश्चिम की ओर) प्रमुख दरबार हॉल है जिसे गणेश हॉल कहा जाता है। इस हॉल में लगे पत्थरों के स्तंभों व उन पर बनी आकृतियां इसकी भव्यता को बढ़ाती हैं। होलकर महाराजा इसी हॉल में अपना दरबार लगाते थे और यहीं प्रमुख समारोह आयोजित किए जाते थे।
मुख्य द्वार को बंद कर दिए जाने पर, अन्य किसी द्वार से राजबाड़े में प्रवेश वर्जित था। 1857 की 1 से 4 जुलाई तक जब इंदौर रेसीडेंसी पर क्रांतिकारियों का अधिकार हो गया था तब कई अंगरेज अधिकारियों का वहां वध कर दिया गया था। कुछ अंगरेज भागकर इसी राजबाड़े में आ गए थे। अपनी शरण में आए उन अंगरेजों को महाराजा ने न केवल शरण दी अपितु उनके प्राणों की रक्षा भी की थी।

318 फुट लंबे और 232 फुट चौड़े इस भवन में स्वाधीनता पश्चात अनेक शासकीय कार्यालय थे। होलकरों के कुलदेवता का मंदिर भी यहीं स्थापित है जिसकी पूजा-अर्चना राजपरिवार के सदस्यों व राजपुरोहितों द्वारा की जाती है।
महाराजा शिवाजीराव को पहलवानी का बड़ा शौक था। उन्होंने राजबाड़े में ही एक अखाड़ा बनवाया था जिसमें वे पहलवानों की कुश्तियां करवाते व स्वयं भी पहलवानी किया करते थे। कहते हैं कि वे राजबाड़े के झरोखे पर बैठकर लोगों को देखते थे। जो कोई व्यक्ति नंगे सिर उन्हें दिखाई दे जाता था उसे पकड़वाकर दंडित करते थे। राजबाड़े के आसपास यदि कोई अंगरेज दिखाई दे जाता तो उसकी खैर नहीं थी उसे पकड़वाकर महाराजा बहुत पिटवाते थे।
इस भवन ने होलकर वंश का उत्थान व पतन देखा है। धीरे-धीरे यह इंदौरवासियों का स्नेह बिंदु बन गया। इसके आसपास सराफा व प्रमुख बाजार स्थापित हुए जिनका आज भी महत्व कम नहीं हुआ है। राजशाही के अपने चाहे जितने दोष रहे हों, किंतु इतना नि:संदेह कहा जा सकता है कि होलकर राजपरिवार के प्रति इंदौरवासियों के मन में आज भी आदर व सम्मान है। देश की आजादी के बाद होलकर राज्य का विलय भारतीय संघ में हो गया। पुरानी पीढ़ी के लोगों को लेखक ने स्वयं देखा है कि वे राजबाड़े में साइकल पर बैठकर प्रवेश नहीं करते थे और गणेश हॉल की ओर मुखातिब होकर नमस्कार करते थे।
राजबाड़े से इंदौरवासियों का गहरा लगाव है तभी तो जब इसे कलकत्ता के किसी व्यापारिक घराने को बेचने की बात चली तो जन-आंदोलन इस सौदे के विरुद्ध उठ खड़ा हुआ और विवश होकर राज्य शासन ने इसे बिकने से बचाया। राजबाड़े पर तिरंगा झंडा फहराया और यह भव्य इमारत म.प्र. के पुरातत्व विभाग के नियंत्रण में आ गई। पुरातत्व विभाग ने राजबाड़े के सुंदर भित्तिचित्रों के फोटोग्राफ्स लेकर सुंदर संग्रह तैयार किया था, जो अब बहुत महत्वपूर्ण हो गए हैं, क्योंकि 1984 के दंगों में राजबाड़ा भी अग्निकांड का शिकार हुआ था जिसमें वे बहुमूल्य भित्तिचित्र भी नष्ट हो गए। पुरातत्व विभाग के संरक्षण में रखे फोटो ही अब शेष प्रमाण रहे हैं। इस अग्निकांड में होलकर राज्य के हजारों बस्ते भी स्वाहा हो गए जिनमें होलकर राज्य के राजस्व, व्यापार व अन्य मामलों से संबंधित महत्वपूर्ण अभिलेख थे। वर्तमान समय में पुरातत्व विभाग द्वारा इसका रखरखाव किया जा रहा है।
राजबाड़े का इतिहास

दो सौ वर्षों से भी अधिक पुराना राजबाड़ा होलकरों का प्रतिष्ठा चिह्न है। राजबाड़ा के वास्तविक निर्माण और उसके निर्माता के संबंध में अलग-अलग मत हैं। राजबाड़े का निर्माण कई स्तरों पर हुआ है। एक पुस्तक 1766 में इसका अस्तित्व बताती है। एक जगह वर्ष 1801 में होलकरों की पराजय के समय उसे जलाकरनष्ट कर देने के प्रयासों का उल्लेख भी मिलता है तो एक दूसरा संदर्भ है 1811 से 1833-34 के बीच इसके निर्माण का।
शहर के मध्य बसा विशाल 7 मंजिला यह महल मल्हारराव होलकर द्वितीय (1811-33) के समय 4 लाख रुपए से अधिक राशि खर्च कर बनाया गया। इसकी लंबाई 318 फुट और चौड़ाई 232 फुट है। उसमें होलकरों के कुलदेवता मल्हारी मार्तंड का मंदिर तथा गद्दी है। स्टेट गझेटियर भाग-2, एल.सी. धारीवाल 1811 के अनुसार पूर्व में भी यहां एक महल था जिसकी कहानी यशवंतराव होलकर (प्रथम) से जुड़ी हुई है।

दौलतराव सिंधिया का श्वसुर सरजेराव घाटगे यशवंतराव होलकर (प्रथम) को सबक सिखलाने के उद्देश्य से वर्ष 1801 में हंडिया के नजदीक नर्मदा पार कर इंदौर की तरफ आगे बढ़ा था। सिंधिया के साथ कुछ अंगरेज सिपाही भी थे। उसका कप्तान सदरलैंड था। यशवंतराव होलकर ने घाटगे व सदरलैंड की सेना पर हमला किया। यह गड़बड़ी के नजदीक हुआ। ड्‌यूडरनेक के दगा देने से यशवंतराव को इंदौर छोड़ना पड़ा। फिर दुश्मन ने 15-16 दिन इंदौर को लूटा और जूना राजबाड़े को आग लगा दी। उसके प्रवेश द्वार की सात मंजिलों में से ऊपर की दो मंजिलें भस्म हो गईं। (होलकरशाहीचा इतिहास भाग-2)
सरजेराव घाटगे द्वारा जलाए गए जूना राजबाड़े का पुनर्निर्माण तात्या जोग के निर्देशन में फिर वर्ष 1811 से शुरू हुआ। प्रवेश द्वार तथा सम्मुख का हिस्सा फिर वैसा ही बना दिया गया। यह पुनर्निर्माण का काम हरिराव होलकर के समय तक चलता रहा। इसके मुख्य द्वार का नाम कमानी दरवाजा था। महल में राजपुताना और मराठा स्थापत्य का मिला-जुला रूप है।

(20 अगस्त 1974 की नईदुनिया से)

स्वरलहरियों में डूबा दरबार हॉल
इंदौर के सूरमा राजबाड़े ने अनगिनत रंगीली महफिलें देखीं और सुनी हैं। दरबार हॉल के कण-कण में संगीत की स्वर लहरियां और पायलों की झनकार समाई हुई हैं।

इंदौर नगर को संगीत जगत में गौरवान्वित करने का सर्वप्रथम श्रेय महाराजा शिवाजीराव होलकर को है। देश के प्रसिद्ध कलाकार उनके आश्रय में रहकर कला की साधना किया करते थे। बीनकार उस्ताद बंदेअली खां उनमें से एक थे। महाराजा शिवाजीराव के सुपुत्र महाराजा तुकोजीराव होलकर (तृतीय) भी कला के अनन्य प्रेमी शासकों में से एक रहे हैं। इनके दरबार में प्रतिवर्ष रंगपंचमी से गुड़ी पड़वा तक प्रतिदिन संगीत सभा लगा करती थी जिसे 'इंदर सभा' कहा जाता था। मैसूर का दशहरा औरइंदौर की होली मशहूर हो गई थी। इंदर सभा में सबके सामने सुगंधित फूलों से भरी तश्तरियां रखी रहती थीं। विदेशों तक से कलाकार इस सभा में भाग लेने के लिए आया करते थे।
देश में प्रचलित मृदंग घरानों में पानसे घराना अपना विशिष्ट स्थान रखता है। इस घराने के प्रवर्तक थे नाना साहेब पानसे। अपने समय में ही इनके 500 शिष्य थे। इससे इनकी अटक 'पानसे' पड़ी थी। नाना साहेब महाराजा तुकोजीराव के आश्रित कलाकार थे। महाराजा तुकोजीराव के समय इस राजबाड़े ने नासिरुद्दीन खां (डागर बंधु के पिता) के ध्रुपद-धमार की गायिकी और नाना पानसे की मृदंग ही नहीं सुनी वरन्‌ अप्रतिम बीनकार उस्ताद बाबू खां की बीन, बुन्दू खां और अल्लादिया खां की सारंगी तथा उस्ताद जहांगीर खां का तबला भी खूब सुना है। पद्‌मभूषण स्व. उस्ताद अमीर खां के पिता श्री शमीर खां भी इसी राज दरबार में सारंगी नवाज थे। देश-विदेश के अनेक शीर्षस्थ कलाकारों की स्वर लहरियां सदैव दरबार हॉल में गूंजती रही हैं।
उस्ताद फैयाज हुसैन खां ने एक बार इंदर सभा में राग मालकौंस में खयाल गाया जिसके बोल थे 'पग लागन दे राजकुमार'। गायन सुनकर महाराज इतने भाव-विभोर हो उठे कि अपने गले में पड़ा सवा लाख का मोतियों का कंठा निकालकर उस्ताद फैयाज खां पर न्योछावर कर दिया था।

ग्वालियर के उस्ताद हद्दू खां ने अपने शिष्य बाबा दीक्षित से गुरु दक्षिणा में यह वचन लिया था कि वे अपना गायन महाराजा ग्वालियर को कभी नहीं सुनाएंगे जबकि महाराजा ग्वालियर उनका गायन सुनने के लिए बेताब रहते थे। बाबा दीक्षित का कंठ अत्यंत मधुर एवं स्वर ओजस्वी था। काशी में उनको 'नीलकंठ' की उपाधि से विभूषित किया गया था। बाबा दीक्षित को यदि यह मालूम हो जाता कि महाराजा चुपके से कहीं बैठे उनका रियाज सुन रहे हैं तो वचन निभाने के लिए रियाज भी बंद कर देते थे। अंतत: विवश होकर महाराजा ग्वालियर ने महाराजा तुकोजीराव से कहकर इसी राजबाड़े के दरबार में बाबा दीक्षित का गाना करवाया और स्वयं ने पर्दे के पीछे छुपकर उनका गाना सुना था।
श्रीमती चुन्नाबाई देवास की रहने वाली एक तवायफ थी। बड़ी पांती के गादी हॉल के सामने सुबह-शाम गाने के लिए इनकी नौकरी थी। गाना तो साधारण जानती थी किंतु कंठ बहुत मधुर था। बीनकार उस्ताद बंदेअली खां देवास आया-जाया करते थे। चुन्नाबाई की आवाज सुनकर उस्ताद बहुत प्रसन्न हुए और अपनी शिष्या बनाकर गाना सिखाने लगे। एक रात चुन्नाबाई को लेकर उस्ताद इंदौर चले आए और महाराजा शिवाजीराव को बीन सुनाई। बीन इतनी अच्छी बजाई कि महाराजा ने पूछा- 'बंदेअली, क्या चाहते हो?' वे बोले- महाराज, आपके ऊपर वाले गादी हॉल में कल से चुन्नाबाई गाने की हाजिरी लगाएगी और नीचे वाले गादी हॉल में काली इमामन।' महाराजा ने बात स्वीकार कर ली। दूसरे दिन से ऊपर वाले गादी हॉल में चुन्नाबाई का गायन होने लगा। इसके पहले इंदौर की एक तवायफ काली इमामन दोनों गादी हॉल में हाजरी लगाया करती थी।
एक नर्तकी थी गंगा दुलारी। तत्कालीन नर्तकियों में इनका विशिष्ट स्थान था। वे नृत्याचार्य बिन्दादीनजी महाराज की शिष्या थीं। महाराजा होलकर के राज दरबार में श्री बिन्दादीनजी भी अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं। गंगा दुलारी यद्यपि गणिका थीं किंतु जयदेव की अष्टपदियों पर तथा ठुमरियों पर ऐसा गतभाव करती थीं, जो उस समय अपना सानी नहीं रखता था। एक ही समय वे एक आंख से रोने व दूसरी आंख से हंसने का भाव प्रदर्शित कर सकती थीं। वे शतायुषी होकर वर्ष 1966 में स्वर्गवासी हुईं।-प्यारेलाल श्रीमाल 'सरस पंडित'

राजबाड़ा के भित्तिचित्र

राजबाड़े के भित्ति चित्रों की चर्चा करें। सबसे पहले हम राजबाड़े के चित्रों की विषयवस्तु को लें। जहां तक विषयवस्तु का संबंध है, लगभग संपूर्ण चित्र धार्मिक विषयों पर आधारित हैं जैसे रामायण, महाभारत तथा अन्य पौराणिक कथाएं। शिव एवं कृष्ण से संबंधित चित्रों की संख्या अच्छी-खासी है। लेकिन सबसे मजेदार बात यह है कि कलाकारों ने श्रीकृष्ण की प्रेम लीलाओं को लगभग जानबूझकर छुआ तक नहीं है, जबकि संपूर्ण चित्र राजस्थानी कलम के हैं। यहां तक कि कई चित्र कांगड़ा कलम के समान हैं। उनका संयोजन एवं आकृतियों की चित्र में स्थिति भी कांगड़ा के चित्रों के समान है। तब कलाकारों ने राजबाड़े में अपने प्रिय विषय को क्यों नहीं महत्व दिया? ऐसा लगता है, यह उपेक्षा कलाकारों ने विशेष कारण से की है। मेरे मत में इसका मूल कारण यह है कि राजबाड़े के संपूर्ण चित्र रानियों की देखरेख में बनाए गए। इसके साथ ही, मराठा पारिवारिक शिष्टाचार के कारण इन विषयों को टाला गया हो, यह भी संभव है। इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि होलकर विलासप्रिय नहीं थे। होलकरों की प्रेम कहानियां लड़ाकू कौम की तरह प्रसिद्ध रही हैं। होलकर राजा अन्य राजाओं की तरह सुंदर स्त्रियों से आकर्षित होते रहे हैं। लेकिन उन्होंने अपनी विलासप्रियता को दीवारों पर चित्रों के रूप में लाने में परहेज किया है।
राजबाड़े के चित्रों की सबसे महत्वपूर्ण बात है, देवी-देवताओं की आकृतियां। जितने भी देवता बनाए गए हैं, वे होलकर नरेशों जैसी वेशभूषा में बनाए गए हैं। चित्रों में मुख्य देवता के अतिरिक्त, जो भी मानव आकृतियां बनाई गई हैं, वे सब होलकर दरबारियों के समान ही हैं। इसके साथ ही एक पुरुष कृति करीब-करीब हर चित्र में आती है। निश्चय ही यह आकृति किसी होलकर राजा की रही होगी। इस पर शोध किया जाना चाहिए। इसी तरह नारी चित्रण भी मराठा स्त्रियों जैसा ही किया गया है। हर चित्र में सोलह हाथ की साड़ियां पहनाई गई हैं। केश विन्यास और नाक में नथ भी मराठा स्त्रियों जैसी ही है। पार्वती, सीता आदि देवियों को (ऐसा आभास होता है) अहिल्याबाई के चेहरे से मिलती-जुलती आकृति के रूप में बनाया गया है। यही नहीं राम दरबार, शिव-परिवार या अन्य चित्रों की पृष्ठभूमि में जो भी महल आदि बनाए गए हैं, वे सब राजबाड़े के समान ही बनाए गए हैं। खिड़कियां, दरवाजे, वॉल हेंगिंग, फव्वारे सब ही राजबाड़े के समान हैं।
इसका तात्पर्य है कि होलकरों केकलाकारों ने देवी-देवताओं और देवता वासों की कल्पना अपने आसपास के वातावरण से ली है।

होलकरों के अंगरेज शासकों से संबंध अच्छे नहीं रहे, इसके दर्शन भी हमें यहां दो बड़े भित्ति चित्रों में होते हैं। एक चित्र में कोई होलकर राजा अंगरेज अधिकारी से मिलने के लिए हाथी पर सवार होकर जा रहा है। साथ में फौज और फौजी बैंड भी है। इसी तरह अंगरेज अधिकारी भी हाथी पर सवार है और उसके साथ भी फौजी लवाजमा है। लेकिन अंगरेज अधिकारी और सब फौजी होलकर नरेश को सेल्यूट कर रहे हैं और होलकर नरेश शान से हाथी पर फूल सूंघते बैठे हैं।
युद्ध चित्रों में भी हम स्थानीय अखाड़ों का प्रभाव देख सकते हैं। यहां भी चित्रकारों ने स्थानीय वातावरण से प्रेरणा ली है।

चित्रों का माध्यम तैलरंग है। नंदलाल बोस ने, जो अजंता शैली के प्रमुख अनुगामी के रूप में प्रसिद्ध थे, तैल रंगों को सरल, सशक्त, लयात्मक एवं प्रवाहमयी भावपूर्ण रेखाओं के लिए अनुपयुक्त माना था। लेकिन राजबाड़े के कलाकारों ने तैल रंगों में राजस्थानी चित्रों की तरह सफल रेखांकन किया है। मैंने स्वयं इन चित्रों की प्रतिकृतियां तैयार करते समय यह प्रत्यक्ष अनुभव किया है कि राजबाड़ेके चित्रों का रेखांकन सरल, प्रवाहमय एवं कहीं भी टूटा हुआ नहीं है।
श्री वी.एस. वाकणकर के शब्दों में 'कांगड़ा शैली' के चित्रकारों के लिए कागज पर जलरंगों से रेखांकन आसान कार्य था, जबकि राजबाड़े के कलाकारों ने यह कार्य तैल रंगों में दीवार पर कर दिखाया है।

राजबाड़े के रंगमहल कक्ष नंबर एक में सबसे उत्कृष्ट चित्र हैं। चित्रांकन के साथ यहां के चित्र अपेक्षाकृत ज्यादा सही-सलामत हैं। इसका कारण भी अपने आप में मजेदार है। शायद चपरासियों की भूल से इस सारे कक्ष में पुराने ऑफिस फाइल के गट्‌ठे एक साथ भर दिए गए थे। इस कारण किसी भी आदमी का अंदर जाना मुश्किल था। इस कारण इन खारिज फाइलों ने इन सुंदर चित्रों को मनुष्य से नष्ट होने से बचाया है।
रंगमहल कक्ष नंबर 1 में कलाकारों ने आज से दो सौ वर्ष पूर्व, आधुनिक तकनीक का उपयोग किया है। इन चित्रकारों ने 'थ्री डायमेंशन' के भाव को सपाट शैली में लाने की अपने ढंग से कोशिश की है। इन चित्रों में क्लोजअप में रंगों की मोटी परत लगाई है और धीरे-धीरे, दूरी दिखाने के लिए, इस परत को वे पतली करते गए हैं। इससे पास और दूरी का बड़ी सफलता से आभास होता है। इनरंगों की परतों में टेक्सचर पैदा किया है।
रंगमहल कक्ष नं. 1 के चित्रों का विश्लेषण करने से मुझे ऐसा लगता है कि यह चित्र आंध्र शैली के अधिक निकट है। हो सकता है कि इन चित्रों को बजाए राजस्थान के चित्रकारों के, आंध्र के चित्रकारों ने बनाया होगा। जहां तक ऐतिहासिक प्रमाण का प्रश्न है, इतना ही कहा जा सकता है कि होलकरों का आंध्र से निकट का संबंध था।

राजबाड़े की तीसरी मंजिल पर कांच पर चित्रित चित्रों का एक बहुत बड़ा संकलन है। अभी तक भारत में यह मान्यता थी कि मैसूर की जगमोहन कला वीथिका में ही सबसे बड़ी संख्या में कांच पर चित्र संग्रहीत हैं। लेकिन इंदौर के राजबाड़े ने इस मान्यता को बदल दिया है। कांच पर अंकित चित्र अब इंदौर के राजबाड़े में सबसे अधिक हैं।
राजबाड़े की तीसरी मंजिल के चित्रों में मुगल शैली से प्रभावित चित्र हैं। इनका रेखांकन भी बहुत ही नाजुक है। लेकिन यहां के संपूर्ण चित्र नष्टप्राय हैं।

संपूर्ण चित्रों को देखकर यह कहा जा सकता है कि यहां तीन प्रकार के चित्रकार काम कर रहे थे। एक तो सिद्धहस्त कलाकार थे। दूसरे, नौसिखिए कलाकार और तीसरे चितेरे। चितेरों के चित्रों पर लोककला का पूर्ण प्रभाव है। या, यूं कहिए कि इनके चित्र लोक कला शैली के ही हैं, जिन्हें हम आज भी उज्जैन की दीवारों पर दीपावली-दशहरे के समय देख सकते हैं।
अंत में यही कहा जा सकता है कि होलकर, जिन्हें 'अक्खड़' कहा जाता है, कलाप्रेमी थे। इन शासकों ने अपना कला प्रेम उस समय कायम रखा, जबकि वे राजनीतिक और आर्थिक दोनों ही दृष्टि से संकट में थे।

मिर्जा इस्माईल बेग
(नईदुनिया के 'दीपावली 83' के अंक से)

1 नवंबर 1984 को भी जला था राजबाड़ा

इंदौर की शान, प्रतिष्ठा चिह्न और उसकी ऐतिहासिक धरोहर राजबाड़ा अपने 200 वर्षों से अधिक के जीवन काल में इंदौर और होलकर वंश की अनेक गतिविधियों का साक्षी रहा है। इसमें दो हादसे महत्वपूर्ण हैं। दोनों ही राजबाड़े में आग लगने से संबद्ध हैं। इन दोनों ही दुर्घटनाओं से राजबाड़ा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ।
पहली बार वर्ष 1801 में राजबाड़े को जलाकर नष्ट करने का प्रयास किया गया था। सरजेराव घाटगे ने यशवंतराव होलकर (प्रथम) को सबक सिखाने के उद्देश्य से 15 लाख रुपए खंडवी के लेना स्वीकार करके भी सराफा को लूटा और राजबाड़े को आग लगाकर उसे नष्ट कर दिया। राजबाड़े कापुनर्निर्माण तात्या जोग के निर्देशन में वर्ष 1811 में शुरू हुआ। प्रवेश द्वार तथा सामने का हिस्सा पहले जैसा ही बना दिया गया। पुनर्निर्माण का यह कार्य हरिराव होलकर के कार्यकाल तक चलता रहा।
दूसरी बार राजबाड़ा श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के पश्चात 1 नवंबर 1984 को नगर में हुए दंगों की बलि चढ़ा। तब पूरे शहर में सिख विरोध का नासमझपूर्ण माहौल था और इंदौर के कई हिस्सों में लूटपाट और आगजनी की घटनाएं हो रही थीं। ऐसे में ही राजबाड़े से लगी गुमटियों में कुछ असामाजिक तत्वों ने आग लगा दी।
परिणामस्वरूप राजबाड़े के भवन ने भी आग पकड़ ली और देखते ही देखते वह आग की चपेट में आ गया।
राजबाड़े के उत्तरी तथा पश्चिमी भाग का बड़ा हिस्सा अग्नि को समर्पित हो गया। आग इतनी अधिक थी कि उस पर पूरी तरह से काबू पाने में फायर ब्रिगेड को एक सप्ताह का समय लगा। इस अग्निकांड से राजबाड़े की पुरातत्वीय महत्व की अनेक वस्तुएं नष्ट हो गईं। गणेश हॉल, दरबार हॉल, कांच महल तथा मल्हार मार्तंड का पुराना मंदिर अग्नि से प्रभावित हुए।

पुरातत्व विभाग ने जो प्राचीन-प्राग ऐतिहासिक महत्व की कलाकृतियां एकत्र की थीं, वे भी नष्ट हो गईं। मल्हार मार्तंड मंदिरमें जो अखंडज्योति वर्षों से जल रही थी, वह भी ठंडी हो गई थी। वहां और भी कई बहुमूल्य चीजें नष्ट हो गईं। राजबाड़े का इस तरह जलना एक दुःखद और शर्मनाक घटना थी। बाद में शासन ने समय-समय पर राजबाड़े के जीर्णोद्धार का कार्य किया, लेकिन उसका पहला-सा स्वरूप और आकर्षण पूरी तरह नहीं लौट पाया है।
1857 में अंगरेजों को यहां पनाह मिली

1 जुलाई 1857 का दिन, और इंदौर नगर में प्रातःकाल ही कोहराम मच गया। इंदौर रेसीडेंसी में होलकर सेना ने विद्रोह कर दिया था। होलकर तोपें रेसीडेंसी पर गोले बरसा रही थीं। धमाकों से नगर कंपित हो उठा। अंगरेज अधिकारी जहां भी दिखाई दे रहे थे उन्हें मौत के घाट उतारा जा रहा था। रेसीडेंसी में निवास करने वाले अंगरेज कर्मचारी, उनके बच्चे व महिलाएं विद्रोहियों के कोपभाजक बन रहे थे।
रेसीडेंसी से बाहर व नगर में रहने वाले योरपीय लोगों के लिए तो कयामत का दिन आ गया था। वे अपना माल-असबाब छोड़कर राजबाड़े की ओर भागे। महाराजा तुकोजीराव होलकर द्वितीय ने सभी योरपीयन लोगों को राजबाड़े में शरण दी। एक ओर होलकर सेना फिरंगियों का वध कर रही थी और दूसरी ओर अपनी शरण मेंआए शत्रु को भी महाराजा ने पूर्ण संरक्षण प्रदान किया।

जब यह समाचार विद्रोहियों तक पहुंचा तो उनके क्रोध का ठिकाना न रहा। उन्होंने राजबाड़े की ओर कूच किया। बाड़े को घेर लिया गया और महाराजा से विद्रोहियों ने अनुरोध किया कि राजबाड़े में जितने भी योरपीय लोग हैं उन्हें उनके हवाले कर दिया जाए। महाराजा ने विद्रोहियों की इस मांग को दृढ़ता से अस्वीकार करते हुए कहा कि चाहे उनके प्राण चले जाएं किंतु वे शरण में आए लोगों की रक्षा करेंगे।
अंतत: महाराजा की दृढ़ता को देखकर विद्रोहियों को रेसीडेंसी लौट जाना पड़ा। रेसीडेंसी में रेजीडेंट एच.एम. डुरेंड के साथ जितने फिरंगी जीवित बचे थे वे भाग खड़े हुए किंतु राजबाड़े व महाराजा की दृढ़ता ने अनेक योरपीय व्यक्तियों को जीवन दान दिया। (देखिए- फॉरेन डिपार्टमेंट- फॉरेन कंसलटेशन्स 2 मार्च 1860 क्र. 40/48, राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली)



और भी पढ़ें :