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Written By WD

सारा शहर बना तंदूर

अखबारों को रखना दूर ...

शहर
- बालस्वरूप राही
NDND
कर दें चाहे नामंजूर
सुन तो लें फरियाद हुजूर

रोटी सेंक रहा है कौन
सारा शहर बना तंदूर

लपटों में लिपटा हर दृश्य
आँखें धुआँ-धुआँ बेनूर

पन्ना-पन्ना लहूलुहान
अखबारों को रखना दूर

झूठ कि जैसे तानाशाह
सच जैसे बंधुआ मजदूर

इसका कोई नहीं इलाज
स्वाभिमान ऐसा नासूर

आसमान पर चढ़ा दिमाग
दिल का शीशा चकनाचूर

साबित हो न भले ही जुर्म
मगर मिलेगी सजा जरूर

सुबह-शाम इतना अपमान
वह भी यारों बिना कसूर

खूब हुआ भैया मतदान
कितने गाँव हुए मशहूर

NDND
आखिर वो हैं नए अमीर
कुछ तो होगा उन्हें ग़रूर

सबके दिल में भारी खौफ़
सब कितने बेबस मजबूर

राही को समझाए कौन
कविताई है सिर्फ फितूर ।

साभार : समकालीन साहित्य समाचार