वक़्त ने फिर पन्ना पलटा है
ग़ज़ल
सतपाल ख़याल वक़्त ने फिर पन्ना पलटा हैअफ़साने में आगे क्या है? घर में हाल बजुर्गों का अबपीतल के बरतन जैसा है कोहरे में लिपटी है बस्तीसूरज भी जुगनू लगता है जन्मों-जन्मों से पागल दिलकिस बिछुड़े को ढूँढ रहा है? जो माँगो वो कब मिलता हैअबके हमने दुख माँगा है रोके से ये कब रुकता हैवक़्त का पहिया घूम रहा है आज 'ख़याल' आया फिर उसकामन माज़ी में डूब गया है हमने साल नया अब घर कीदीवारों पर टाँग दिया है।