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Written By ND

मौत के सामने

कमल चोपड़ा
 मौत के सामने
NDND
- कमल चोपड़

वह घर पहुँचा तो पीने का सारा मजा ही जाता रहा। कोई नई बात नहीं थी। चौबीसों घंटे घर में चख-चख ही रहती है। घर है कि कंजरखाना? अपने और छोटे भाई के तीन-तीन बच्चों के रहते कलह-क्लेश तो होगा ही। गैर जिम्मेदार छोटा भाई और ऊपर से सड़ियल मिजाज बीवी।

आज तो छोटा भाई सीधे-सीधे गालियों पर उतर आया था, 'सुबह से रात तक मैं मेहनत-मजदूरी कर-कर के अपने बच्चे पालूँ या तेरे ?'मामला बढ़ता ही जा रहा था। भाई की घरवाली भी, जो मुँह में आ रहा था, बके जा रही थी। खुद की घरवाली भी उन्हीं का पक्ष ले रही थी। नासुनी जा सकने वाली उन गालियों को सुनकर, वह आपे से बाहर हो गया और भाई पर टूट पड़ा। भाई भी जवाबी हमले पर उतर आया। छोटे भाई ने उसे खूब पीटा।

बर्दाश्त की भी हद होती है। और कोई चारा न देखकर उसने सोचा, उसे मर ही जाना चाहिए, तभी इन घरवालों की अक्ल ठिकाने आएगी। बेहद गुस्से में फुँफकारता हुआ वह मरने के लिए घर से निकल पड़ा। घरवाले उसे रोकते रह गए, कहीं कुछ कर ही न बैठे। हनुमान अखाड़े के पास वाले कुएँ में जाकर वह कूद गया। देखते-देखते ही वह पानी में डूबने लगा। मौत को साक्षात देखकर वह घबरा गया...। पीछे-पीछे ढूँढते-ढूँढते उसके घरवाले भी वहाँ पहुँचे। उन्होंने देखा कि गुस्से में वह कूद तो गया था, लेकिन कुएँ की दीवार से ईंटों केनिकल जाने से बने गड्ढों को पकड़कर चिल्ला रहा था- 'बचाओ, बचाओ मैं मरना नहीं चाहता।'