सागर बन गई औरत
रति सक्सेना
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उसने बस इतना चाहा किएड़ी उचका बादलों को छू लेनारियल की फुनगी पर चोंच रगड़ लेया फिरबिजली की चमक को अँजुरी में भरजमीन पर उतर आएवह उड़ी, किन्तु पंखों पर नहींबादलों पर भी नहींबिजली पर भी नहींबिजली की धार पर भी नहींधुनी हुई रूई की तरहउसकी देह का रेशा-रेशाहल्का हो गयाफिर तार-तार होते हुएधागे में बदल गयाफूल-पत्तियों की बुनावट में बुनती हुईवहआँगन में पसर गई उसकी चाहतेंकसीदे में बदल गई। 2
बीज से निकली रेशमी जड़भीतर तक चली आई कोख को खुजला करजम कर बैठ गई तोवह चाहने लगीकि पेड़-पौधे उस पर घिरे जाएँ कीड़े सतह कुरेदने लगेसाँप-बिच्छू सुरंग बना लेंजंगली भैंसे के सींग की नोकतार-तार कर दे भीतरी गुठलियों कोनरक से निकलने वाली सिसकियाँ स्वर्ग तक पहुँच जाएँ बन जाए वह जमीनबाहर से भीतर तक। 3
वह आसमान थीफिर जमीन बनीएक वक्त आया किलहरें हिलोड़ने लगीं सागर बन पीनेलगीं घूँट-घूँटपहली आयीधीमे से खटखटायावह जागी, मुस्काईदूसरी आ पहुँचीफिर तीसरी, फिर चौथी, पाँचवीं.....उफ! लहरें ही लहरेंएक के बिलाते दूसरीदूसरी के बाद तीसरीसागर बनी वह औरतजूझ रही है लहरों सेदेह को बारूद की सुरंग पर रख मानोंजर्रा-जर्रा उड़ा देगी उसकाहोठों को चबाता दर्दरेशा-रेशा कर समाता गयाअंधकार में डूबती वह न बादल हैन जमीन और न सागरन यशोधरा, न कैकेयी और न मंथरान माँ, न पत्नी, न बेटीबस लहर दर लहर दर्द से जूझतीरेत के कणों में मोती टटोलतीसागर बन गई औरत।