बोलो बगिया की रातरानी, बोलती क्यों नहीं जब हम लड़ते और लड़ियाते थे तब तुम बोलते हुए थकती नहीं थी आज जब बिछड़े हैं तो तुम चुप क्यों हो,
बोलो, रेशमी चंपा तुम ही कुछ बोलो, थोड़ा हंसो, थोड़ा सा छेड़ों मुझे, तुम तो कितना खिलखिलाती थी आज जब रिश्ते हमारे बिगड़े हैं तो तुम क्यों मुरझाई सी खड़ी हो, क्यों यूं बेजान-सी पड़ी हो?
ओ नकचढ़े गुलाब, तुम्हें तो बड़ा इतराना आता था, आज किस बात पर विनम्र बनकर निहार रहे हो, कहीं ऐसा तो नहीं तुम भी मेरी तरह भीतर से कराह रहे हो।
ऐसा क्यों होता है कि एक साथी आपकी हस्ती पर इतना-इतना छा जाता है कि उसके बिछुड़ते ही आपके साथ सारी कायनात स्तब्ध हो जाती है, हर तरफ खामोशी छा जाती है।
आज मेरी बगिया का हर फूल उदास है, क्योंकि आज तुम नहीं हो साथ, बस तुम्हारी यादें मेरे पास है।